केवल निजी लाभ-हानि समझता है हिन्दू, इन्हीं से जोड़ कर समझाया जाये उसे

एक महत्व का विमर्श है और लंबी बात है. हम जितना भी इस्लाम का विरोध करता साहित्य पढ़ते हैं उसमें ह. मुहम्मद के चरित्र के विशेष प्रसंगों को और कुर’आन की हिंसक और विद्वेषमूलक आयतों को हाइलाइट किया जाता है. क्या यह अप्रोच सही है?

इसका तर्कशुद्ध उत्तर ये है :

1. हम जो भी यह साहित्य पढ़ते हैं, इंग्लिश में, नेट पर पढ़ते हैं या नेट द्वारा मँगवाते हैं. ये साहित्य भारत में निर्माण नहीं होता, ना ही वे सभी लेखक भारतीय हैं. ये सभी लेखक पश्चिमी हैं और उनका लिखा साहित्य वहाँ के लोगों के लिए, वहाँ की समस्याओं को लेकर है. उनकी समस्या भारतीय हिंदुओं से अलग है, जिसे समझना हमारे लिए आवश्यक है ताकि कोई संभ्रम न हो.

2. शुरुआत में ही यह बात पक्का समझ लें कि इस्लाम के मुताबिक यहूदीयत (Judaism) और इसाइयत (Christianity) ये दोनों ही इस्लाम के पूर्ववर्ती और एक ही परमेश्वर द्वारा प्रकट किए मजहब – रिलीजन हैं. इसके समर्थन में बताया जाता है कि कुर’आन में सभी यहूदी नबियों का – पैगम्बर (परमेश्वर का पैगाम देने भेजे गए लोग)का – पूरे आदर के साथ उल्लेख किया गया है. ईसा को भी नबी का दर्जा है. मुसलमान, यहूदी धर्म और इसाइयत को गलत नहीं मानता, अल्लाह के ही प्रकट किए मार्ग मानता है. यहूदी और ईसाई, दोनों उसके लिए अहल ए किताब क़ौमें हैं. सारा झगड़ा केवल एक ही बात को लेकर है कि यहूदी और ईसाई, ह. मुहम्मद को अपने परमेश्वर का आखिरी तो छोड़िए, पैगम्बर भी नहीं मानते.

आज की कम्प्युटर की परिभाषा में समझें तो यहूदीयत Windows 95, इसाइयत Windows 98 और इस्लाम Windows XP है, जो उनके मुताबिक फुल एंड फ़ाइनल अपग्रेड है, उसके बाद कोई अपग्रेड नहीं होने वाला. ऑपरेटिंग सिस्टम का बेस एक ही है – विंडोज़ – लेकिन पुराने वर्जन आउटडेटेड होने के कारण उन्हें सपोर्ट नहीं मिलेगा, XP में अपग्रेड अनिवार्य है. और हाँ, अपग्रेड के लिए पैसे देने होंगे और नियमित देते रहने होंगे. ऑफिस मक्का में शिफ्ट हुआ है. यरूशलम और वैटिकन की ब्रांचेस बंद की गयी हैं, अब वहाँ पैसे न दें. इसमें मज़ाक की बात छोड़ें तो वास्तविकता यही है. अपनी पहचान मिटाकर अपने धन के स्रोत इस्लाम के हवाले करना. झगड़ा यही है.

3. आशा है मुद्दा क्रमांक 2 आप को सही ढंग से समझ में आ गया हो. यहूदी बहुत ही साईंटिफ़िक दृष्टिकोण के लोग हैं, परंतु उन्होने अपने धर्म में अपनी पहचान जानकर उसका मज़ाक नहीं उड़ाया, उसे खोखला नहीं बनाया. प्रबुद्ध समाज रहा है, धन, धर्म और पहचान को अगर सब से अधिक कोई समझता है तो यहूदी है. लेकिन इसाइयत का नसीब इतना अच्छा नहीं रहा. चर्च के अड़ियल रवैये ने उसका नुकसान किया. जो बातें विज्ञान और तर्कसंगत न थी उनका मज़ाक उड़ाया जाने लगा. लोग खुद ही मज़ाक उड़ाने लगे, रही सही जो भी कमी थी वहाँ के वामियों ने पूरी कर दी. श्रद्धा को पोषित करने वाली जड़ें हँसिये ने विज्ञान की धार से काट दी.

4. लेकिन श्रद्धा मनुष्य की आवश्यकता है. श्रद्धा वो लंगर होता है जो मन के जहाज़ को भटकने से बचाता है. भटकता मन वो जहाज होता है जो कहीं न कहीं अपनी श्रद्धा का लंगर डालने की खोज में रहता है. यहाँ इस्लाम ने एंट्री ली. और यहाँ आप से विनती है कि ऊपर दिया हुआ मुद्दा क्रमांक 2 फिर से पढ़ें जहां इस्लाम ने खुद को इसाइयत के अगले संस्कारण के रूप में प्रस्तुत किया. लोगों को बताया कि वो ह. मुहम्मद और इस्लाम ही है जिनका वादा बाइबल में किया गया है. अगर न होता तो इस्लाम यहूदियत और इसाइयत के प्रति आदर कैसे जताता, उनके नबियों को कैसे अपने नबी मानता? यह इसीलिए है कि इस्लाम वाकई उनका अगला संस्कारण है, विंडोज़ 95 और 98 के बाद का विंडोज़ XP है.

5. भटकते ईसाई झांसे में आए और इस्लाम को वहाँ काफी स्वीकृति मिली. वैसे भी वहाँ वामियों ने परिवार संस्था को काफी तोड़ रखा है जिसके कारण भी पश्चिमी लोग बहुत अशांत हैं, खास कर के वहाँ की युवा और महिलाएं. इस्लाम में परिवार संस्था का महत्व है यह भी बात उन्हें आकर्षित करती है. मानसशास्त्र से संबन्धित लोगों को यह खेल झट से समझ में आयेगा. इस्लाम वहाँ लोगों को आकर्षित करने लगा और खुद को world’s fastest growing religion प्रचलित करने लगा. यह प्रचार भी लोगों को आकर्षित करने लगा जिससे ईसाई समाज के पुरोधा विचलित हुए.

6. इसाइयत भी एक सुसंगठित रिलीजन है, आखिर रोमन साम्राज्य ही उसकी नींव है. रोमन सम्राट ने इसाइयत को स्वीकार किया यह प्रचार है लेकिन अगर हम ये कहें कि रोम के साम्राज्य ने इसाइयत को आत्मसात किया, तो रोमन कैथॉलिक चर्च का साम्राज्य इतना कैसे बढ़ा यह बात समझना आसान हो जाता है. उसने अभ्यास के साथ अपनी प्रतिक्रिया दी जिसमें ह. मुहम्मद के चरित्र की प्रस्तुति मायने रखती है.

7. इसाइयों की आस्था चर्च से हटी थी, ईसा से नहीं. इस्लाम उनके लिए इसलिए स्वीकार्य हुआ क्योंकि इस्लाम में भी ईसा नबी ही है, उसका आदर है. इसलिए चर्च की प्रतिक्रिया में ईसा के चरित्र के साथ ह. मुहम्मद के चरित्र की तुलना एक परिणामकारक उपाय था. उनके चरित्र के विविध प्रसंग एवं कुर’आन के विविध आयतों तथा विविध हदीसों के साथ इसाइयों ने इस्लाम की तरफ आकर्षित होते युवाओं के सामने तर्क रखे कि ईसा और ह. मुहम्मद की तुलना ही कैसी? क्या वो एक ही परमेश्वर ऐसे चरित्र के व्यक्ति को ईसा के बाद अपना पैगम्बर बना भी सकता है?

8. तर्कों को खोजने वाले और इस्लाम की तरफ बह निकले इसाइयों के लिए ये विचारधारा कारगर साबित हुई. इसके साथ हमें यह भी समझना होगा कि पश्चिम में सरकारें ईसाई हैं. इस्लाम का संकट समझ रही हैं. चर्च की वहाँ राजनीति में पैठ भी है. इसलिए ऐसा साहित्य प्रकाशित होने में कोई अवरोध नहीं हुआ. ह. मुहम्मद की अवांछनीय छवि प्रस्तुत करने में किसी को वहाँ असुविधा नहीं है.

लेकिन भारत में वो स्थिति नहीं है और न रही है. आज भी अगर ह. मुहम्मद के बारे में कुर’आन-सिरा-हदीस के सबूतों के साथ सत्य भी कहा तो भी मुसलमान दंगे पर उतारू होते हैं और सरकार जिस किसी भी दल की भी हो, उनके ही पक्ष में कार्रवाई करती है. इसलिए ही इस्लाम का विरोध करने में ह. मुहम्मद, कुर’आन और इस्लाम को कठघरे में खड़ा न करें, समस्याएँ आएंगी, अपनों से ही विरोध होगा और आप की बात सुनी भी नहीं जाएगी.

भारत की समस्या अलग है, क्योंकि हमारी इस विषय में सोच अलग रही है. उसका समाधान भी अलग होगा, इसाइयत वाला नुस्खा कारगर नहीं होगा.

सोचिए क्या हो सकता है जिसे सेक्युलर या ‘संभ्रांत’ हिन्दू सुनेगा, उस पर सोचेगा, संवाद के लिए बैठेगा, तभी सहायता की बात भी सुनेगा. स्मरण रहे, उसको स्टॉकहोम सिंड्रोम और तत्काल, क्षणिक स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचने को प्रेरित करना होगा. कौन सा स्वार्थ होगा जो आप उसे समझा सकेंगे? स्वार्थ को इगनोर नहीं कर सकते आप, सब से बड़ी भूल होगी, आप त्याग की बातें करने लगेंगे तो वो आप को ही त्याग कर चला जाएगा. समय के अनुसार चलिये!

और हाँ, राजनेताओं के भरोसे न रहिएगा. वे कब सेक्युलर बन जाएँ और खुद न पहनी टोपी आप को पहना दें, कौन कह सकता है?

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