कौलान्तक पीठ -1 : रहस्यमय श्वेत वर्ण धारी सत्यस्वरूप शिवस्थली हिमालय

हिमालय जिसका भेद कोई न जान सका, कोई उसे पर्वत कहता है, तो कोई देवस्थली, किसी के लिए वो सुन्दर प्राकृतिक सौंदर्य का पर्याय है, तो किसी के लिए देवात्मा. प्राचीन पांडुलिपियों और दंतकथाओं के अनुसार जम्बू द्वीप थोड़े से मार्ग को छोड़ कर लगभग चारों और से समुद्र से घिरा था. पृथ्वी पर तब तीन ही द्वीप हुआ करते थे जम्बू शाल्मली और प्लक्ष. इन्हीं द्वीपों में मानव जाति को पृथ्वी पर पलने बढ़ने के लिए आदि ब्रह्मा जी के आदेश पर ब्रह्मा जी ने मनु और शत रूपा को भेजा और उनके द्वारा सृष्टि में पृथ्वी लोक पर मानवो का संसार बस गया.

ये भी वर्णन आता है कि पृथ्वी पर एक नहीं पांच मनु उतारे गए थे. उनके बीच ही मानव जाति पृथ्वी पर बसनी शुरू हुई. लेकिन तब माता पृथ्वी कुँवारी थी. एक मनु की सब संताने पृथ्वी पर जी नहीं पायी और उसे नष्ट मनु की संज्ञा दी गयी. चार मनुओं की संतानें पृथ्वी पर अब भी जीवन जी रही हैं. इन मनुओं ने स्वर्ग से ले कर सात लोकों का ज्ञान मनुष्य को दिया और ब्रम्हा जी से सदा जुड़े रहने को कहा.

क्योंकि पृथ्वी पर ब्रह्मा जी मानवों का भविष्य तय करेंगे ये कहा गया, मानव जाति देवताओं की पूजा और कृपा से पृथ्वी पर फली फूली. अग्नि, सोम, आर्यमा, सावित्री, गायत्री, सूर्य, तेज, ध्यावा, इन्द्र, यम,सविता, रूद्र आदि की उपासना ने मानव जाति को परम बुद्धिमान बना दिया और मानवों ने दुर्गा, शिव, विष्णु, गणपति, गुरु की पूजा शुरू की.

कहते हैं कि मानव खोजता चला गया देवताओं के रहस्य और उसने स्वयं को देवता बना देने की विधि भी खोज ली और ऋषि मुनि देवता हो गए. सप्त ऋषि तो पृथ्वी छोड़ कर आकाश में रहने चले गए. किसी ऐसे लोक में जिसे सप्त ऋषि मंडल कहा जाता है. मानवों ने जब पृथ्वी पर पाप बढ़ा दिए तो प्रकृति का संतुलन ख़राब होने लगा. माता पृथ्वी बीमार हो गयी और उसने अपनी रक्षा के लिए पृथ्वी पर रहने वाले ऋषि मुनियों से गुहार लगायी तब सप्तमात्रिका नाम के ऋषि ने सभी ऋषियों से आग्रह किया कि आकाश से देवात्मा हिमालय को पृथ्वी पर लाया जाए.

सभी देवताओं और ऋषि मुनियों के प्रयासों के कारण आकाश से हिमालय पृथ्वी पर उतरने लगे तो उनको सागर के भीतर बैठने को कहा गया. पृथ्वी ने अपने आपको फिर से व्यवस्थित किया और इस तरह पृथ्वी सातों द्वीपों में भी बंट चुकी थी और पृथ्वी पर स्थित हो गए देवात्मा हिमालय. हिमालय इतना सुन्दर था कि करोड़ों देवी देवता हिमालय पर रहने के लिए उतर गए. यहीं से सभी देवता पृथ्वी पर फैल गए. इससे पहले देवता आकाशों में रहते थे. इसीलिए उनको खुश करने के लिए आग से सोम को जला कर आसमान में भेजा जाता था. लेकिन पृथ्वी पर आने से उनकी मानव रूप में मूर्ति बना कर पूजा शुरू हुई और उनके लिए घर बनाये गए जिनको देवालय कहा जाता है. इस हिमालय पर्वत के अंशभूत सहयोगी भी पर्वतों के रूप में पृथ्वी के अनेक भागों में प्रकट हो गए. इसलिए पृथ्वी पर स्थित सभी पर्वतों को पवित्र ही माना जाता है.

इस तरह पृथ्वी को संकट से उबारा गया. तबसे ले कर अब तक कई मन्वंतर बीत चुके हैं. कई मनु पैदा हुए और चले गए. अब जम्बू द्वीप बदल चुका था. ऋषि मुनियों और देवी देवता हिमालय पर रहने लगे और वहीँ से पूरे जम्बू द्वीप का धर्म कार्य देखने लगे. वे देवताओं के साथ यात्राओं पर निकल जाते. प्रजा जन और राजा महाराजा देवताओं और ऋषि मुनियों की सेवा करते. उनके रहने के लिए स्थान स्थान पर देवालय बनाये जाने लगे. जब धर्म कार्य को हिमालय से संचालित करना मुश्किल हो गया तो सब ऋषि मुनियों ने सकल जम्बू द्वीप पर पञ्च पीठों का निर्माण किया. हिमालय को जो कि शायद वर्तमान रशिया नाम के देश से शुरू होता है और वर्तमान भारत नाम के देश के पूर्वी भाग में म्यांमार अथवा बर्मा नाम के देश पर जा कर समाप्त होता है, को पहली पीठ के रूप में स्थापित किया, इसी पीठ को नाम दिया गया… कौलान्तक पीठ. जिसके हर एक कण में समाहित है पवित्रता, जोगिनी शक्तियों की आकर्षक सुरम्य निवास स्थली.

दूसरी पीठ, जल के भीतर डूबी हुई थी और टापू के रूप में प्रकट हुई थी इसलिए पीठ का नाम रखा गया जालंधर पीठ. इसी पीठ के नाम पर राक्षसों ने अपने एक पुत्र का नाम जालंधर रखा था. इसी तरह क्रमशः कूर्म पीठ, वराह पीठ और श्री पीठ नाम की पांच पीठो को स्थापित किया गया. इन्हीं पाँचों में से सबसे बड़ी पीठ है हिमालय की रहस्यमय पीठ कौलान्तक पीठ, जहाँ सब ओर बहती है मीठे जल की धारा, देवात्मा हिमालय का परम पवित्र शीतल जल.

क्रमश:

(साधकों तक अधिक से अधिक जानकारी पहुंचाने के उद्देश्य से ये लेख कौलान्तक पीठ की वेबसाइट से साभार लिया गया है)

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