इतनी विकसित कैसे थी सिंधु घाटी सभ्यता में नगर व्यवस्था

इस सवाल का वामपंथी इतिहासकार (Leftist Historians) के पास कोई जवाब नहीं है कि सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में जो नगर मिले हैं आखिरकार वो इतने विकसित और व्यवस्थित कैसे हैं? ये वामपंथी इस बात से प्रभावित कम, परेशान ज्यादा होते हैं क्योंकि उन्हें यह मंजूर ही नहीं कि हिन्दुस्तान सदियों पहले इतना विकसित हो चुका था. बहरहाल उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था कि भारत भूमि पर सभ्यता एकदम से सीधे इतनी कैसे विकसित हो गई क्योंकि विकासक्रम के कोई और प्रमाण उन्हें काफी समय तक नहीं मिले थे.

इस भ्रम से वामपंथियों के दो फायदे हुए, एक उन्हें अनेक नए झूठ को नए सिरे से गढ़ने का बहाना मिल गया, और दूसरा यह कि जो झूठ अब तक वे बोल चुके थे उसका समर्थन इस नए भ्रम से और अधिक मज़बूती से कर दिया. इस कड़ी में उनका सबसे बड़ा झूठ यही है कि आर्य बाहर से आये थे और उन्होंने आ कर सिंधु घाटी की विकसित सभ्यता को तहस नहस कर दिया.

ऐसा नहीं कि उपरोक्त सवाल का जवाब नहीं है. बिलकुल है. जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूँ, वेदों ने अपने अंदर उन दिनों की घटनाओं और विकासक्रम को समेट रखा है. ये तो हमारा दुर्भाग्य है कि हम ना तो वेदों को पढ़ते हैं, ना ही हमें पढ़ाया जाता है. हमें तो वामपंथियों का तोड़ा-मरोड़ा गया झूठ पढ़ाया जाता है. जिसमें वो हमें सच बतलाना ही नहीं चाहते. जिससे उनके झूठ की दूकान चलती रहे जिसका फायदा उन्हें मिलता रहता है.

उनका एक और झूठ है जिसमे उन्होंने यह घोषित कर रखा है कि सरस्वती एक काल्पनिक नदी है. जबकि सरस्वती के अस्तित्व का सत्य और तथ्य उपलब्ध है जो कि स्पष्ट है वो भी पूरे प्रमाण के साथ. ऋग्वेद में नदियों में सर्वप्रथम सरस्वती नदी का वर्णन आया है और वो भी प्रमुखता से. ऋग्वेद में सबसे पहले सरस्वती की ही स्तुति की गई है. सिंधु और गंगा आदि का जिक्र तो बाद में आया है. सरस्वती की विशालता, प्रबलता और वेग को लेकर अनेक ऋचाएं हैं.

वेदों के अध्ययन से यह पता चलता है कि जंगलों से निकल कर मानव ने जब कृषि की शुरुआत की तो सबसे पहले सरस्वती नदी की उपजाऊ जमीन को चुना. वे सबसे पहले सरस्वती के तट पर ही बसे थे. उन दिनों सरस्वती हर वर्ष एक विशाल उपजाऊ जमीन तैयार करके देती थी. जहाँ उसने धीरे-धीरे अपनी सभ्यता का विकास किया और आर्य कहलाये.

यहां उन्होंने संस्कृति के विकासक्रम में वेदों की भी रचना की और कृषि को उन्नत भी किया. सूर्य, अग्नि, वर्षा, इंद्र की स्तुति करते-करते उन्होंने अपनी सामाजिक, पारिवारिक और नगर व्यवस्था को भी विकसित किया. वे इसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित भी रहते थे. जिसका जिक्र वेदों में किया गया है. विशेषरूप से सरस्वती के बाढ़ के दौरान फैलाव से. ऐसी ही एक ऋचा में यहां तक कहा गया है कि अगर आपने अपना वेग और फैलाव यूं ही रखा तो हमें आपको (सरस्वती को) छोड़ कर अन्य स्थानों पर जाना होगा.

बहरहाल ऐसी ही एक भीषण बाढ़, जिसका वर्णन प्रलय के रूप में किया गया है, के आने पर सरस्वती से पलायन हुआ (इसका वर्णन विस्तार से अगली लेख में). सरस्वती घाटी से पलायन करके आर्य फिर सिंधु और गंगा किनारे बसने लगे. चूंकि तब तक वे नगर व्यवस्था को विकसित करना सरस्वती घाटी में सीख चुके थे, इस अनुभव से उन्होंने सीधे अपने लिए विकसित नगरों की स्थापना सिंधु घाटी में की. धीर-धीरे सरस्वती नदी सूख गई (जिसका कारण भी अगले लेख में आएगा). और इस तरह अंत में सरस्वती सभ्यता पूरी तरह सिंधु घाटी में जाकर शिफ्ट हो गई.

वेदों में इन सब घटनाक्रम का विस्तृत वर्णन है मगर जान बूझ कर इस कड़ी को तोड़ा मरोड़ा गया जिससे सिंधु से हिन्दू और आर्य बाहर से आये थे जैसे झूठ चलाये जा सकें. वो तो कालांतर में सरस्वती घाटी की खुदाई में अनेक प्रमाण मिलने लगे, जिसके कारण मोहनजोदड़ो-हड़प्पा की सिंधु सभ्यता को नया नाम सिंधु-सरस्वती घाटी सभ्यता इन्ही वामपंथियों को देना पड़ा.

सप्तसिंधु की इस महान भूमि पर, जहाँ सिंधु से लेकर गंगा, जिसके मध्य में नदियों की नदी सरस्वती बहती थी, हमारे पूर्वज आर्यों ने एक उन्नत सनातन सभ्यता विकसित की थी, जिसके अवशेष आज के बुद्धिजीवियों के लिए भी आश्चर्य का विषय बन जाते हैं. काश हम उस वैदिक संस्कृति की विरासत को समझ पाते?

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