ज़िंदगी का रोजनामचा : किताबों का सफ़र

अक्सर एक लम्बे सफर के बाद थकान सी आ जाती है
और ज्यादातर वो थकान सफर से नहीं, बल्कि उसके खत्म होने से होती है
कभी कभी ये किसी किस्से को सुनने के बाद भी आती है
या फिर किसी किताब को पढ़ने के बाद

कभी मोहन राकेश को पढ़ के ऐसी ही थकान आयी थी
जैसे किसी आधे – अधूरे सफर से लौट गया हूँ

या फिर इस्मत आपा और अमृता को पढ़ने के दरमियान
जैसे मैं जड़ हो गया हूँ एकदम काठ, मृतप्राय सा

मगर मिर्ज़ा साहब को पढ़ कर आयी थकान का कोई सानी नहीं
और मंटो को सुन कर भी,
मंटो को पढ़ते हुए मैं जैसे मंटो को सुनता हूँ

मंटो मुझे झझकोरता है और जलील भी करता है
एकदम लाचार हो जाता हूँ मैं जैसे किसीने बाँध दिया हो

इस बार तो जैसे मैंने
अपने आप को परखने के लिए आग के हवाले कर दिया
जब मैंने मिर्ज़ा साहब और मंटो को साथ में सुना

कहीं दूर से आती आवाज़ों के मानिंद सुनाई दे रही थीं उनकी आवाज़ें
और मेरी आत्मा को चीरती हुई उस पार चली जा रही थी
मैं तब से यहीं खड़ा हूँ फिर किसी आवाज़ के इंतज़ार में

अब न कोई सफर शुरू होता है
और न ही ये थकान उतरती है

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