वो चाँद की तरफ ऊंगली दिखाते हैं और हम ऊंगली को ही चाँद समझ लेते हैं

जोसुआ लिएबमेन करके एक यहूदी विचारक और पुरोहित था. उसने संस्मरण लिखा है कि जब मैं युवा था और पहली दफा गुरु के आश्रम में शिक्षा लेने गया, तो मेरा एक मित्र भी मेरे साथ था. हम दोनों को सिगरेट पीने की आदत थी. हम दोनों ही परेशान थे कि क्या करें, क्या न करें? सिर्फ एक घंटा मोनेस्ट्री के बाहर ईश्वर-चिंतन के लिए बगिया में जाने को मिलता था, उसी वक्त पी सकते थे सिगरेट, और तो कोई मौका नहीं था. लेकिन फिर भी यह सोचा कि पीने के पहले गुरु को पूछ लेना उचित है.

तो मैं और मेरा मित्र दोनों पूछने गए. जब मैं पूछ कर वापस लौटा तो मैं बहुत क्रोध में था, क्योंकि गुरु ने मुझे मना कर दिया था. और जब मैं बगीचे में आया तो मेरा क्रोध और भी बढ़ गया, मेरा मित्र तो आकर बेंच पर बैठा हुआ सिगरेट पी रहा था. मालूम होता है गुरु ने उसे हां भर दी है. यह तो हद अन्याय हो गया था. मैंने जाकर उस मित्र को कहा कि मुझे तो मना कर दिया है उन्होंने, क्या तुम्हें हां भर दी है? या कि तुम बिना उनकी हां किए ही सिगरेट पी रहे हो?

उस मित्र ने कहा कि तुमने क्या पूछा था?

लिएबमेन ने कहा, मैंने पूछा था कि क्या हम ईश्वर-चिंतन करते समय सिगरेट पी सकते हैं? उन्होंने कहा कि नहीं, बिलकुल नहीं. तुमने क्या पूछा था?

उसने कहा, मैंने पूछा था कि क्या हम सिगरेट पीते समय ईश्वर-चिंतन कर सकते हैं? उन्होंने कहा, हां, बिलकुल कर सकते हो.

ये दोनों बातें बिलकुल एक थीं: ईश्वर-चिंतन करते समय सिगरेट पीएं या सिगरेट पीते समय ईश्वर-चिंतन करें. लेकिन दोनों बातें बिलकुल अलग हो गईं. एक बात के उत्तर में उसी आदमी ने इनकार कर दिया, दूसरी बात के उत्तर में उसी आदमी ने हां भर दिया. निश्चित ही कौन स्वीकार करेगा कि ईश्वर-चिंतन करते समय सिगरेट पीएं? कौन अस्वीकार करेगा कि सिगरेट पीते समय ईश्वर-चिंतन करें या न करें? कोई भी कहेगा कि अच्छा ही है. अगर सिगरेट पीते समय भी ईश्वर-चिंतन करते हो तो बुरा क्या है, ठीक है.

********************************************

यह कहानी आज मुझे सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिली तो उन लोगों का ख्याल आया जो बब्बा के नीचे दिए गए लेख पर मुझे ऐसे प्रतिक्रिया दे गए थे, जैसे मैंने और बब्बा ने सिगरेट न पीनेवालों का अपमान कर दिया हो.

बब्बा कहिन : आपने सिगरेट पी, गए! आप आदमी नहीं रहे, कीड़े-मकोड़े हो गए!

बब्बा जब भी कुछ कहते हैं, तो शब्दों का चुनाव ऐसा होता है कि आपको लगेगा ये आदमी हमें उकसा रहा है. और वास्तव में ये सच भी है. गुरु का काम ही होता है उकसाने का, ताकि आपके अन्दर जो कचरा भरा है वो बाहर निकल जाए. तो उपरोक्त कहानी और बब्बा के इस प्रवचन में “सिगरेट” की कोई भूमिका ही नहीं है. जो कहा गया उसके पीछे जो अनकहा छूट रहा है उस पर हमारा ध्यान नहीं जाता.

वो चाँद की तरफ ऊंगली दिखा रहे हैं और हमारी नज़र ऊंगली से आगे नहीं बढ़ती. हम ऊंगली को ही पकड़ लेते हैं, फिर ना हमें चाँद दिखाई देता है ना उससे उतरनेवाली चांदनी. तो बब्बा के इस प्रवचन को एक बार फिर पढ़िए. वो ये नहीं कह रहे जो सिगरेट नहीं पीता वो अकड़ में है, वो कह रहे हैं जो सिगरेट पीता है वो अधिक विनम्र होते हैं.

सिगरेट न पीनेवालों की भावना का आहत होना ही आपके दंभ का सूचक है कि आप सिगरेट पीनेवालों का साधक होना स्वीकार नहीं कर पा रहे, बल्कि सिगरेट पीनेवाला, न पीनेवाले को भी सहजता से स्वीकार कर लेता है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY