हिन्दू को जब ‘हिन्दू’ कहकर गाली नहीं दे सकते तो कह देते हैं ‘संघी’

गाली, घृणा का शब्द रूप होती है. कोई ऐसी कृति या ऐसी इच्छा जिसकी कल्पना से ही घृणा का भाव जागृत हो, उसे गाली का रूप मिलता है. बाकी तो आप सभी विज्ञ हैं, इसका अधिक विस्तार आवश्यक नहीं है. यह बात मन में इसलिए आई क्योंकि भारतीय वामी और इल्हामी ‘संघी’ यह शब्द को अभद्रता की परिसीमा का द्योतक मानकर गाली के रूप में प्रयुक्त करते हैं. उनहोंने किसी को ‘संघी’ कह दिया तो बहुत बड़ी गाली दी यह माना जाता है और भद्रलोक में (‘भद्रलोक’ केवल एक पूर्वी प्रांत तक सीमित माना जाये) वो व्यक्ति लगभग सभ्य समाज से बहिष्कृत माना जाता है.

ऐसा क्या है इसमें जो ‘संघी’ को गाली समझा जाये, कोई वामी-इल्हामी समझाएँगे? मुझे तो साफ दिख रहा है कि असल में इनके मन में गाली ‘संघी’ नहीं बल्कि ‘हिन्दू’ है. लेकिन ‘काफिर’ कहना politically correct नहीं होता इसलिए ‘संघी’ कह देते हैं और ‘संघी’ के साथ इतनी नकारात्मक भावनाएँ और छवियां जोड़ देते हैं कि लोग ‘संघी’ कहलाने से डरें.

यह एक प्रकार का मानसिक नियंत्रण करने का प्रयास होता है. आप अगर संघी साबित होते हैं तो आप के लिए हमारे पास जगह नहीं है यह मूल संदेश है. लेकिन जो व्यक्ति इसका शिकार होता है वो ज़िंदगी में कभी संघी होना तो छोड़ ही दीजिये, स्वयं को हिन्दू कहलाने में भी लज्जा अनुभव करता है. देखिये यह कैसे किया जाता है.

शुरुआत महाविद्यालयों से होती है. यह वो आयु है जहां बहुत कुछ भीतर हिलोरें मार रहा होता है. घर और पाठशाला के संस्कार इनका विरोध करते हैं लेकिन मन उन्हीं बंधनों को तोड़ना चाहता है. इसी समय सीनियर विद्यार्थी और अध्यापकों की भूमिका बहुत महत्व की होती हैं. यहीं, वामी और इल्हामी मिलकर हिन्दू लड़के को भ्रष्ट करने में एड़ी से नितंब तक का ज़ोर लगाते हैं. ‘Bold and Beautifool’ लड़कियां उनका सब से कारगर हथियार होती हैं, जो लड़के और लड़कियां दोनों को बहकाने के काम आती हैं. Beautifool की स्पेलिंग सोच समझकर लिखी गई है, यह ध्यान रहे.

युवा लड़का ऐसी लड़कियों का सानिध्य चाहता है. कुछ नहीं तो कम से कम उनकी नज़रों में अपने लिए प्यार नहीं तो तिरस्कार भी नहीं देखना चाहता. अगर ये Beautifool लड़कियां उसका boldly मज़ाक उड़ाए तो बहुत आहत होता है. ये मज़ाक न उड़ाएँ, इसलिए कुछ भी कर सकता है और यहाँ कुछ भी तो नहीं करना पड़ता, बस संस्कारों को धीरे-धीरे छोड़ देना होता है. मैथड भी ऐसी होती है कि संस्कार कब छूटे पता ही नहीं चलता और पता चले तो भी मलाल नहीं रहता. जरा सा हो भी, तो भी दोस्त कब काम आएंगे, ऐसे क्षणों का सहारा ही तो होते हैं, हर फिक्र को धुएँ में उड़ाने के लिए.

अगर सुसंगठित प्रयास किए जाये तो लड़कियों को बरगलाना भी कठिन नहीं होता. सीनियर यहाँ भी काम आती हैं. पहचान, दोस्ती ऐसे ही सिलसिला और काफिला बढ़ता है. जहां लड़की ने विरोध किया वहाँ उसे अपमानित करना और ग्रुप से बाहर करना पर्याप्त होता है. बहुतांश लड़कियां तो इसके पहले ही ‘ग्रुप का रिवाज है’, इसमें आ जाती हैं. यह आयु भी वैसी होती है, ज्यादा कोई ज़ोर लगाना आवश्यक नहीं होता. सभी ‘बिंदास’ कहलाने के लिए कलपती हैं, अन्य लड़कियां या लड़के ‘भेन्जी’ (बहन जी) कहें, यह महाविद्यालयीन युवती के लिए अपमान की परिसीमा होती है.

फिर भी संस्कार कहीं ज़ोर मार ही जाये तो अध्यापक भी काम आते हैं. माँ-बाप से ऊपर गुरु का महत्व है और यहाँ साक्षात गुरु बता रहे / रही है तो फिर सोचना क्या?

बिना खड्ग बिना ढाल यह लड़ाई ऐसे जीती जाती है, दबाव से. अगर वाकई संस्कारी युवा या युवतियों से पाला पड़ा तो उनसे दूरी तो बनाई जाती ही है, लेकिन उन पर मानसिक पिछड़ेपन का तमगा दिया जाता है और यथासंभव अपमानित किया जाता है ताकि उनसे अन्य युवा या युवतियाँ प्रभावित न हो पाये.

आप नोट करिए, सभी अभिनेत्रियाँ, 50 पार हो जाने के बाद भी दस वर्ष से कम आयु की बच्चियों से भी खुद को दीदी ही कहलवाना पसंद करेंगी. केवल खून के रिश्तेदारों में ही वे मम्मी, मौसी या बुआ होती है. वो भी घर में. आँटी कहके देखे कोई, बुलेटप्रूफ जैकेट भी उसकी रक्षा नहीं कर पाएगा. बच्चे युवा हो जाते हैं तब आँटी होने से चारा नहीं रहता.

संस्कारों को नीचा दिखाना, भाषा का परिहास करने से शुरू होता है. यह विषय भी विस्तार के योग्य है, यहाँ एक फिल्मी गीत का उल्लेख कर रहा हूँ. “प्रिये प्राणेश्वरी”, लिंक देखिये, बात समझ में आ जाएगी. विशुद्ध हिन्दी में वार्तालाप करने की चेष्टा करता व्यक्ति कुचेष्टा का पात्र बना दिया जाता है.

हर वाक्य में अंग्रेज़ी या उर्दू का एकाध शब्द नहीं आए तो व्यक्ति को गंवार माना जाता है. वही अगर वो खालिस उर्दू में बात करे तो उसको अहोभाव, क्षमा करें, इज्जत से देखा जाता है. दूसरा उदाहरण परफेक्शनिस्ट जिहादी की फिल्म “तारे ज़मीं पर” का है. ईशान के बारे में निकुंभ के एक सहकर्मी शिक्षक उन्हें हतोत्साहित करते दिखाये गए हैं. क्या उनके मुंह में संस्कृतनिष्ठ शुद्ध हिन्दी का प्रयोग यूं ही था या इसमें भी जिहादी का परफेक्शनिस्ट दिमाग काम कर रहा था? और जब वे अपना बोलना समाप्त करते हैं तो उनका जवाब उपहासात्मक लहजे में Heil Hitler कहकर देना… संघ को फासिस्ट जो लोग कहते हैं, हिटलर को भी फासिस्ट ही कहते हैं… महज संयोग?

हिन्दी में वार्तालाप से हमें आनंद नहीं आता, उर्दू में गुफ्तगू के गू में लुत्फ ज़रूर आता है. उर्दू आना ज़रूरी नहीं.

इससे जिन्हें लगता है कि मुझे उर्दू से दुश्मनी है तो मेहरबानी कर के अपनी गलतफहमी दुरुस्त कर लें. मेरा विरोध केवल हिन्दी को हेतुत: अपमानित किए जाने से है क्योंकि यहीं से हिन्दू के अपमान की नींव डाली जाती है. यह वाक्य बहुत महत्व का है, दुबारा पढ़िये – विरोध केवल हिन्दी को हेतुत: अपमानित किए जाने से है क्योंकि यहीं से हिन्दू के अपमान की नींव डाली जाती है. इस नींव पर फिर हिन्दू-द्वेष के मानसिक भवन तथा मंडियाँ निर्मित की जाती हैं जहां हिंदुओं से घृणा करने वालों को ही रहने तथा क्रय-विक्रय के स्थान उपलब्ध होते हैं.

अगर आप को यह लेख बोझिल लगा हो तो क्षमा करें, लेकिन अब आप को अनुमान हो गया होगा कि हमें कितना दूर तक भटकाया गया है.

हो सकता है आप का राष्ट्रीय स्वयंसेवक ‘संघ’ से कोई संबंध न हो. ना ही मैं आप को संबंध बनाने को प्रेरित कर रहा हूँ. लेकिन जो कुछ इस लंबे लेख में संक्षेप में बता पाया उसमें संघ आता ही कहाँ है? यह तो बस एक हिन्दू की जीवनशैली, उसके धर्म, संस्कारों की बात हो रही थी. फिर भी अगर आप को इन सब का अभिमान है, अगर आप इनसे जुड़े रहना चाहते हैं तो पूरी संभावना है कि अगर ऐसे लोगों से आप का संघर्ष हो तो आप को ‘संघी’ कहा जाएगा. और वह भी केवल ‘संघी’ से बात नहीं बनेगी, साथ में ‘गुंडा’ भी जोड़ा जाएगा.

अपने से जो अलग होते हैं उनके लिए अपने टोले में द्वेष भावना दृढ़ हो इसके लिए वा क ई गिरोह हमेशा प्रयत्नरत रहता है. भारत में ये तीनों हिंदुओं को संघी कहते हैं. यह इसलिए क्योंकि संघ का अस्तित्व है और वो हिन्दुत्व की बातें तो करता है. लेकिन इन तीनों का वास्तविक हेतु हिन्दू को ही गाली देने का है, यह तो आप समझ गए ही होंगे.

इनसे जब भी बहस छिड़े, ये मुद्दे याद रखें. इन्हें वास्तविक शत्रुता हिन्दू से है, संघ केवल नाम लेने के लिए है. हमें जहां अवसर मिले वहाँ यह सत्य सामने लाना ही होगा. अन्यथा कल ये हिन्दू होना भी हेय बना देंगे. इनका हर प्रकार से विरोध आवश्यक है.

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