रायन स्कूल, प्रद्युम्न और शिक्षा व्यवस्था

अभी देश हाल ही में हुए रायन स्कूल के हादसे से उबरने का प्रयास कर ही रहा है कि एक चिकित्सा शास्त्र की छात्रा के रहस्यमयी मृत्यु का समाचार आ गया. कई स्थानों पर मोमबत्ती जला कर, कहीं पर स्कूलों के बाहर नारे लगा कर और जंतर मंतर इत्यादि स्थानों पर देश की जनता प्रदर्शन भी कर रही है. कहीं रोष है, कहीं बेबसी के आँसू है. कहीं स्कूल प्रशासन और कहीं सरकार को दोषी माना जा रहा है. कहीं छात्र सहमे हैं और अभिभावक असमंजस में है कि क्या हो रहा है? कहीं सुरक्षा कारण मे चूक कही जा रही है और कहीं लापरवाह प्रशासन को दोषी ठहरा जा रहा है.

इस देश के कानून और संस्कृति के अनुसार हर जान कि कीमत होती है. चाहे संतरी हो या मन्त्री, पुरुष हो नारी हो या किन्नर, युवा हो, वृद्ध हो या बच्चा हो. आइये इसके कारण और निवारण पर विचार करें.

भारतीय संस्कृति की सोच में शिक्षा का क्षेत्र और चिकित्सा का क्षेत्र एक बहुत ही पवित्र क्षेत्र था. दुर्भाग्य से 90 के दशक में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की नीतियों के कारण इस काम को व्यवसाय का रूप दे दिया गया. 90 के दशक से पहले यह सभी काम कुछ society या trust करती थी. अब इस पर सरकारी नीतियों के कारण ऋण मिलना शुरू हो गया और यह मात्र एक धंधा बन कर रह गया है. अब बाज़ार में ऋण का दर लगभग 12% से 18% तक है इसलिए जो भी समूह इसे चलाये उसे अपने खर्चे चलाने के बाद कम से कम 24% से 30% तक का मुनाफा चाहिए नहीं तो यह व्यवसाय नहीं चल पाएगा.

इसी के साथ साथ अभिभावकों के मन में अपने बच्चों को और आगे पढ़ाने (बढ़ाने का पर्याय समझने के कारण) की इच्छा प्रबल होती गयी. बहुत से नये कॉलेज खुले गए. आनन फानन में अत्याधिक कॉलेज खोल दिये. उदाहरण के लिए, जिस देश में 1 लाख इंजीनियर चाहिए थे वहाँ पर आज 16 लाख इन्गीनीरिंग की सीटें हैं. सरकारी सीटें आज भी लगभग 50 हज़ार हैं बाकी सब निजी कॉलेज, जहां न तो ज्ञान की प्राप्ति है और न ही किसी प्रकार के कौशल की. अब वहाँ से बेरोजगार ही पैदा हो रहे हैं. हर अभिभावक ने 10 लाख रुपये खर्च किए और एक विद्यार्थी ने 4 बहुमूल्य साल जवानी के दिये. नतीजा ठन ठन गोपाल. इससे मात्र कॉलेज के मालिकों का धंधा चला और जनता मूक दर्शक की भांति बेवकूफ बनती गयी.

अब जो नये अभिभावक थे वह समझने लगे कि अच्छे स्कूल में पढ़ाने से बच्चे अच्छा कर पाएंगे उन्होंने महंगे स्कूल में पढ़ाना शुरू किया. स्कूल प्रशासन ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया. बेहतर शिक्षा के नाम पर बेहतर सुविधाएं दी जाने लगीं. हमारी संस्कृति में था “सुखार्थी को विद्या कहाँ और विद्यार्थी को सुख कहाँ” जहां कृष्ण और सांदीपनी एक आश्रम में पढ़े, वहीं हमारे समाज में एक तरफ स्कूल हैं जिनमें बच्चों को पीने का पानी नहीं मिलता और दूसरी तरफ वातानुकूलित कक्षाओं में भावी पीढ़ी पढ़ रही है. अब आइये इससे और बड़े और महत्वपूर्ण विषय पर भी चर्चा कर लें.

शिक्षा का उद्देश्य क्या है? भारतीय संस्कृति में शिक्षित व्यक्ति का अर्थ मुख्य रूप से संस्कारी व्यक्ति था जो आज नहीं रह गया. आज के शिक्षक, अभिभावक और छात्र यह नहीं जानते कि असल में शिक्षा से वह क्या चाहते हैं. आप यदि किसी से पूछें तो उत्तर है कि भविष्य बेहतर हो जाएगा. शायद अच्छी नौकरी मिल जाएगी. हमारी संस्कृति के अनुसार शिक्षित व्यक्ति की सोच समाज, पर्यावरण और रिश्तों को बेहतर बनाने में योगदान देती है. परंतु आज की शिक्षा इसके विपरीत सोच को पैदा करती है.

यदि आप सोचते हैं कि शिक्षा से नौकरी मिलती है तो आज इतनी बड़ी संख्या में तथाकथित पढ़े लिखे बेरोजगार क्यों हैं? यदि यह शिक्षा पद्धती अच्छे संस्कार दे रही है तो आज इतनी बड़ी संख्या में समाज में दुराचार क्यों हो रहा है. यदि यह शिक्षा पद्धति पर्यावरण को बेहतर बनाने में योगदान देती है तो आज पर्यावरण का इतनी बड़ी मात्र में दोहन क्यों हो रहा है?

अब रही बात रायन स्कूल की दुर्घटना की, बड़ा दुख जताते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि क्या CCTV या चौकीदार बदलने से इस प्रकार की दुर्घटना को रोका जा सकता है. पुलिस से verification न होने को अभी एक अपराध माना जा रहा है. पुलिस verification का प्रश्न तो तब आता जब वहाँ से कोई भाग जाता और नहीं मिलता. मेरा यह कहना कभी नहीं है कि पुलिस verification की आवश्यकता नहीं है. सुरक्षा के नाम पर यदि आप हर बच्चे की कक्षा के बाहर चौकीदार रख देंगे तो भी इस दुर्घटना से कोई सरोकार नहीं है. याद करें कि 1984 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या इनके सुरक्षाकर्मियों ने ही की थी. मैं हर रूप से इसकी जांच का समर्थन करना चाहूँगा परंतु भविष्य में यह न हो इसका कारण हमे समाज से ही ढूँढना है.

अगले अंक में इस के निवारण पर कुछ चर्चा करेंगे.

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