गौहत्या पर असहिष्णु न होते शिवाजी और मंगल पांडे, तो कुछ और होता आपका नाम व मज़हब

भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकट रमण रामकृष्णन ने सोमवार को लंदन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में कहा कि भारत को मांस पर बहस छोड़ कर शिक्षा पर ध्यान देना चाहिये, ‘कौन कैसा मांस खाता है’ इसके बजाय विज्ञान और तकनीक पर निवेश करना चाहिये.

रामकृष्णन के कथन का मतलब यह था कि भारत में गोहत्या पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई जानी चाहिए, गोमांस भक्षकों को पूरी तरह छूट दी जानी चाहिए. उनका पूरा उपदेश केवल हिंदुओं के लिए था क्योंकि वे जानते थे कि दूसरा समुदाय तो उनकी बात सुनेगा नहीं…

वे चाहते तो ये कह सकते थे कि शांतिप्रिय समुदाय को गोमांस खाने की ज़िद छोड़ कर अपने समुदाय को ज्ञान विज्ञान की शिक्षा दिलाने की ओर ध्यान देना चाहिए… पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। उन्होंने आगे कहा कि भारत में असहिष्णुता बढ़ रही हैं… भारतीयों (हिंदुओं) को अधिक सहिष्णु होने की कोशिश करनी चाहिए।

उल्लेखनीय हैं कि वेंकट रामकृष्णन को 2009 में राइबोसोम की संरचना पर उनके शोध के लिये रसायन का नोबेल पुरस्कार मिला था…

शिवाजी एक भीड़ भरे बाज़ार में खड़े थे… तभी वहां से एक कसाई गाय को लेकर गुज़रा… वो गाय को वध के लिये ले जा रहा था… गाय समझ गयी थी कि उसका अंत निश्चित है… गाय की आँखों से आंसू निकल रहे थे… वो पछाड़े खा-खा कर ज़मीन पर गिर रही थी…

कसाई उसे लाठी, लात और नुकीले सुए से गोदकर आगे खींच रहा था… उस समय मुगलों का शासन था… गोवध उनके लिये एक सामान्य बात थी… विरोध करने वाले की निर्मम तरीके से हत्या कर दी जाती थी… पूरे बाजार में सब लोग चुपचाप खड़े रहकर तमाशा देख रहे थे…

शिवाजी की आंखों में इस दृश्य और गाय की पीड़ा को देखकर आंसू भर आये… उनके हृदय और मस्तिष्क में क्रोध की अग्नि जलने लगी… उन्होने तुरंत उस कसाई को रोक कर गाय छोड़ने को कहा…

कसाई ने गाय छोड़ने की बजाय शिवाजी को अपशब्द कहने शुरू कर उन पर हमला कर दिया… शिवाजी ने तुरंत अपनी तलवार निकालकर उस कसाई का पहले हाथ काटा, फिर सर धड़ से अलग कर दिया… और गाय को आजाद कराकर सुरक्षित स्थान पर छोड़ आये…

उस समय शिवाजी महाराज की आयु मात्र 17 वर्ष थी… यहीं से बालक शिवाजी ने अत्याचारी मुगल सल्तनत को उखाड़ फेंकने का संकल्प कर लिया… उन्होंने मराठा हिंदू वीरों को एकत्र कर औरगंज़ेब की विशाल सेना को अपने युद्ध कौशल से अनेक बार परास्त किया… और गाय की रक्षा से शुरू हुई उनकी यात्रा “हिन्दवी स्वराज” पर जाकर रुकी…

मंगल पांडे कोलकाता के पास बैरकपुर छावनी मे ’34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री’ में सिपाही थे. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व कम्पनी के सैनिकों को 1853 मे ‘एन फील्ड पी 53’ राईफल दी गयी. इस बंदूक के उपयोग के लिये ऐसे कारतूस दिये गये जिनमे गाय की चर्बी का उपयोग किया गया था. बंदूक को लोड करने के लिये पहले कारतूस को मुंह से काटना पड़ता था.

मंगल पांडे के नेतृत्व में कम्पनी के हिंदू सैनिकों ने इनका उपयोग करने से मना कर विद्रोह कर दिया. विद्रोह में अनेक अंग्रेज अफसर और सैनिक मारे गये. मंगल पांडे को विद्रोह भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर 8 अप्रेल 1857 को फांसी पर चढ़ा दिया गया.

मंगल पांडे के बलिदान के बाद भारत में पहला “स्वाधीनता संग्राम” भड़का. इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों में मंगल पांडे का इतना खौफ बैठा कि 1857 के समस्त क्रांतिकारी सिपाहियो को ‘पांडेय’ के नाम से पुकारा जाने लगा. इस आंदोलन से भड़की चिंगारी 90 साल बाद 1947 में “पूर्ण स्वराज” प्राप्त करके ही रुकी.

सोचिये… यदि उस समय शिवाजी और मंगल पांडे इस नोबेल पुरस्कार विजेता जैसों की बातों के झांसे में आकर आम नागरिकों की तरह गायों पर हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहकर अपने धर्म से आंखे फेर लेते, तो भारत में “हिन्दवी स्वराज” और “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” का गौरवमय इतिहास वहीं दफन हो जाता.

शिवाजी और मंगल पांडे उस समय सहिष्णुता के नशे में डूब जाते तो न तो भारत में हिन्दवी स्वराज आ पाता, न 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस… और आज जो ये नोबेल पुरस्कार विजेता भाषणबाजी कर रहे हैं, इनका नाम और मज़हब भी कुछ और होता… और आज ये रसायन का नोबेल विजेता भी न होकर चेहरे पर लम्बी दाढ़ी रखकर आसमानी तालीम से अधिक कुछ न सोच पाते.

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