दीन हीन नहीं थे आपके इतिहास पुरुष : विश्वास नहीं होता तो इसे अवश्य पढ़ें

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हम बड़े अजीब टाइप के लोग हैं. हम खुद ही अपने आप को दुनिया में सबसे गया-बीता मानते हैं, और अगर हममें से कोई हमारी बड़ाई दिखाता/बताता है तो उसका उपहास उड़ाने में सबसे आगे रहते हैं.

जब हम ‘गणेश के सर’ या ‘धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों’, या ‘पुष्पक विमान’ का जिक्र करते हैं तो उपहास उड़ाने वाले हमसे सबूत मांगते हैं, जो हमारे पास नहीं होते और हम मजाक बनकर रह जाते हैं. ऐसे मुद्दे पर अड़े ही क्यों जिसका सबूत नहीं दे सकते, अपनी श्रद्धा बनाये रखिये और उन मुद्दों को लीजिये जिसके पुख्ता सबूत मौजूद हों.

जैसे, हमारा मानना है कि विष्णु के तीसरे अवतार ‘वराह’ थे जिन्होंने समुद्र से पृथ्वी को अपने दांतों पर रख निकाला था. यहां एक बात हमें नहीं पता कि ये ‘समुद्र’ क्या है, क्योंकि हमारे समुद्र तो पृथ्वी के ही भाग हैं. इसी बात पर हमारा मजाक भी बनता हैं, पर हम इस पर ध्यान नहीं देते कि वराह के दांतों पर उठी हुई पृथ्वी ‘गोल’ है. हमारे शास्त्रों में भी उसे भू-गोल कहा गया है. हम इस पृथ्वी को ‘जगत’ भी कहते हैं, जिसका मतलब है, ‘जिसकी गति है वो’.

तो चार-पांच हजार साल पहले हमें ये पता था कि पृथ्वी गोल है और स्थिर नहीं है, गतिशील है. पाश्चात्य विज्ञान ने इसकी कब खोज की, ये आप सबको पता ही होगा.

अंतरिक्ष में 15वां सबसे चमकदार तारा है Antares, मतलब इससे ज्यादा चमकदार 14 तारे और हैं. पर इसके बाद भी इस Antares को हमारे यहां ‘ज्येष्ठ’ कहा गया. 14 तारों को छोड़कर इसे ज्येष्ठ (मतलब बड़ा) कहा गया, 5-7 हजार साल पहले. आज हम जानते हैं क्यों, क्योंकि ये अब तक का (आधुनिक) इंसान द्वारा खोजा गया सबसे बड़ा तारा है, हमारे सूर्य से 40,000 गुना बड़ा.

सप्तऋषि तारामंडल (ग्रेट बेयर कॉन्स्टेलशन) से आप सभी परिचित होंगे. हमारे दक्षिण भारत में शादी के बाद नवदम्पत्ति एक परम्परा के अनुसार रात में इस तारामंडल के वशिष्ठ (Mizar) तारे को देखते हैं, उत्तर भारत में भी अधिकांश जगहों पर इस तारे का वर्णन किया जाता है. क्या खास है इस तारे में?

दरअसल ये एक नहीं दो तारों का समूह है, वशिष्ठ-अरुंधति, द्वितारा प्रणाली. अमूमन द्वितारा प्रणाली में एक तारा दूसरे का चक्कर लगाता है (पति-पत्नी को ऐसा तो नहीं होना चाहिए), पर ये तारे एक-दूसरे का चक्कर लगाते हैं. सोचिये, इतनी दूर नन्हें से बिंदु जैसे तारों को देखना, उनके चक्कर लगाने का पैटर्न देखना, वो भी बिना टेलिस्कोप के, कब? जब यूरोप किसी को इस बात के लिए जेल में डाल रहा था कि सूरज नहीं, पृथ्वी चक्कर लगाती है सूरज के, इससे हजारों साल पहले.

ये तो था अंतरिक्ष विज्ञान, अब रसायन.

भारत में 2 लोहे के खम्भे ऐसे हैं जिनमें जंग नहीं लगती. एक तो है कुतुबमीनार के सामने, दूसरा है बैंगलोर के पास कुल्लुर में. दिल्ली का प्रदूषण भी जंग नहीं लगा पाता और कुल्लुर में 6-8 महीने 750 सेंटीमीटर बारिश होती है. ये दिल्ली वाला पिलर पिछले 2400 सालों से ऐसे ही खड़ा है. कुल्लुर वाले पिलर की मनोरंजक बात ये है कि इसे विद्वान विशेषज्ञों ने नहीं वहां के आम मूल-निवासियों ने बनाया था, आदि शंकराचार्य के स्वागत/सम्मान में. मतलब वर्षों पहले ये जंगरोधी तकनीक सामान्य गांव वालों तक को पता थी.

जिंक आसवन (डिस्टिलेशन) भी एक उदाहरण है हमारी रसायन विज्ञान में निपुणता का. हम सैकड़ों साल पहले इसकी विधि जानते थे, पूरे विश्व में सिर्फ हम जिंक बनाते थे. जबकि विलियम चैंपियन 1543 में पहला कारखाना लगा पाए ब्रिटेन में.

एक श्लोक है कृष्ण का:

गोपी भाग्य मधुव्रता श्ऋङ्गीशो दधिसन्धिग.
खलजीवति खाताव गलहालारसन्धर..

सामान्य सा श्लोक लगता है ये. पर इसे ‘कटपयादि संख्या’ से डिकोड करें तो ये देता है pi का 31 दशमलव तक का शुध्द मान (pi=3.1415926535897932384626433832792). संगीत में रुचि रखने वाले मित्रों ने इसका नाम सुना होगा. ये एक भारतीय नंबर सिस्टम है जिसमें …, छोड़िये गूगल कर लीजिएगा.
मतलब हम क्रिप्टोग्राफी/इनक्रिप्शन जानते थे.

वास्कोडिगामा का नाम तो खैर सबने सुना होगा. इन्होंने ‘भारत की खोज’ की थी. ये महाशय पुर्तगाल से निकले भारत को खोजने, पर इतने डरपोक थे कि जमीन के किनारे किनारे चले, मतलब रहे समुद्र में पर जमीन दिखती रही. चलते चलते महाद्वीप के अंतिम छोर ‘केप ऑफ गुड होप’ पहुंचे. अब आगे कैसे जाए, क्योंकि अब तो खुला समुद्र था, कोई धरती नहीं. तो इन्हें वहां मिले एक अपने गुज्जु भाई, श्रीमान ‘कान्हा’, एक भारतीय गुजराती व्यापारी. वास्कोडिगामा के पास यूरोप का सबसे बड़ा जहाज था, और कान्हा का मुख्य जहाज इस जहाज से 12 गुना बड़ा. तो कान्हा जी ने अपने तीन जहाजों की सुरक्षा में इन महान खोजी को गोवा के तट पर पहुंचाया.

कोरी गप्प नहीं है ये, इनके खुद के लिखे जर्नल में रिकॉर्ड है ये सब, जो आज भी लिस्बन में रखा हुआ है.

मतलब हम इंजीनियरिंग जानते थे, नेविगेशन जानते थे.

हमारी बुरी आदत है कि या तो हम खुद पर शर्मिंदा होते हैं या खुद को ऊंचा मान दूसरों की खिल्ली उड़ाते हैं. अपने इतिहास को जानिये, उस पर गर्व कीजिये, दीन हीन नहीं थे आपके इतिहास पुरुष. पर गर्व कीजिये, अहंकार नहीं.

सवाल ये उठता है कि उन्हें अंतरिक्ष से लेकर परमाणु तक की जानकारी कैसे थी? छोड़िये, आप PT कीजिये, योग तो मजाक की चीज है.

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