डर से लड़िए, जीत का विकल्प नहीं है, क्योंकि डर के आगे शरिया है

जहां अगर चार मुस्लिम पुरुष गवाह न ला सकी (under sharia law) तो बलात्कार पीड़िता को मृत्यदंड दिया जाता है, पत्थर मार के. अब ये बताएं, बलात्कार कभी चार मुसलमान पुरुष गवाहों को साक्षी बनाकर किया जाता भी है भला? जहां आप अपने घर में पूजा नहीं कर सकते, करनी हो तो ऐसी करें जिससे मुसलमान डिस्टर्ब न हों. कल ही एक वीडियो देखा जहां एक ब्राह्मण को तीन मुसलमान पीट रहे हैं. गुनाह यह कि उसने पूजा के समय घंटनाद किया जो मुसलमानों को बुरा लगा. डाउनलोड कर रखा है, निश्चित रहें.

उमर का सुलहनामा पढ़ लीजिये. उसमें एक शर्त है कि काफिर अपने पुराने, जर्जरित होते मंदिरों की मरम्मत नहीं करेंगे. और हाँ, सऊदी (Saudi Arab), जहां गैर इस्लामी धर्म की किताब निजी अध्ययन के लिए ले जाना भी मना है, उसके बारे में आप ने सुना ही होगा? कैसे एयरपोर्ट पर ही अगर आप के सामान में गीता मिली तो फाड़ी जाती है? और सऊदी का दूसरे धर्मों के प्रति जो असहिष्णुता है उसका ज़ाकिर नाईक द्वारा बेशर्म समर्थन भी सुना होगा – गणित शिक्षक के उदाहरण वाला? सऊदी में शरिया है, पता होगा ही?

शरिया के तहत कड़ी सज़ाएँ मिलती हैं यह एक अर्धसत्य अपने यहाँ बहुत लोकप्रिय है. सत्य तो यह है कि यह न्याय मुसलमान प्रजा के लिए है जहां एक मुसलमान की गवाही दूसरे मुसलमान के बराबर मानी जाती है. यहाँ भी अलिखित स्थानिक भेद होते हैं. या कहिए प्रथाओं का पालन किया जाता है. जैसे अरब देशों में भारतीय या पाकिस्तानी मुसलमान की गवाही स्थानिक अरब के सामने बराबरी रखती है या नहीं, यह उसके नसीब का भाग है. अल्लाह मेहरबान होगा तो शायद मानी जाये.

इस्लाम की उल्लेखनीय विशेषता है कि वो आप की जिंदगी के हर पहलू में हस्तक्षेप करता है. साधारण जिंदगी का कोई भी पहलू अछूता नहीं है और हर बात पर आप की शिकायत और सज़ा का प्रावधान है. कम से कम आप को अपराधबोध कराया जाएगा जिससे आप अंतिम क्षण को भी पीड़ित रहेंगे कि इसकी मौत के बाद क्या सज़ा मिलेगी.

अस्तु, यह हुई इल्हामियों की बात, लेकिन उनकी जो सीख है कि मुल्क में इबादत सिर्फ अल्लाह की हो, उनके हर धार्मिक उन्माद और उपद्रव की जड़ है. क्योंकि उससे यह विचार निकलता है कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत होने नहीं देना, यह भी मुसलमान के लिए जरूरी है, मुल्क में शिर्क याने अल्लाह के सिवा किसी और की पूजा होने देना इस्लाम के मानने वालों के लिए लांछन की बात है. और अधिक से अधिक ज़मीन इस्लाम के ताबे में लाना तो हर मुसलमान का टार्गेट तो होता ही है.

इसीलिए मुसलमान का, यानी पर्याय से इस्लाम का डर फैलाना मुसलमानों की नीति रही है. पहले हिंसा करके दिखाना और बाद में उस हिंसा का डर दिखाना, यह इस्लाम का operative principle होता है, यह वाक्य स्मरण रहे. इसी के तहत वे शांति का सौदा करते हैं. डरो, जो मांगा जाए, दे दो, अगर हम से शांति चाहिए तो.

और सब से मज़े की बात यह है कि ऐसे करने में वे तो अपने धर्म का ही अनुसरण कर रहे हैं, आप अगर न मानें तो आप पापी है और अल्लाह का हुक्म न मानने के कारण दोषी हैं, दंड के भागी हैं.

आप खुद भी इस्लाम का निष्पक्ष अध्ययन कर के इसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं. निष्पक्ष का अर्थ एक ही है, केवल ग्रंथ के तौर पर कुर’आन, सिरा और हदीस का अध्ययन करें, ईश्वर की दी हुई स्वतंत्र बुद्धि अरब के पास गिरवी न रखें. श्रद्धा आप को निष्पक्ष नहीं रहने देगी.

वैसे, डर मनुष्य को वीर भी बनाता है. अगर आप को डर है कि आप की बेटी या नाती पोती के नसीब में बुर्का नामक काले तिरपाल का अंधेरा आयेगा, तो विदेश भागने की सोचिए मत, इस डरावनी संभावना का डटकर सामना करिए.

एक बात ध्यान रहें, मुसलमानों के सभी आक्रमणों और अत्याचारों में अल्लाह का डर भी होता है. जहां वे दबंगई कर सकते हैं वहाँ अगर काफिरों को शिर्क करने दिया, उसे रोका नहीं तो भी ये उनकी नज़र में इस्लाम के प्रति कर्तव्य में कोताही होती है, अल्लाह को इसका क्या जवाब दें यह डर ही होता है.

शरिया से डरेंगे तो ही मुसलमान से लड़ सकेंगे. मुसलमान से डरेंगे तो… डर के आगे शरिया है! फिर हिंदुस्तान को सीरिया बनाएगा मुसलमान. बस आप के लिए कहीं शरण नहीं मिलेगी, सब जगह शरणार्थी बनाकर आक्रमण किए हुए मुसलमान आप को अर्थी देने तैयार होंगे. डर से लड़िए, जीत का विकल्प नहीं है, क्योंकि डर के आगे शरिया है.

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