भंगी और मनुस्मृति : मनुस्मृति तो खैर पढ़ने से ज़्यादा जलाने के लिए छापी जाती है

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भंगी वो जो मैला ढोवे, मैला मने ‘मल’. मल को हम ‘मल’ नहीं कहते, सीधा शब्द इस्तेमाल नहीं करते. दीर्घशंका जैसे संदेहास्पद शब्द इस्तेमाल कर लेंगे, कुछ लोग तो पाकिस्तान भी कह देंगे. कहने का मतलब ये कि हम जिस चीज के लिए इस्तेमाल किये गए शब्द तक से इतनी घृणा करते हैं तो इसे उठाने, फेंकने, साफ करने वाले आदमी से कितनी करते होंगे. और ये कोई एक व्यक्ति नहीं है, पूरी एक जाति है, नाम भले ही भंगी हो, मेहतर हो या पवित्र नाम वाल्मीकि हो.

इस मैला ढोने की प्रथा और इससे सम्बंधित लोगो को भंगी कहे जाने का जिम्मेदार हिन्दू समाज की वर्ण व्यवस्था को माना जाता है. इसे सिद्ध करने के लिए वाजसनेयी संहिता, नारद संहिता, मनुस्मृति जैसे कुछ ग्रन्थों से उठाई गई कुछ पंक्तियां सामने रख दी जाती हैं.

ये ग्रन्थ आपस में कई बार बिलकुल विपरीत बात करते हैं. इनके अंदर भी अंतर्विरोध दिख जाएगा, जैसे मनुस्मृति के कुछ हिस्सों में चांडाल के प्रति भेदभाव है तो वहीं कई जगहों पर ये भी कहा गया है कि मनुष्य सिर्फ जन्म से ही मनुष्य नहीं बनता, संस्कार और शिक्षा उसे मनुष्य बनाते हैं. अब कर लो इसे जैसे मन, वैसे परिभाषित.

मनुस्मृति धर्मशास्त्र तो है पर ये प्राचीन भारत की कानून व्यवस्था का आधार कैसे हो गया, जबकि ये तक नहीं पता कि इसे लिखा किसने है. अनुमान ये है कि कई लोगों ने वर्षों इसके अलग अलग हिस्से लिखे और मनु नामक एक पात्र को समर्पित कर दिया.

विश्वास की आंखों देखें तो ये मनुस्मृति अपने आप में धर्म की सम्पूर्ण परिभाषा नहीं है. ये वैसा नहीं है जैसा मुस्लिमों का कुरान है या ईसाइयों का बाइबल है. ‘वेद’ का स्थान इस ‘स्मृति’ से बहुत ऊपर हैं, वे भी एक नहीं चार-चार, फिर छह वेदांग, 108 उपनिषद, महाकाव्य रामायण व भगवदगीता सहित महाभारत, अलग अलग पंथों के आरण्यक ग्रंथ, 11 ब्राह्मण श्रुतियाँ, 18 महापुराण, शैव, वैष्णव, शाक्त और जैन धर्म के विभिन्न आगम शास्त्र, फिर इन सबके अलावा 22 स्मृतियां हैं जिनमें से एक है मनुस्मृति.

इतने अधिक ग्रन्थों में से क्यों इस एक मनुस्मृति को आधार बना दिया गया प्राचीन भारत की कानून व्यवस्था का?

न्यायालय में जब भी कोई मुलजिम आता है तो न्यायाधीश उस व्यक्ति के सामाजिक, धार्मिक व्यवहार को समझना चाहता है, जिससे सही फैसला दे सके. अंग्रेज शासकों को ये लगा कि जैसे कुरान से मुस्लिम समाज को समझ सकते हैं, हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था को भी किसी किताब से समझा जा सकेगा. राजधानी बंगाल में पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने निर्देश दिया कि एक हिंदू-लॉ बनाया जाए. 18वीं शताब्दी में 11 ब्राह्मणों को इसके लिए नियुक्त किया गया. मजेदार बात ये थी कि तब अंग्रेज, ब्राह्मणों को आचार्य नहीं हिंदुओं का वकील समझते थे.

हिन्दू-विधि बनी जिसे संस्कृत से फ़ारसी में, फिर फारसी से अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया गया. इस हिन्दू-विधि को पढ़ अंग्रेजों की समझ में आया कि हिन्दू ग्रन्थों में तो खूब टीका टिप्पणी हैं, एक-एक लाइन की कई-कई व्याख्याएं हैं तो अंग्रजों ने अपनी व्याख्याएं तय करने के लिए ग्रन्थों का अध्ययन खुद करने का निर्णय लिया.

कोलकाता के पूर्व न्यायाधीश विलियम जोन्स ने संस्कृत सीखी. आगे चलकर ये प्रसिद्ध भाषाशास्त्री बने और इन्होंने एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की. मनुस्मृति का पहला अंग्रेजी अनुवाद इन्होंने ही किया. इस अनुवाद को पढ़ भारत के प्रति बहुत सारे यूरोपीय विद्वानों की रुचि बढ़ी. जर्मन दार्शनिक लेखक Friedrich Nietzsche ने मनुस्मृति में मानव समाज के लिए आदर्श व्यवस्था देखी.

चूंकि हिंदुओं की कोई संस्था ‘चर्च’ नहीं थी, हिंदुओं का कोई ‘पोप’ नहीं था तो यूरोपियन्स जो भी व्याख्या दें वो सही. इस आपाधापी में मनुस्मृति कानून व्यवस्था का आधार बन गई.

मनुस्मृति में कुछ भी हो, कानून व्यवस्था का खाका तो बिलकुल नहीं है. फिर भी कुछ बातों को लेकर यही साबित किया गया. यह नजरअंदाज कर दिया गया कि न जाने कितनी जातियां वर्णाश्रम में फिट नहीं बैठती, ना ही उन्हें चांडाल कहा जा सकता था. यहां तो एक जाति कई सारे काम करती थी, जातियां बदल भी जाती थी. एक से अधिक सामाजिक व्यवस्थाएं थी जो समय-समय पर बदलती रहती थी.

तो इतने ज्यादा घालमेल को समझना मुश्किल था, उन्हें तो सीधी-सादी परिभाषा चाहिए थी कि फलाना जाति फलाना काम करती है. इसे प्लेट में सजा कर दिया 19वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेज सरकार की जनगणना ने. इतिहासकार सिद्ध कर चुके हैं कि यूपी के खेतिहर समाज को जनगणना में चमार की श्रेणी में डाला गया. समाजशास्त्री विजय प्रसाद ने 1990 के अपने अध्ययन में पाया कि 19वीं शताब्दी की शुरुआत में पंजाब के चूड़ा समाज के लोग कारीगर, खेतिहर, कुम्हार, चर्मकार, गवैया, संगीतकार, दाई, हरवाहे सब कुछ होते थे, सफाई का काम बहुत छोटा हिस्सा किया करता था (ये शोध प्रामाणिक माना जाता है). लेकिन जनगणना में इन्हें सफाई कामगार का लेबल दे दिया गया. अब यही उनकी पहचान है. मुम्बई में बसे गुजराती वणकर हों या राजस्थानी मेघवाल, सबकी यही कहानी है.

कुछ लोगों का ये भी मानना है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हारे हुए भारतीय लड़ाकों को अपमानित करने के लिए उनसे मैला उठवाने जैसा घृणित काम करवाया. जाति भंग, भंगी कहलाये. यह भी सिद्ध है कि भारत में मुस्लिम शासकों से पहले मैला ढोने के प्रमाण नहीं मिलते. चूंकि मुस्लिमों में पर्दा प्रथा है, महिलाएं बाहर जा नहीं सकती तो ये तर्कसंगत भी लगता है. तर्कसंगत है, प्रमाणित नहीं.

पर समझ में ये नहीं आता कि अगर हिन्दू धर्म की वजह से भंगी हैं तो धर्म बदलने के बाद भी ये भंगी कैसे रह जाते हैं. मुस्लिमो में भी भंगी होते हैं, कहीं-कहीं अलग मस्जिद तक दिख जाती हैं. सिक्खों में भी है भेदभाव और ईसाइयों में भी दिख जाता है. दरअसल इनकी स्थिति में सुधार की कोई कोशिश की ही नहीं गई, बस आरोप प्रत्यारोप के लिए किसी ने मनुस्मृति खोज ली तो किसी ने मुस्लिम आक्रांता की थ्योरी. मुस्लिम आक्रांताओं वाली बात सही है तो अब इन भंगियों को वापस पूरी इज्जत से स्वीकार करने में क्या दिक्कत है?

दिक्कत तो है ना, फिर आपका ‘मल’ कौन साफ करेगा? आपको भी तो अपनी सुविधा देखनी है.

सेनिटेशन का क्या है, वो तो सरकार करवाएगी.

और मनुस्मृति तो खैर पढ़ने से ज्यादा जलाने के लिए छापी जाती है.

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