दक्षिण के माने जाने वाले राजा बलि के नाम पर बिहार में क़िला! क्यों नहीं मिला उचित प्रचार

हाल ही में एक अज्ञात सी, नक्सली किस्म का साहित्य लिखने वाली की जब आपसी लूट के बंटवारे में हत्या हो गई तो लोगों ने उसका फेसबुक वाल भी छानना शुरू किया था. वहां कई लोगों को हाल में ही बीते ओणम पर्व के उपलक्ष्य में लगाया एक कार्टून भी दिख गया. उसमें राजा बलि किसी ब्राह्मण को कचरे के डब्बे में डालते दिख रहे थे. ऐसे कार्टून के जरिये क्षेत्रवाद को उकसाना कोई बड़ी बात नहीं है. कम्युनिस्टों के 1931 के दौर के नाज़ी सहयोगी गोएबेल्स के काल से ही कामरेड ये तकनीक सीख चुके थे.

किस्मत से जिस राजा बलि को आम तौर पर दक्षिण भारतीय और द्रविड़ बताया जाता है, उनका किला बिहार में है. राजा बलि के बिहार से इस सम्बन्ध को अज्ञात कारणों से जमकर कागज़ काले करने वाले एक ख़ास आयातित विचारधारा के लोगों ने कभी तरजीह ही नहीं दी. किसी दौर में बिहार का मॉस्को कहे जाने वाले बेगुसराय के कॉमरेड इसके बारे में लिखने से हिचके. ज़मीन विवाद में जब बिहार का मॉस्को ख़त्म हो रहा था तब नौकरी की तलाश में अखबार, प्रकाशन, विश्वविद्यालयों में पैठ जमाते गिरोहों ने इसे भुलाए रखना ही ठीक समझा.

राजधानी पटना से करीब ढाई सौ और मधुबनी जिले के मुख्यालय से करीब तीस-पैंतीस किलोमीटर दूर बलिराजगढ़ का इलाका शुरू होता है. बाकी मिथिलांचल की तरह ही बाढ़ और उपेक्षा के शिकार इस इलाके में, प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक राजा बलि का किला, यानि बलिराजगढ़ है. ये इलाका करीब पौने दो सौ (175) एकड़ में फैला हुआ है. थोड़े समय पहले ही (2015 में) यहाँ खुदाई रुकवाई गई है. पुरातत्व विभाग की खुदाई में यहाँ से जो किला मिला वो ईसा से दो शताब्दी पूर्व का माना जा रहा है.

सन 2014 में यहाँ की खुदाई में पुरातात्विक महत्व की करीब 400 वस्तुएं निकली थी. इसमें मिट्टी और टेराकोटा के बने जानवरों और इंसानों के खिलौने-पुतले हैं, चूड़ियाँ हैं, कीमती पत्थरों की मालाएं भी हैं. ASI द्वारा संरक्षित ये किले के अवशेष फिलहाल प्रचार से दूर हैं. यहाँ से शुंग और पाल वंश तक की वस्तुएं, सिक्के इत्यादि मिले हैं. माना जा रहा है कि पाल वंश का शासन आने तक ये किला इस्तेमाल में था. इतिहास कहते ही जो मैथिल, सीधा पौराणिक राजा जनक पर कूदते हैं, वो भी ये बीच का स्टेशन एक्सप्रेस गाड़ी की तरह छोड़ जाते हैं.

बिहार में मौजूद ऐतिहासिक महत्व की ऐसी जगहें पर्यटन स्थल क्यों नहीं हैं? इन्हें उचित प्रचार क्यों नहीं मिलता? दो हजार साल से ज्यादा पुराने बिहार के एक किले का सम्बन्ध तथाकथित रूप से दक्षिण के माने जाने वाले राजा बलि के नाम पर क्यों है? सवाल कई हैं, समस्या ये भी है कि कोई प्राइम टाइम में पूछता भी तो नहीं! अफ़सोस छेनू यहाँ नहीं आया था.

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