अस्तित्व की रक्षा के लिये खुद नहीं उठे तो कोई कृष्ण भी न जिता पायेगा, न बचा पायेगा

आदि काल में विश्व में भारतीय संस्कृति और व्यापार का प्रसार ‘सिल्क रूट’ के माध्यम से हुआ था. भारत इस रास्ते सेंट्रल एशिया से लेकर मध्यपूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया तक अपनी विरासत फैला ले गया था. आज एक रूट सामने आया है, ‘रोहंगिया रुट’, जो म्यांमार/ बंगलादेश से निकल कर भारत के बंगाल, असम, बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब को काटता हुआ जम्मू कश्मीर तक पहुंचा है. यह एक ऐसा रुट है, जो भारत की संस्कृति और आर्थिक समृद्धि को निगलने वाला है.

मैं हमेशा से यह मानता रहा हूँ कि भारत का असली प्रादुर्भाव तब तक नहीं हो सकता जब तक भारत की धरती, गृहयुद्ध की रक्तिमा से सिंचित नहीं होगी. ऐसा नहीं है कि हमने कभी रक्त नहीं बहाया है लेकिन हमने उस रक्त की कीमत कभी नहीं समझी है.

अब तक हमारा यही प्रयास रहा है कि हमारे लिए दूसरों का रक्त बहे लेकिन वह अपना न हो, अपनों का न हो. 1859 में यही प्रश्न अमरीका के सामने भी था, जब दास प्रथा को लेकर अमरीका के दक्षिणी राज्यों ने अपने को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया था. उस वक्त गृहयुद्ध ही एक अंतिम अस्त्र था, जिसने अमरीका को न सिर्फ जोड़े रक्खा बल्कि युद्ध उपरांत शक्तिशाली और समृद्धशाली बनाया है.

अमरीका में दासता, यदि उसके अस्तित्व के लिये खतरा बन गयी थी वही भारत के लिये धर्मनिर्पेक्षता खतरा बन गयी है. आज भारत के अस्तित्व पर पहले से ज्यादा खतरा मंडरा रहा है. लेकिन उसी के साथ हमें भारत के अस्तित्व को बचाने के लिए तैयार रहने के लिये प्रारब्ध ने मौका भी दिया है.

यदि 2014 में सत्ता का परिवर्तन नहीं हुआ होता तो हमें पता ही नहीं चलता कि कब हमको, हमारे ही लोगों ने हमारे अस्तित्व की आहुति दे दी है. हमको यही नहीं पता चलता कि जो हमारे शासक हैं, वह भारत और उसकी संस्कृति का सौदा कर चुके हैं.

मुझे लगता है कि भारत और उसकी हिंदुत्व संस्कृति के अस्तित्व के लिये अगला दशक सबसे निर्णायक होगा. सरकार कोई भी हो, यदि लोग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये सड़क पर नहीं उतरेंगे तो कोई भी कृष्ण, पांडवो को न जिता पायेगा और न बचा पायेगा. अमरीका में जब अब्राहम लिंकन ने गृहयुद्ध शुरू किया था तब उत्तरी अमेरिका अपने दक्षिणी अमेरिका के कंफेड्रेड से हारा था क्योंकि तब उत्तरी अमेरिकियों ने युद्ध की मानसिकता ही नहीं बनाई थी.

आज, जब सब कुछ सामने है तब भी हम आज, बिना सरकारी संरक्षण के घात प्रतिघात की मानसिकता नहीं बना पाए हैं. आज रोहंगिया के समर्थन में मुस्लिम और उनके सहयोगी हिन्दू सड़क पर उतरे हुये हैं लेकिन रोहंगिया के भारत में घुसने का विरोध करने वाले, घर और मोबाइल पर आक्रोश निकाल रहे है.

आज भी वे सरकार और दूसरे लोगों की तरफ, इस आशा से मुंह तक रहे हैं कि कोई दूसरा उनकी लड़ाई लड़ेगा, कोई दूसरा उनके अस्तित्व को बचायेगा. यदि हमको अपना अस्तित्व बचाना है तो हमको यह भी दिखाना होगा कि हम बचने के अधिकारी है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY