रायन स्कूल, प्रद्युम्न और शिक्षा व्यवस्था – भाग 2

रायन स्कूल, प्रद्युम्न और शिक्षा व्यवस्था – भाग 1

अब आगे….

अब आइये इसके स्थिति के निराकरण की बात सोचें. क्योंकि हमारी बुनियाद ही शिक्षा की गलत हो गयी है तो इसमें मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है. आज तक हम कभी पाठ्यक्रम बदलते हैं, कभी अध्यापकों के लिए नए मानक बनाते हैं जिसके कारण BEd न्यूनतम योग्यता को बदल कर NET परीक्षा कर दिया गया है, तो कभी स्कूलों के लिए प्रत्येक बोर्ड नए नियम लगा रहा है. हमें सर्व प्रथम यह मानना पड़ेगा कि पूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है भले ही इसकी कीमत पर देश के युवा का एक वर्ष अधिक लग जाये (संक्रमण काल के कारण).

आज तक जो किया जा रहा है वह अँग्रेजी भाषा मे cosmetic effect से बढ़ कर नहीं है. इसके लिए समाज, अभिभावक, विद्यार्थी और अध्यापक और प्रशासन को मिल कर काम करना पड़ेगा.

आप इसे आजकल के मौसमी बुखार से तुलना कर ले जिसे viral fever कहते हैं. आज से लगभग 30 वर्ष पहले यह इतना नहीं था विशेषकर शहरी आबादी वाले क्षेत्र में. आजकल इसके इलाज के लिए आप सिर्फ symptomatic treatment करते हैं. इसके कारण वातावरण में प्रदूषण, दूषित भोजन और तनावपूर्ण एवं कृतिम जीवन है. इस के कारण आपके शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो गयी. जब तक आपके रहने का ढंग नहीं बदल कर प्राकृतिक जीवन शैली पर नहीं आएगा समस्त उपाय क्षणिक ही रहेंगे. इसी प्रकार शिक्षा की शैली और सोच में बदलाव की आवश्यकता है.

सर्व प्रथम तो यह समझना चाहिए कि शिक्षा की आवश्यकता क्या है? यह बिलकुल भी नौकरी या उच्च पद पाने के लिए नहीं है. यह एक मनुष्य को अपने संबंध, चाहे व्यक्तिगत या सामाजिक और चाहे वह प्रकृति के साथ हों को समझने की क्षमता दे. उसके बाद अगले स्तर पर उसके राष्ट्र धर्म को बढ़ाने वाला हो. और उसके बाद आयेगा उसके रोज़ी रोटी या रोजगार के लिए उपयुक्त हो. पश्चिमी संस्कृति शिक्षा, कानून और व्यवस्था व्यक्ति को व्यक्तिवाद की ओर प्ररित करती हैं. इसीलिए उनके यहाँ परिवार की व्यवस्था उतनी सशक्त नहीं है. हमारी संस्कृति में व्यक्ति समाज और समुदाय का एक हिस्सा है. इसलिए वह इतना स्वार्थी नहीं है. वह चाह कर भी अलग नहीं हो सकता.

आज समाज में अभिभावक और छात्र सबसे अधिक असमंजस में है, परंतु पिछले 30 वर्षों के मोह को तोड़ नहीं पाते हैं. बच्चा कुछ बड़ा होता है तो माता पिता और समाज यह निर्णय कर देता है कि मेरा पुत्र या पुत्री डॉक्टर, इंजीनियर या CA या कुछ और बनेगा. कहीं कहीं तो यह भी सोच है कि परिवार में सब डॉक्टर हैं तो आप भी बनेंगे. आप कक्षा 12 के बच्चे जो अब कॉलेज जाने को तैयार है अधिकांश बच्चे यह तो कहते हैं इंजीनियर बनना या डॉक्टर या कुछ और, परंतु क्यों बनना है या इस क्षेत्र में क्या विशेषता अर्जित करना चाहते हो उस पर सब चुप हैं.

उसके उपरांत आप पूछिए देश में कितने कॉलेज है इसके तो वह कुछ लोग अच्छे कॉलेज का नाम अवश्य बता देंगे परंतु अधिकांश बच्चे क्या विशेषज्ञता अर्जित करना चाहते हैं इस पर चुप हैं. इसमें उन बच्चों की कोई त्रुटि नहीं उन्हे कभी बताया ही नहीं गया कि हर क्षेत्र में क्या क्या है? तो बच्चे ने कुछ देखा ही नहीं है तो वह क्या बताएगा. यह उसी प्रकार है कि मैंने Mexican Food कभी खाया ही नहीं औए आप मुझे से पूछे मुझे कौन सा Mexican व्यंजन पसंद है.

प्रबंधन शास्त्र (Management Studies) में यह बताया जाता है If you enjoy your work first day you will never have to work. कहने का अर्थ है कि आप अपने काम में यदि रुचि रखते हैं तो आपको काम बोझ नहीं लगेगा. और यही होना चाहिए. हम लोग अपने बच्चे के लिए यदि बहुत उदारवादी बन भी जाएँ तो कहते हैं कि हमारा बच्चा यह अच्छा कर सकता है तो उसे यही करना चाहिए. उसकी रूचि का तो प्रश्न ही नहीं है.

आज बड़े बड़े चिकित्सक यह मानते हैं कि आज की जीवन शैली की बीमारियाँ जिसे आप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग इत्यादि का 50% से अधिक कारण तनाव का होना है. और तनाव हमारा आज का युवा सबसे अधिक आपके कार्य क्षेत्र से प्राप्त करता है. तो आज समाज के जागने का प्रश्न है अभी भी बहुत देर हो चुकी है. अधिकांश अभिभावक अपनी अपेक्षाएँ, जो वह अपने समय में नहीं कर पाये अपने बच्चों से करवाना चाहते है. इसमें कुछ बुराई नहीं है यदि बच्चे आपने लक्ष्य को अपना लक्ष्य बनाना चाहते हैं.

इसके उपरांत सबसे बड़ा योगदान अध्यापक या विद्यालय का होता है. आज यह मात्र धन कमाने का ठिकाना बन गया है जो कभी सेवा का क्षेत्र था. आज तक स्कूल के अध्यापक को आपने पढ़ाने के लिए नहीं छोड़ा. उस पर पढ़ाई के अतिरिक्त अनेकों काम दे दिये गए हैं, जिन्हें प्रबंधन का अतिरिक्त काम कहा जा सकता है. स्कूल आजकल अपने खेल कूद, वाद विवाद इत्यादि प्रकार की प्रतियोगिता करवाने में व्यस्त है जिसके कारण विद्यार्थी की पढ़ाई मे हानि होती है.

अब अध्यापक कौन होना चाहिए जिसमें पढ़ने की इच्छा हो, जो देश मे इस रास्ते ये योगदान देना चाहता हो. कुछ समय पहले तक अध्यापक बनने के लिए B Ed में पास होना चाहिए था. अब इसके लिए NET की परीक्षा भी आवश्यक कर दी है. इसमें कुछ बुराई नहीं है परंतु NET और B Ed के पाठ्यक्रम को देखने से स्पष्ट लगता है कि इसका बच्चे को पढ़ाने या बच्चों को समझने के ढंग से कुछ लेना देना नहीं है. जो अध्यापक आते हैं उनकी पढ़ाने से अधिक अपनी कमाई तक की सोच रहती है. उनके लिए वह मात्र रोज़ी रोटी के प्रबंधन का काम हो गया है. आज अभिरूचि का महत्व कम हो गया है. इसीलिए स्कूलों मे बच्चे पढ़ते नहीं है और एक नयी Tuition industry या coaching industry खड़ी हो गयी है. यदि इसके उपरांत फिर भी कुछ अध्यापक बच्चे के लिए कुछ करना भी चाहें तो उनके हाथ प्रशासन नें बांध रखे हैं.

Professional education के क्षेत्र जैसे engineering या Computer के लिए आज course बना दिये गए हैं जिसके उपरांत युवा नौकरी के लिए मारा मारा फिरता है. अब इंजीनियरिंग कॉलेज के मालिक या प्रबंधन कर्ता अपने पैसे को कमाए जा रहे हैं. क्या पढ़ाना है उसकी रूपरेखा कोई तीसरी संस्था करती है और उसका नौकरी देने वाले से कोई सरोकार नहीं है. होना इसके विपरीत चाहिए.

उदाहरण के लिए सरकार इंजीनियरिंग कॉलेज चलाने का अधिकार उद्योग जगत को दे दे जहां अंत में युवा ने रोजगार प्राप्त करना है. इंजीनियरिंग कॉलेज TATA, BIRLA, AMBANI इत्यादि उद्योगपति चलाएं और जिन्हें पढ़ाएँ उन्हें अपने पास नौकरी के लिए रखें. अब जो उनकी उद्योग में आवश्यकता है वह पढ़ाएँ और बच्चे को तैयार करें. आज किसी भी संस्थान से पढ़ा बच्चा 18 माह का प्रशिशक्षण उद्योग जगत से प्राप्त करता है और जो 4 साल पढ़ा है वह कुछ काम नहीं आता है. कम से कम बच्चे के साल तो बर्बाद नहीं होंगे.

5 या 7 साल की इतनी शिक्षा हो जिसमें उसे आस पास का ज्ञान हो, शरीर का प्रारम्भिक ज्ञान हो, अपनी संस्कृति का ज्ञान हो, समाज का बोध हो और राष्ट्र से प्रेम हो और पर्यावरण इत्यादि पर विचार रखना सीखे. इसके लिए गणित, विज्ञान कुछ इतिहास का ज्ञान दिया जाए. Professional course से पहले एक वर्ष का अतिरिक्त प्रशिक्षण उसे हर विषय की जानकारी, रोज़ी रोटी यानि रोजगार के विषयों इत्यादि के बारे में बताया जाये जिसे उसे अपने भविष्य के विषय के बारे में सोचने समझने और परखने की योग्यता आ जाये. शुरू की प्रारम्भिक शिक्षा के उपरांत हमेशा से उद्योग जगत, चिकित्सा जगत और राजनैतिक जगत से संबंध रखा जाए.

प्रशासन की भूमिका विद्यालय और बाहर के जगत में सामंजस्य बनाने तक सीमित हो. स्कूलों के अधिकार आप चाहे कम कर दें परंतु पढ़ाने के ढंग पाठ्यक्रम इत्यादि में स्वतन्त्रता अधिक हो. यह कुछ मोटे मोटे मेरे व्यक्तिगत सुझाव हैं इसमें से एक एक पर काम करने की आवश्यकता है, जिससे कुछ सकात्मक काम हो. परंतु जब तक उनके प्रशासन और सरकार का समर्थन नहीं प्राप्त होगा जमीनी स्तर पर अधिक असर नहीं पड़ेगा.

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