क्या बला है “अल वला व’अल बरा”

इस्लाम का जो भी हिमायती आप को कहेगा कि इस्लाम मोहब्बत करना सिखाता है, अर्धसत्य कह रहा होता है. यह भी मुमकिन है कि वो खुद भी सत्य नहीं जानता, उसके लिए भी अरबी का काला अक्षर ऊंट बराबर ही होता है. बाकी इस्लाम की शान के लिए काफिर से झूठ बोलना तो हुजूर ने खुद ही sanction कर दिया है, Kab bin Ashraf की कहानी गूगल करिए, उसको तो जान से मार डालना था, कोई सीधा साधा नुकसान न करने वाला झूठ नहीं था. खैर, मूल बात पर आते हैं.

अपने मोमिन मित्र से Al Walaa wal Baraa का मतलब पूछिए. संभावना यही है कि वो खुद भी नहीं जानता हो और आप से कह भी देगा कि कभी किसी से पूछ कर बतायेगा. लेकिन साथ-साथ वो जानना चाहेगा कि आप को यह इंटरेस्ट क्यों जागा है.

आप ने ऐसी बात पूछ ली है जो उसे नहीं पता तो उसके कान खड़े हो जाते हैं. ऐसा सवाल पूछा है यानी ये मेरा काफिर मित्र इस्लाम के बारे में जानकारी ले रहा है. मेरे जैसे साधारण मुस्लिम से ज़्यादा जानता है. इसको या तो मोड़ना होगा या फिर मरोड़ना होगा ताकि ये अगर इस्लाम कुबूल नहीं कर रहा तो कम से कम सच्चाई जानकर इस्लाम का विरोध न कर सके. यह इनकी बेसिक तालीम होती ही है और अगर वो छुपा नास्तिक न हो तो हरकत में आयेगा जरूर. क्या करेगा?

आप से कहेगा कि आप मेरे साथ आइये हमारे जानकार से मिलिये. मैं मुलाक़ात फिक्स कर दूंगा. करेगा भी. हो सकता है कोई ‘ब्रदर’ उसके साथ आए, आप से प्रेमपूर्वक चर्चा करने. आप को दावत भी मिलेगी. Amway जैसे MLM तो अभी अभी आए हैं, M-way बहुत पुराना है.

अगर आप अंजान बने तो आप को कागज़ी अच्छाइयों के महल दिखाये जाएँगे. अगर आप ने मुद्दे उठाए तो बेहतर होगा आप किसी neutral जगह पर बैठे हों, उनके गढ़ में नहीं. ज़ाकिर नाईक के वीडियो देखे ही होंगे जहां सवाल करने वाले के इर्दगिर्द बेवजह आठ-दस जाली टोपी वाले मुस्टंडे आकर खड़े हो जाते थे.

अगर आप ने अपनी बात दृढ़ता से रखी तो दोस्ती खत्म होने की लगभग गारंटी है. और भी क्या-क्या हो सकता है इस पर अलग से लिखूंगा. लेकिन आप का मित्र भी शायद नहीं जानता कि उसका जो बर्ताव है वो भी Al Walaa wal Baraa के तहत ही है. क्या बला है यह “अल वला व’अल बरा”?

बड़ी सिम्पल और बहुत बड़ी बला है – जो अल्लाह + ह. मोहम्मद को चाहते हैं उनसे दोस्ती और मुहब्बत जायज़ और ज़रूरी, जो अल्लाह + ह. मोहम्मद का विरोध करते हैं उनसे दोस्ती या मुहब्बत करने की इजाज़त नहीं, भले ही वे आप के खून के रिश्तेदार भी क्यों न हों.

और आप क्या हैं अपने मोमिन दोस्त के? महज़ एक परिचित काफिर. वो तब तक ही आप का दोस्त रहेगा जब तक आप इस्लाम के बारे में सवाल न करें. अपमान की भी जरूरत नहीं, बस सवाल ही काफी है जहां उसका उत्तर आप को सही न लगे और आप उस पर अपने नीति-नियमों पर आधारित सवाल पूछें.

ऐसे सवालों से उसने पहना hu-MAN चोला फटकर अंदर से Musal-MAN बाहर आ जायेगा. नेट परिचितों से ही ज़्यादातर चर्चा करें, आत्मरक्षा आवश्यक होती है. और खयाल रहे, यह ज्ञान का उपयोग स्यूडो सेक्युलरों के बहकावे में आए लोगों की आँखें खोलने के लिए ही करें. इनके मतांतरण की कोशिश न करें, वक़्त के साथ जीवन भी बर्बाद हो सकता है.

सोशल मीडिया पर एक युवा मुझसे बहस कर रहा था. उस पर अलग से लिखा जाएगा, मैं ऐसे लोगों से बहस केवल हिन्दू प्रबोधन के लिए करता हूँ. उल्लेख इसलिए किया कि उसने कहा कि उसके कई हिन्दू दोस्त हैं जिनसे उसकी लगभग 15 साल से दोस्ती है. इतने सालों में उन्होने उसे जाना नहीं तो वो कैसी दोस्ती?

बात कहने-सुनने को ठीक है, लेकिन अक्सर यही होता है कि हिन्दू इन्हें बहुत ही कम जानते हैं. उतना ही जानते हैं जितना ये उन्हें जानने देते हैं. और जितना ये हिन्दू रीति रिवाजों का ज्ञान रखते हैं वो भी ऐसी प्रथाओं का, जिनको हमने ही कब का त्याग दिया है – उसकी तुलना में इनके हिन्दू मित्र इस्लाम के बारे में कुछ भी नहीं जानते होंगे. सेवइयाँ, सीरकोरमा और बिरयानी से ज्यादा कुछ नहीं जानते होंगे. न पूछा होगा, न बताया होगा.

मेरी बात पर न जाएँ, खुद ही आजमाएँ. बहुत आसान है, इस लेख को अपनी वाल पर शेयर करें या अपने ग्रुप्स में शेयर करें. फीडबैक आँखें खोलेगा पक्का. Goggles (धूप का चश्मा) साथ रखिए, अचानक रोशनी से आँखें चौंधिया जा सकती हैं.

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