अनुदान पर्वत

गाँव के लोगों को बताया गया कि सूरज का उजाला अपने साथ गर्मी भी लाता है जिससे प्यास और पसीने से आप बेहाल होंगे. अब यह तो अनुभव था सब का, इससे कैसा इंकार. गाँव वालों को बात समझ में आई, उन्होने पूछा उपाय? बताया गया कि एक टीला बना दो, सीधा किरणों को रोकेगा, छाया मिलेगी. बाकी आकाश में प्रकाश तो रहता ही है तो अंधेरा नहीं होगा, अपना काम चल जाएगा.

समय चलता रहा, लोगों की संख्या बढ़ती रही तो गाँव का आकार भी बढ़ा. टीले में और मिट्टी-गिट्टी की वृद्धि हुई. धीरे-धीरे टीले से पहाड़ से पर्वत हो गया. ऐसा नहीं कि यह काम मुफ्त में हो रहा था, इसमें मज़दूरी से लेकर मिट्टी, गिट्टी और बाकी सब मटिरियल के पैसे तो लगते ही थे और काफी सारे लगते थे.

गाँव से जो भी लगान आदि मिलता, इसकी ऊंचाई बढ़ाने तथा बढ़ती ऊंचाई के लिए इसकी नींव मज़बूत करने में उसका बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता. दूसरे गांवों से ऋण भी लेना आवश्यक हो जाता और काफी ऋण और उस पर ब्याज भी चढ़ा था.

यहाँ और एक बात समझ में आई कि सूर्य प्रकाश को अवरुद्ध करने के कारण लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ा जा रहा था. पसीना या गर्मी से आप असहज अनुभव कर सकते हैं लेकिन ये आवश्यक भी हैं. आप की सहन करने की क्षमता बढ़ती है. पेड़-पौधों और धान को सूर्य प्रकाश न मिलने से अन्न-धान्य भी निकृष्ट होता जा रहा था, पौष्टिकता गिरती जा रही थी.

चिकित्सक और विशेषज्ञ बुलाये गए उन्होने कहा कि यह पर्वत आप की समस्याओं का मूल कारण है. सूर्य प्रकाश आवश्यक है. पेड़-पौधे और फसल तो इससे पोषण पाते हैं, बिना सूर्य प्रकाश के ये मरियल उगेंगे, आप कितना भी खाद डालिए. आप को इनसे क्या पोषण मिलेगा? उल्टा केमिकल खाद से पोषित यह फल या अनाज आप को नुकसान ही करेगा. कर भी रहा है, कि नहीं?

बात सच थी, गाँव वाले हाँ में सर हिलाये.

इस पर्वत को तोड़ना पड़ेगा तभी आप का स्वस्थ्य सुधार सकता है – सभी चिकित्सक और विशेषज्ञ एकमत थे.

पंचों ने निर्णय लिया कि पर्वत तोड़ दिया जाये. गाँव में हड़कंप मच गया. हालांकि बहुतों को यह समझ में आ रहा था कि यही सही निर्णय है, लेकिन उसमें उनका निजी नुकसान हो रहा था.

पर्वत बनाने में जो माल लग रहा था, उसके कई सप्लायर थे. कई लोग उस माल को ट्रकों से उतारना-लादना-ढुलाई आदि कामों में थे. पर्वत पर ऊपर चढ़ाने की मज़दूरी से कईयों के घर चूल्हा जलता था. ऊपर उस माल को ढंग से लगाने में भी काफी लोग रोज़गार कमा रहे थे.

मज़दूरों का उत्साहवर्धन करने के लिए कुछ कलाकारों को गाने-बजाने का काम मिला था. उनके लिए गीत लिखना भी कुछ लोगों को रोज़गार देता था. कुल मिला कर गाँव के ढेर सारे लोगों की आमदनी इस समस्या को शाश्वत रखने से जुड़ी थी. पर्वत तोड़ने से उनमें से कुछेक को कुछ समय तक रोजगार मिल सकता था लेकिन एक बार पर्वत नष्ट हो जाने से वे भी बेरोज़गार होने वाले ही थे.

ऐसा भी नहीं था कि वे साफ बेरोज़गार हो जाते, लेकिन जो अन्य काम उपलब्ध थे उनमें कमाई वर्तमान कमाई से कम थी, इसके लिए वे आंदोलन पर उतारू थे. गाँव क़र्ज़ लेता रहे, उसका क्या असर होगा यह उनकी चिंता नहीं थी. पंचों को पंचायत चलानी है तो पर्वत बना रहना चाहिए नहीं तो पंच बदल देंगे, यही उनका कहना था.

पर्वत का नाम था – अनुदान पर्वत.

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