पीयूष मिश्रा : जीवन की कहानियाँ कहता एक सच्चा कथाकार

कथाकार सिर्फ वही नहीं होता जो कथाएँ लिखता है. सच्चा कथाकार वो होता है जो कथाओं को जीता है. किताबों में पढ़कर या दूसरों के जीवन में झांककर लिखने वाले अच्छे साहित्यकार तो हो सकते हैं लेकिन उनका लेखन वैसा ही होगा जैसे किसी ने बंजर ज़मीन पर आलीशान महल किराये पर ले लिया हो.

सच्चे कथाकार के पास अपने जीवन से उपजी कहानियां होती है, फिर भले वो एक एक टूटी फूटी झोंपड़ी जैसी ही क्यों ना हो. लेकिन उसमें रहने का आनंद तो सिर्फ वो कथाकार ही जान सकता है.

ऐसे ही जब अपने झोंपड़ी नुमा घर की खिड़की से झांकते पीयूष के मुंह से जब बच्चों सी किलकारी निकलती है… “हाउसफुल” … तो उनके अंदर का वो सच्चा कथाकार आँखों की खिड़की से झांकता दिखाई देता है … जो शायद उस मल्टीप्लेक्स में जाकर मर जाता जहां न जा पाने के दुःख के कारण उसे अपने गाँव लौटना पड़ता है. और उसके खुद के आगे उजागर होता है उसके अन्दर छुपा बैठा कथाकार.

एक ऐसे ही कथाकार की भूमिका में जब पीयूष अपने नाम के अनुरूप ही अभिनय का अमृत डालते हैं तो निकलकर आता है गाँव के चौपाल पर जीवन का सच्चा स्वरूप, मासूम बच्चों की खिलखिलाहट और भोले गांववालों की मासूमियत में.

दस मिनट की यह शोर्ट फिल्म बहुत सूक्ष्म तरीके से जीवन का बहुत बड़ा सन्देश दे जाती है कि जीवन जब आपसे आपकी कोई महत्वपूर्ण वस्तु छीन रहा होता है तो उसे पकड़कर मत रखिये, वो आपके लिए उससे भी अधिक अनमोल वस्तु आपकी झोली में डालनेवाला है.

कम शब्दों में बहुत गहरी बात कह जाने का कौशल्य मैंने कम ही लोगों में देखा है. आप भी देखिये और आनंद लीजिये जीवन के इस बहुमूल्य दस मिनट का.

 

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