अम्बानी-अडानी ने दी है टाटा-बिरला को राहत

हर रोज कोई ना कोई आ ही जाता है जिसे अम्बानी-अडानी की संपत्ति से शिकायत है. जिसकी शिकायत है कि अम्बानी-अडानी को फायदा हो रहा है… शिकायत की आदत पुरानी है. जब हम छोटे थे तो यही सारे मुहावरे टाटा-बिरला के नाम से सुनते थे. अम्बानी-अडानी ने टाटा-बिरला को राहत दी है.

स्कूल में अर्थशास्त्र नाम का विषय पढ़ा था. वह 80 का दशक था, समाजवादी स्वप्न का स्वर्णिम दौर. स्कूल की किताबों से लेकर सिनेमा के पर्दे तक समाजवाद छलकता रहता था. सिनेमा में जब अमिताभ बच्चन कुली बनता था, मजदूरों के हक़ के लिए खून चूसने वाले मिल मालिकों से लड़ता था, मिथुन चक्रवर्ती एक रिक्शा वाला बनकर एक लखपति की बेटी से प्यार करता था और उसके बाप की नाक ज़मीन में रगड़ता था… जनता गदगद हो जाती थी. उसके जीवन के सारे दुख दूर हो जाते थे, अपनी गरीबी की सारी कुंठा मिट जाती थी.

उधर अर्थशास्त्र और समाज विज्ञान की किताबों में हम सहकारी आंदोलन की महिमा पढ़ते थे, समाजवाद के स्वर्ग में विचरते थे, साम्यवाद के वैकुण्ठलोक का आंखों देखा हाल पढ़ते थे… भारत का आर्थिक इतिहास पढ़ते थे कि कैसे हमने स्टॅलिन की प्रेरणा से पंचवर्षीय योजनाओं के स्वर्ण युग में प्रवेश किया है और हर पंचवर्षीय योजना हमें कैसे स्वर्ग की ओर पाँच सीढियां चढ़ा ले गई है… क्यों भारत में बड़े उद्योगों में निजी निवेश को अनुमति नहीं दी गई है, कैसे निजी क्षेत्र में एक समय पाँच लाख से ज्यादा के पूंजी निवेश की अनुमति नहीं थी.

और दूसरी ओर सरकारी उपक्रम के शहर सिंदरी में रहकर मैंने सरकारी उद्योगों की दुर्दशा देखी, इन सफेद हाथियों का पाला जाना और फिर इनका भूखे मरना देखा… और अपनी पीढ़ी के युवाओं की एक सरकारी नौकरी के लिए डेस्पेरेशन देखी… जब एक बैंक की नौकरी, रेलवे के गार्ड की नौकरी, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन की परीक्षाएँ, पुलिस की भर्ती की दौड़ हमारी पीढ़ी के कोलंबसों का अमेरिका, कार्ल लुइसों का ओलिंपिक मैडल और परमहंसों का मोक्ष हुआ करते थे…

अगर आपको एक सरकारी नौकरी नहीं मिली तो वह जीवन का अंत हुआ करता था. इस समाजवादी स्वर्ग के स्वप्नों ने हमारी गरीबी की कुंठाओं को खाद पानी दिया, और कुछ नहीं… हमने दरिद्रता को पूजना सीखा, अमीरी से घृणा की और अमीरी के दमित स्वप्न लिए गरीब होते गए.

अर्थशास्त्र बदला है, संस्कार वही हैं. कल का जो टाटा बिरला को कोसना था, वह आज की अडानी अम्बानी से शिकायत है…

भाई, अडानी अम्बानी को लाभ हो रहा है… तो जो बिज़नेस करेगा उसी को ना लाभ हानि होगी? अगर फाइटर प्लेन की फैक्टरी लगेगी तो उसमें फायदा अम्बानी को ही होगा ना… या नत्थू पनवाड़ी को होगा? नत्थू पनवाड़ी को फायदा तो तब होगा जब अम्बानी की फैक्ट्री में काम करने वाले उसकी दुकान पर पान खाएंगे.

और कोई मुझे यह बताये कि मुकेश या अनिल अंबानी क्या रात भर दारू पीकर और 11 बजे तक सोकर और गर्लफ्रैंड के साथ कोकीन का सुट्टा मारकर अम्बानी बने हुए हैं? किस्मत और बाप की दौलत लेकर पैदा हुए हैं, पर जहां हैं वहीं बने रहने के लिए जितनी मेहनत लगती है उसमें आधे सूखकर छुहारा हो जाएंगे.

मेहनत सिर्फ हावड़ा स्टेशन का कुली ही नहीं करता… व्यापारी, उद्योगपति भी करते हैं… और स्टेशन का कुली भी अगर दिमाग खोलकर मेहनत करे तो जिंदगी भर कुली नहीं रहता. पैसा अक्ल, हिम्मत और मेहनत से आता है, और अगर तक़दीर से भी आये ना, तो भी बिना मेहनत के टिकता नहीं है.

मैं दिन में 8-10 घंटे की नौकरी करता हूँ. मेरे कई मित्र प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं, अपनी क्लिनिक या नर्सिंग होम चलाते हैं, मुझसे कई गुना ज्यादा कमाते हैं. मुझे कई अवसर मिले भारत लौट कर क्लिनिक या हस्पताल खोलने के. इन्वेस्ट करने वाले भी मिले… पर नौकरी की सुरक्षा छोड़ कर प्राइवेट प्रैक्टिस करने की हिम्मत नहीं हुई. अब मैं चाहूँ तो प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को लुटेरा बोलूँ, कसाई बोलूँ… चाहे तो डॉ देबी शेट्टी को पैसे का लालची बोल दूँ… पर उससे मेरी सिर्फ कुंठा संतुष्ट होगी, मेरी पैसे की जरूरत नहीं पूरी होगी.

और हममें से कौन है जिसे अम्बानी होना बुरा लगेगा. कौन है जो अम्बानी या अडानी बनने के अवसर छोड़ कर सन्यासी बना बैठा है? फिर यह विकृत संस्कार क्यों? हमारे यहाँ लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है… दारिद्र्य का महिमामंडन करने का नहीं.

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