सांकल नहीं होती जीवन के द्वार पर

मैं तुम्हारे द्वार को
बंद मान बैठा था और
जाने क्यूं मैंने सांकल भी
नहीं छुई द्वार खटखटाने को…

मैं प्रश्नों से भरा था व्यथित था
स्वयं के केंद्र से च्युत था,
जैसे कोई ग्रह भटक जाए
अपनी कक्षा से
मैं अपने ही अस्तित्व के विरुद्ध था
मैं भरा था किसी
अंजाने से घृणा द्वेष में…

 

किंतु मैं बैठा रहा प्रतीक्षारत,
द्वार के उस पार से
किसी आहट की प्रतीक्षा में
और अब भी मैंने सांकल
नहीं छुई द्वार खटखटाने को…

 

किन्तु तभी
मौन टूटा और शब्द हुआ
और भीतर से आवाज़ आई
ये स्वर तुम्हारा था
और तुमने कहा शोर मत करो,
मैं आश्चर्य से भरा था
मैंने सांकल भी नहीं छुई थी
हिला भी नहीं तो शोर कैसा…

मैंने पूछा शोर कहा है यहां तो केवल
गहन मौन है एक बन्द द्वार है
और एक प्रतीक्षारत हूँ मैं…

तब तुमने कहा
शोर है कान धरो, प्रश्नों का
तुम्हारे ही भीतर उसे मत मचाओ
सब का उत्तर तुम हो,
और द्वार भी बंद नहीं है
बस तुमने उसे छुआ नहीं
द्वार सदैव खुला है
सांकल द्वार पर नहीं है
तुम्हारे मन पर ही लगी है.

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