अकेला गया, ना आया अकेला…

जाते तो सब अकेले ही हैं,
न जाने क्यों लौटते में ले आते हैं
संस्कारों की बेड़ियों में लिपटी आत्मा
कर्मों के अधूरे बहीखाते…
और पिछले जन्म की पूरी स्मृतियाँ…

बार बार के इस आवागमन के बीच
विस्मृत कर देते हैं आने का उद्देश्य
फिर जोड़ लेते हैं अधूरे अनुभव
जिसे पूर्णता प्रदान कर
छोड़ देने के लिए आये हैं

ये जो भोग के प्रसाद को तज कर
उठ गए थे बीच यज्ञ में,
जाने की जल्दी में ये भी ना सोचा
कर्मों के हवनकुंड में
अंतिम आहुति देने
आना होगा फिर लौटकर…

आकाश की ओर मुंह कर चिता पर लेटते हुए
ज़रा सा भी होश रहता तो
आना न पड़ता यूं पीठ पर इतना बोझा लादे…

अब भी समय है उठा लो
धरती में धंसी शुतुरमुर्गी गर्दन
कि वो सबसे तेज़ तो चल सकता है देह की भांति
लेकिन उड़ नहीं सकता चेतना की तरह…

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