ओशो अनुभूति मात्र हैं : वे शब्द नहीं, भाषा नहीं, नाद हैं, संगीत हैं, शून्य हैं

घर से हस्पताल रोज एक घंटे अप और एक घंटे डाउन का रास्ता कैसे कटे कि समय ना अखरे… ग़ज़ल सुने, भजन सुने, पॉडकास्ट पर कुछ कुछ सुना… कुछ ई-बुक्स डाउनलोड करने की सोच ही रहा था कि एक दिन संयोग से ओशो की एक स्पीच दिख गई.

ओशो की क्या स्मृतियाँ हैं आपके पास? मन में क्या छवि है? मुझे तो जो हल्का सा याद है कि मिडिल स्कूल में था, 80s की बात है जब वे खबरों में आये थे. जब अमेरिका में उन्हें किसी आरोप में अरेस्ट कर लिया गया था. तब के अखबारों, पत्रिकाओं में पढ़ी बातों पर जो छवि बनी थी वह ही जमी रही मन में – और सच कहूं, वह छवि अच्छी नहीं थी. जो भी चर्चा सुनी, विवादों की ही सुनी… ओशो से संवाद कोई नहीं हुआ. यही जाना कि कोई लंपट गुरु है जो लोगों को सेक्स के बारे में बोलता है… जिसने संभोग से समाधि की बात की है… जो महंगी महंगी कारों में चलता था और जिसके चेले अय्याश अमीर लोग थे…

90s में कॉलेज के दिनों में ओशो का लिखा कुछ कुछ पढ़ा… कुछ पल्ले नहीं पड़ा. यही लगा कि कुछ चतुर शब्द जाल है. पर छवि बदल गयी.

यू ट्यूब पर उस दिन जब पहली बार ओशो को सुना तो लगा ही नहीं जैसे कि कोई आवाज़ बाहर से आ रही है. लगा जैसे किसी ने मन की परतें खोल दीं… जैसे अंतर्मन के किसी बन्द पड़े कमरे को खोल कर उसमें धूल पड़ी एक आलमारी के दरवाजे खोल दिये… सबकुछ उलट पुलट कर दिया… सारा सामान बिखेर दिया… और मैं चकित हूँ कि इस कमरे में इतना कुछ भरा पड़ा था…

बिखेर तो सब दिया… अब समेटेगा कौन? और चुन बीन कर रखूँगा कहाँ… मन के सारे कमरों में इतना कूड़ा कचड़ा भरा पड़ा है… उसके बीच उन सबको कहाँ रखूँ जो इस अलमारी से निकले…

ओशो की आवाज बाहर से नहीं आती… अंदर ही गूंजती एक आवाज थी जो सुनाई देने लगी. यह न पूछना कि सुना क्या और सीखा क्या? ओशो जानने समझने सीखने की चीज नहीं हैं… सीखो कुछ भी नहीं, किसी से भी नहीं… बहुत सी बेकार की चीजें सीख कर जमा कर ली हैं… ओशो से भी कुछ सीखूँगा ही तो अनर्थ होगा… ओशो को गुरु मान लूँगा तो अन्याय होगा… ओशो का अनुकरण अनुसरण किया तो ओशो की हत्या हो जाएगी… ओशो अनुभूति मात्र हैं, महसूस करने की चीज हैं… वे शब्द नहीं हैं, भाषा नहीं हैं… नाद हैं, संगीत हैं, शून्य हैं…

बस, एक व्यथा है, एक शिकायत है संचार माध्यम के उन मनीषियों से जिन्होंने ओशो की इतनी विकृत छवि बनाई, इतने वर्षों उन्हें मुझसे दूर रखा…

या शायद कृपा ही की… अगर ओशो को पहले सुना होता तो एक अपरिपक्व मन में ओशो शब्द, भाषा, तर्क, वाद, संदेश बनकर प्रवेश करते… अनुभूति नहीं…

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