प्रकृतिपूजक : सनातन हिन्दू, भाग-1

सुर-असुर और देवता-राक्षस के इर्द गिर्द हमारी अनेक पौराणिक कथाएं हैं. ये दोनों पात्र दुनिया में कहीं और से नहीं आये, ना ही ये दोनों पूरी तरह काल्पनिक हैं. हां, काव्यात्मक ग्रंथों के चरित्र होने के कारण प्रतीक स्वरुप हो सकते हैं.

असल में देवता ना तो देवलोक से आये, ना ही राक्षस पाताललोक से, ये दोनों ही हमारे पूर्वज थे, इसी आदिभूमि भारत की संतान. और एक ही परिवार के दो भाइयों की तरह अलग-अलग क्या हुए कि इनके बीच की दूरियां भी समय के साथ बढ़ती चली गयीं.

और फिर इतिहास लिखा एक भाई ने तो उसे दूसरे को कमतर तो दिखाना ही था. यह स्वाभाविक था. लेकिन कालांतर में इन पौराणिक कथाओं की गलत और एकतरफा व्याख्या ने गलतफहमियां और बढ़ा दीं. उस पर से आज के युग के लेखन और चित्रण ने, जिसमें असुर-राक्षस को दो सींग वाला बदसूरत बदियल मनुष्य दिखाया गया, इसने खाई और चौड़ी कर दी.

राक्षसों का ऐसा चित्रण बेहद हास्यापद तो था ही मगर जाने-अनजाने इस अर्थहीन कार्य ने आगे चलकर नुकसान अधिक किया. इस तरह के चित्रण के द्वारा समाज को किसी सन्देश की बात भी थोड़ी उथली ही रह जाती है, जिसमें बुराई पर अच्छाई की जीत दिखाने का प्रयास समझा जाता. क्योंकि इस अपरिभाषित सन्देश से अधिक इस तरह के चित्रण के कारण समाज में जाने अनजाने दो वर्ग बन गए.

इसको आधार मान कर कुछ मूर्खों को यह कहने का अधिकार मिल गया कि आर्य बाहर से आये थे, आर्य आक्रमणकारी थे, इन्होने यहां के मूलनिवासियों को जंगलों में भगाया, जैसी झूठी मनगढ़ंत कहानी गढ़ने का मौका मिल सका. अगर यह भ्रम ना होता कि सुर-असुर दोनों अलग नहीं बल्कि एक ही परिवार के हैं तो हम आदिकाल के मानवीय इतिहास की घटनाओं को बेहतर ढंग से समझ पाते, जो वेदों में संदर्भित और संकलित हैं.

वेद, मानव के विकासक्रम का एक लेखाजोखा भी है. इसमें रची गई आदिमानव से मानव बनने की कहानी को अगर संक्षिप्त में सरलता से कहना हो तो कुछ इस तरह से कहा जा सकता है.

मानव माँ के पेट से सब कुछ सीख कर नहीं पैदा हुआ था. उसने, यहीं धरती पर अपने बुद्धिबल से धीरे-धीरे प्रकृति के रहस्यों को जान कर अपनी सभ्यता को विकसित किया. वेद इस घटना क्रम के गवाह हैं. इसे ध्यान से पढ़ने पर हम वैदिक दर्शन के साथ ही उन दिनों के मानवीय विकासक्रम को भी जान सकते हैं.

चूँकि वेद काव्य है तो इसमें अनेक प्रतीक हैं, काव्य सौंदर्य है जिसमें एक ऋचा और किसी मन्त्र के अनेक अर्थ निकल सकते हैं और व्याख्या विस्तृत हो सकती है. एक ऋचा एक युग का इतिहास समेटे हैं. अधिकांश ऋचाओं में देवताओं की प्रशंसा है और उनके स्तुतिगान के साथ ही उनका आह्वान है. लेकिन आखिर ये अग्नि, सूर्य और इंद्र आदि देव कैसे और क्यों बने. इनके बड़े सरल और सामान्य उत्तर हो सकते हैं मगर हमने इन्हें क्लिष्ट कर दिया, इनके अर्थो के भावार्थ में स्वार्थवश जबरन अपना दृष्टिकोण डाल कर.

पूर्व में आदिमानव जंगल में रहता था और उसका जीवन जंगल पर निर्भर था. धीरे-धीरे उसने कृषि का विकास किया. यह जंगल आधारित मानव के भरण पोषण से अलग व्यवस्था थी जो धीरे-धीरे विकसित होती चली गई. इसके साथ विकसित हुई मानव और उसकी संस्कृति. लेकिन इस विकासक्रम में सभी सम्मिलित नहीं थे, कइयों ने जंगल में ही रहना अधिक पसंद किया.

इसके अनेक कारण थे. इस पर विस्तृत व्याख्या कभी और. बहरहाल इस तरह से, दो भाइयों में से एक जंगल में और एक मैदान में रहने की राह पर चल पड़े. एक का जीवन नदी किनारे बसाये गए नगरों में स्थायी हुआ तो दूसरे का जंगलों में अस्थायी ही रहा. ऐसे में इन दोनों के बीच संघर्ष स्वाभाविक था.

चूँकि इस संघर्ष को लिखने-देखने वाला नगरों का निवासी, कृषि आधारित जीवन जीने वाला मानव का समूह था तो उसने अपने को बेहतर घोषित किया और वे सुर या देवता कहलाये. और इन्होंने ही अपने प्रतिद्वंद्वी भाई को असुर-राक्षस घोषित किया. इन दोनों की जीवन पद्धति अलग-अलग विकसित हुई, इसलिए इनकी संस्कृति भी अलग-अलग समानांतर विकसित होती चली गई. मगर आपस में सम्बन्ध फिर भी बनते रहे. जैसे महाभारत में भीम और हिडिम्बा का विवाह.

बहरहाल नगर में कृषि आधारित संस्कति के नागरिक आर्य कहलाये और अन्य अनार्य. आर्यों का जीवन कृषि आधारित था जिसके लिए उन्हें समतल भूमि की आवश्यकता होती थी, जो ये जंगल में आग लगा कर ही प्राप्त कर पाते थे. इसको लेकर ही सुर और असुर के बीच में संघर्ष होता था.

चूँकि अग्नि से ही आर्यों को भूमि प्राप्त होती इसलिए अग्नि इनके महत्वपूर्ण देवता हुए. और चूंकि इनकी कृषि, वर्षा आधारित थी इसलिए इंद्र इनके दूसरे प्रमुख देव बने. यज्ञ की परिकल्पना इसी प्रक्रिया से पैदा हुई. चूँकि कृषि के लिए प्रकृति पर निर्भरता अधिक थी इसलिए आर्यों द्वारा प्रकृति पूजी जाने लगी.

इस तरह की निर्भरता जंगल में रहने वाले के लिए नहीं थी इसलिए जंगल का जीवन अलग रहा और उनके देवी-देवता भी भिन्न हुए. हाँ, जब-जब जहाँ-जहां शक्ति की बात आती तो महादेव और मां दुर्गा, सुर और असुर दोनों में बराबर से पूजे जाते. यही प्रमुख कारण रहा कि इंद्र असुरों के इष्ट नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वी हैं.

क्रमशः

(प्रकृतिपूजक : सनातन हिन्दू” अपनी इस पुस्तक के एक अध्याय लिखने के लिए किये गए अध्ययन का सारांश. यह अंतिम सत्य नहीं, इसका विस्तार किया जा सकता है, वैसे भी वेद व्याख्या सनातन की तरह अनंत है.)

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