कौलान्तक पीठ -2 : हठयोगियों का गुप्त संसार, साधकों का स्वप्न स्थल

कौलान्तक पीठ जिसकी सुन्दरता किसी को भी मोह ले. देवता जहाँ रहते हैं. ऋषि मुनियों के प्राण जिस धरा के लिए तरसते रहते हैं. स्वर्ग के समान जो अति सुन्दर धरती है. विविध सौन्दर्य, वन प्रदेश, मीठी नदियाँ, ऊँचे झरने, मद्धम सूर्य, शीतल मंद पवन, ऊँचे हिम शिखर. वास्तव में जिसे देख कर लगता है कि पांडुलिपियों में दर्ज कथाएं सौ प्रतिशत सच हैं. महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी के प्राण जहाँ बसते हैं. वो कौलान्तक पीठ सहस्त्रों रत्नों से भी सुन्दर है. उसकी मिट्टी के कण कण में पवित्रता है, शांति है, जो अपने मुखमंडल को बादलों की चादर से सदा ही बंद रखने का प्रयास करता है, नयी दुल्हन के श्रृंगार से कई गुना श्रृंगारित महाहिमालय कौलान्तक पीठ अतुलनीय है.

जिस जिस को इस धरा पर साधना का मौका मिला, मानों उसने पृथ्वी पर अब सब कुछ पा लिया. इसकी दिव्य सुगन्धित वायु, जर्जर शरीर में भी अमृत का संचार कर देती है. जिसके झरनों में स्नान से पाप रहित हो मानव परम मुक्त अवस्था में पहुँच जाता है और जिस धरा पर छोटे से छोटा साधक भी साधना की आंच में तप कर परमहंस बन विचरण करता है. इस दिव्य माणिक्य कांचन स्वरूपी कौलान्तक पीठ धरा को नमन है.

महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी जिस धरा की स्तुति में कहते हैं कि “तू विद्युत् धारिणी…. चन्द्र शरीरा….. प्रेम प्लावित पुण्य धरा….. ममतामयी प्राण दायिनी…. कौतुक कारिणी….. दिव्य धरा”.

परम पावन पवित्र कौलान्तक पीठ को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कौलान्तक पीठ, कुलांत पीठ, कौलांतर पीठ, कुलांतर पीठ, कोलान्तक पीठ, कोलांतर पीठ आदि आदि. साथ ही हिमालय इसका जगत प्रसिद्ध नाम है. दिव्य साधक इसे महाहिमालय, सिद्धाश्रम, ज्ञान गंज, नीखंड, हिमाचल, उत्तराखंड भी कहते हैं. इसी कारण भारत के हिमालयी क्षेत्रों के दो राज्यों के नाम हिमाचल और उत्तराखंड हैं. कौलान्तक पीठ की प्रचलित कथा के अनुसार कुरुकुल्ला नाम की प्राचीन महाशक्ति की दिव्य पीठ ही कौलान्तक पीठ है.

कौलान्तक पीठ का प्राचीन नाम कुलांत पीठ है, जिसका अर्थ होता है कुलों का अंत. कुल अर्थात धार्मिक संप्रदाय. कुलान्त पीठ अर्थात जहाँ सभी धार्मिक सम्प्रदायों की विद्या का अंत हो जाता है. हिमालय का पर्यायवाची होने के कारण भी कुलांत पीठ का अर्थ होता है कि वो स्थान जहाँ से आगे कोई न रहता हो, मानव सभ्यता का अंत. तत्कालीन समय में इतना अधिक हिमपात होता था कि वास्तव में वहां से आगे कोई सभ्यता थी ही नहीं. लेकिन अब तो है क्योंकि समय के साथ साथ मौसम बदल गया. हिमपात में भारी कमी हुई है.

मानव के अतिक्रमण ने ये सीमा भी लांघ ली. इसे पांडुलिपियों में कुल चक्र भी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है कि की पृथ्वी पर जितने भी देवी देवताओं के कुलो के संप्रदाय हैं वे सब यहीं से शुरू होते हैं और यहीं समाप्त हो जायेंगे. यही पीठ उनकी प्रमुख पीठ है. इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान हिमाचल प्रदेश के कुल्लू नाम के स्थान पर बहने वाली बिपाशा नाम की नदी जिसे वर्तमान में व्यास नदी कहा जाता है, का उत्तरी पूर्वी और कुछ पश्चिमी भाग कौलान्तक पीठ कहलाता है. सिद्ध संप्रदाय की कथा के अनुसार भी वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तोरा बोरा पहाड़ियों से शुरू हो कर म्यांमार तक की सारी भूमि कौलान्तक पीठ ही है, जिसका उत्तर में तिब्बत के कैलाश और मानसरोवर सहित कुछ आगे के पठारों तक सीमा स्थान था.

तंत्र मंत्र की वाम मार्गी विद्या और जादू टोने की अधिकता के कारण चीनाचारियों से पूर्व इसे कौलाचारियों की भूमि कहा जाता था. इन्हीं कौलाचारियों के संपर्क में आ कर बौद्ध धर्म की वज्रयान नाम की शाखा बनी जो मूलतया कौलाचारियों का ही पंथ है. अभी तक केवल ये बात ज्ञात नहीं हो सकी है कि ऋषि हिरण्यगर्भ कौन है, उनकी उत्पत्ति आदि. लेकिन इन्हीं हिरण्यगर्भ ऋषि को समाधी और योग का प्रथम आचार्य मान कर कौलान्तक पीठ पूजता है. इन्हीं ऋषि के द्वारा पृथ्वी पर योग विद्या का आगमन हुआ माना जाता है.

सबसे पहले कौलान्तक पीठ के सहस्त्रों ऋषियों ने लम्बी आयु, स्वस्थ जीवन, दिव्य आचरण और कुल कुण्डलिनी शक्ति के जागरण के लिए इस विद्या को अपने गुरु हिरण्यगर्भ जी से सीखा. उन्हीं के बाद योग के अन्य ऋषि जैसे पञ्च शिखाचार्य, वार्शगन्याचार्य, जैगिशव्याचार्य, पतंजलि आदि ने उसी विद्या को आगे बढाया.

हिरण्यगर्भ सिद्धांत के अनुसार कोल कुण्डलिनी चक्रों को कहा जाता है. कुण्डलिनी शक्ति के सारे रहस्यों को जानने वाला कुल होने के कारण कौलान्तक पीठ का एक और नाम विख्यात हुआ वो था कोलांतर पीठ. यहाँ सन्दर्भ में ये भी आता है कि पञ्च तंत्र चक्रों का अधिष्ठाता होने के कारण भी यही नाम कोलांतर पीठ पड़ा.

तंत्र में पहले पांच चक्र प्रमुख माने जाते थे. भैरवी चक्र सहित इन चक्रों को तंत्र में बहुत मान्यता मिली. और तंत्र इन्हीं के कारण बदनाम भी हो गया. तंत्र में भी कौलान्तक पीठ का नाम अग्रणी ही रहा. तंत्र मार्ग के तीन प्रमुख कुल होते हैं. पहला काली कुल, दूसरा मृ कुल, तीसरा श्री कुल. इनमें से केवल दो ही कुल साधारण लोगों के लिए साधानागम्य हैं. मृ कुल को गुप्त रखा जाता है. तंत्र के इन तीनों कुलों का पूरा ज्ञान और स्थान हिमालय में ही है, कौलान्तक पीठ में ही.

इसी कारण कुलों के अंतर स्वरुप कौलान्तक पीठ को कुलांतर पीठ नाम मिला. वो पीठ जो तीनों कुलों काली, मृ और श्री को जानने वाली पीठ है. कलियुग में चौरासी सिद्धों ने कौलाचार की क्रियाओं से इस पीठ को मुक्त कर कौलाचार का अंत इसी भूमि पर किया. इस कारण कौलान्तक पीठ को कौलान्तक पीठ का नया वर्तमान नाम मिला. बात यहीं समाप्त नहीं होती. इस पीठ को कुलांतर पीठ भी कहा गया क्योंकि तत्कालीन समाज में और शायद बहुत सी जगह आज भी स्त्री को गायत्री, योग, दस महाविद्या, तंत्र साधना, वेदोच्चार करने की अनुमति नहीं थी और साधना की अनुमति भी नहीं थी.

किसी भी गुरु से कोई कुंवारी कन्या या विवाहिता दीक्षा नहीं ले सकती थी. यदि किसी कारण लेनी ही पड़ जाए तो पिता के साथ या पति की आज्ञा मिलने पर उनके साथ ही धर्म मार्ग की दीक्षा लेने दी जाती थी. जबकि पुरुषों पर ऐसा कोई बंधन नहीं था. उस समय से केवल एकमात्र पीठ कौलान्तक पीठ ही ऐसा स्थान था जहाँ स्त्री को बिना किसी की अनुमति के अपनी स्वतंत्रता से दीक्षा लेने का और साधना करने का अधिकार था. जिस कारण बहुत से लोग ये बात सह नहीं पाए और उन्होंने शत्रु भाव से ग्रसित हो कर इस परम दिव्य पावनी पीठ का नाम द्वेषवश कुलांतर पीठ रखा दिया जिसका अर्थ होता है, कुला अर्थात स्त्री अंतर अर्थात भेद यानि के स्त्रियों के भेद को न मानने वाला पीठ.

ये सब उस समय कौलान्तक पीठ ने किया जबकि कहा जाता था कि साधना में औरत की परछाई पड़ जाने से अमंगल होता है. तत्कालीन कुछ तथाकथित योगी मठाधीश कई कई फुट की दूरी से महिलाओं को दर्शन की अनुमति देते थे. विश्व के सभी धर्मो में स्थित परम्पराओं से बहुत अलग है कौलान्तक पीठ की परम्पराएँ. इसकी परम्पराएँ एवं मान्यताएं अभी तक संसार के सामने नहीं आ सकी हैं. केवल सिद्ध और कुछ एक गुप्त नाथ योगी ही इसकी जानकारी रखते हैं. अधिकाँश ज्ञान मौखिक ही दिया जाता है.

हिमाचल के जिला कुल्लू में सोलंग नाला के ऊँचे पर्वत एवं सिद्ध भूमि नामक स्थान को मणिकरण घाटी के पर्वतों को बंजार घाटी के हंसकुंड क्षेत्र के पर्वत धाराखरी नाम के गावं के जोगिनी गंधा पर्वत सैंज घाटी के खंडा धार पर्वतों को पीठ भूमि माना जाता है. कहीं कहीं ये भी जिक्र है कि भुंतर के निकट जिया को भी प्रमुख भूमि माना जाता है.

ये केवल आंशिक विवरण है. महर्षि लोमेश को कौलान्तक पीठ का महाचिरंजीवी प्रमुख पीठाधीश्वर माना जाता है. कुरुकुल्ला देवी की कथा के अनुसार स्वयं भगवान शिव ने कैलाश मानसरोवर के तट पर महर्षि लोमेश जी को पीठाधीश्वर नियुक्त किया. इन सबसे अलग पौराणिक कथा के अनुसार जब माता सति का दक्ष यज्ञ में जला शरीर ले कर भगवान शिव हिमालय में विचरण कर रहे थे तो भगवान विष्णु जी ने अपने चक्र से माता सति का शरीर काट कर टुकड़ों में बाँट दिया, जिस कारण 108 दिव्य महाशक्ति के अनुपम शक्ति पीठ इस धरा पर बने, जिनमें से केवल 51 शक्ति पीठो को प्रकट रूप में जगत हित के कारण सामने लाया गया. शेष गुप्त साधना हेतु रहस्य रखे गए. कहीं कहीं इनकी संख्या 54 या 64 भी कही गयी है. इनमेंसे ही एक है कौलान्तक पीठ. जहाँ माता सति की जंघा गिरी थी.

लेकिन स्वयं कौलान्तक पीठ में प्रचलित कथा के अनुसार चतुर्थ मन्वंतर में पृथ्वी पर पाप बहुत फैल गया था जिससे पृथ्वी नष्ट होने लगी. तब ऋषियों ने स्वयं शिव से पृथ्वी पर आ कर रहने की प्रार्थना की. माता शक्ति और शिव ने लोक कल्याण के लिए सागर से हिमालय को उत्पन्न किया. और उस पर स्थित हो गए. यही महाहिमालय कौलान्तक पीठ कहलाता है. पीठ शैव और शाक्त मतानुसार पूजन साधनों को अपनाता है. इसी कौलान्तक पीठ में 33 करोड़ देवी देवता रहते थे. जिन में से वर्तमान समय 18 करोड़ देवी देवता आज भी रह रहे हैं. बाकि यहीं से पृथ्वी पर फैल गए. भारत के लगभग सभी संत सिद्ध पुरुष योगी कौलान्तक पीठ तक जरूर पहुंचे हैं. उन्होंने अलग अलग नामों से इसका वर्णन किया है.

तंत्र मत कहता है कि कौलान्तक पीठ के 21 द्वार हैं जिनमें से एक द्वार उत्तरांचल में है, एक जम्मू और कश्मीर में, एक पाकिस्तान, एक नेपाल, तीन तिब्बत, एक भूटान और बर्मा में हैं. इनको कौलान्तक पीठ के प्रमुख नौ द्वार कहा जाता है. कौलान्तक पीठ में योगी, यति, सन्यासी, ऋषि, मुनि, अघोरी, तांत्रिक, मनीषी, भैरव, भैरावियाँ, अप्सराएँ, भूत, प्रेत, पिशाच, किन्नर, किरात, यक्ष, गंधर्व, ब्रह्म राक्षस आदि नाना प्रकार की योनियाँ स्थित हैं व साधनाएँ करते हैं. अति संक्षेप में यही कौलान्तक पीठ है.

कौलान्तक पीठ दिव्य साधकों को पुकारता है. आओ साधना के सारे सूत्र महापुरुषों की प्रतीक्षा कर रहे हैं. हिमालय कह रहा है कि विश्व मंगल की कमाना करो. हिमालय गुनगुना रहा है कि अब प्रेम गीत, भक्ति गीत बांटने हैं. तुमको भी जागना है…. समय बीतने से पहले…. समय पर सवार हो कर बनना है युग पुरुष… करना है आत्मसाक्षात्कार.

कौलान्तक पीठ -1 : रहस्यमय श्वेत वर्ण धारी सत्यस्वरूप शिवस्थली हिमालय

(साधकों तक अधिक से अधिक जानकारी पहुंचाने के उद्देश्य से ये लेख कौलान्तक पीठ की वेबसाइट से साभार लिया गया है)

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