सरकार, उस मरीज़ की तो सोचिये जो खतरे में है, वेंटीलेटर पर जाने ही वाला है

एक मित्र से फ़ोन पर चर्चा हो रही थी. मोदी और उनके मुसलमानों के प्रति एप्रोच और हिन्दू हितों पर उनके स्टैंड के बारे में उन्होंने एक बहुत तार्किक बात कही – “डॉक्टर साहब, आप अगर किसी हस्पताल में मरीज़ देखते हैं तो हिन्दू मरीज़ भी देखते हैं, मुसलमान को भी देखते हैं… तो आप मुसलमान को खराब इलाज या गलत दवाई तो नहीं दीजियेगा ना… जैसे आप प्रोफेशन की मर्यादा से बंधे हैं, वैसे ही मोदी पद की मर्यादा से बंधे हैं… रहना भी चाहिए… प्रधानमंत्री रहते हुए सबका ख्याल रखना उनके संस्कार हैं… इसको सेक्युलरिज्म मत समझिये…”

एक क्षण के लिए तो निरुत्तर हो गया. मोदी की दुविधा और धर्मबंधन भी समझ में आया. अगर मोदीजी से आमने सामने बात करने का अवसर मिला होता तो संभवतः उनके मुँह से कुछ यही उत्तर मिला होता.

पर इस तुलना के कुछ आंतरिक विरोधाभास भी हैं. अगर इस तर्क को मानें तो यह स्थापित होता है कि मुस्लिम समुदाय भी मोदी की जिम्मेदारी है. वे मोदी के मरीज़ हैं और मोदी उनके डॉक्टर. उनकी शिक्षा, उनका सामाजिक विकास सब मोदी के दायित्व क्षेत्र में आता है. मोदी उनकी लड़कियों को पढ़ाने, उन्हें अधिकार दिलाने, उन्हें सामाजिक कुरीतियों से बाहर निकलने के प्रयास में लगे हैं. मोदी उनकी धार्मिक शिक्षा को भी आधुनिक और समसामयिक बनाने और उन्हें रोजगार देने में लगे हैं… किसी मोहवश नहीं बल्कि अपने संवैधानिक दायित्व के निर्वाह में…

सब बहुत ही सराहनीय सेंटिमेंट हैं, पर इसमें सिर्फ एक पूर्वधारणा है – कि मुस्लिम समुदाय आपको अपना डॉक्टर समझता है, या आपसे इलाज कराने को उत्सुक है. किसी का इलाज करने के लिए एक आवश्यक शर्त है इलाज के लिए सहमति (कॉन्सेन्ट). बिना कॉन्सेन्ट के आप किसी का इलाज या आपरेशन तो क्या, उसे छू तक नहीं सकते.

मुस्लिम समाज मोदी को ना तो अपना प्रधानमंत्री मानता है, न वो उन संवैधानिक मान्यताओं को स्वीकृति देता है, जिसकी बाध्यता समझ कर मोदी उनका उपचार करने निकले हैं. यह मरीज़-डॉक्टर का संबंध एकतरफा नहीं हो सकता और ज़बरदस्ती किसी को पकड़ कर उसका इलाज करना एक बचकाना हरकत है…

वहीं कुछ बीमारियाँ ऐसी हैं जिनका इलाज बिना कॉन्सेन्ट के हो सकता है… जैसे सायकोसिस (मनोरोग). मरीज़ को पकड़ कर, बाँध कर दवाई दी जा सकती है, इलेक्ट्रो-कंवल्सिव थेरेपी यानी बिजली के झटके भी दिए जा सकते हैं… खास तौर से तब जब किसी की बीमारी दूसरे के लिए खतरा बन जाये…

पर मोदीजी की नज़र तो मनोरोग विभाग पर नहीं, स्त्रीरोग विभाग पर है… यह गायनेकोलॉजिस्ट बनकर जनाने में घुसना, यह ठीक नहीं है मोदीजी… ना ही मरीज़ अपना इलाज करवाने को लिथोटोमी पोजीशन में तैयार है… ना ही यह पूरे देश की प्रायोरिटी है… उस मरीज़ की सोचिये जिसकी जान खतरे में है… वेंटीलेटर पर जाने ही वाला है…

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