ऋषियों का खज़ाना, जिससे भारत आज भी अजेय है और चिरंजीवी है हिन्दू जाति

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प्रेमचंद की एक बड़ी मशहूर कहानी है ‘जिहाद’. कहानी के बारे में विस्तार से कहना यहाँ संभव नहीं है पर इस कालजयी कहानी की एक पात्र हिन्दू युवती श्यामा द्वारा हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल लेने वाले युवक धर्मदास से कही गई बात का शब्दशः उल्लेख करना आवश्यक है क्योंकि ये बातें जिस युवक के लिए श्यामा ने कही, उस युवक पर कभी वो जान छिड़कती थी.

श्यामा इस्लाम कबूल कर लेने वाले धर्मदास से पूछती है- “इस्लाम कबूलने के बदले में हासिल तो तुमने जो भी किया सो किया, पर कीमत क्या दी?” हतप्रभ धर्मदास पूछता है – “मैंने तो कोई कीमत नहीं दी. मेरे पास था ही क्या”?

जवाब में श्यामा उससे कहती है, “तुम्हारे पास वह ख़ज़ाना था, जो तुम्हें आज से कई लाख वर्ष पहले हुए ऋषियों ने प्रदान किया था. जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी. उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया”.

श्यामा जिस खज़ाने की बात कर रही थी, उस खज़ाने में ऐसा क्या है कि इतने महान लोगों के द्वारा युगों से इसके रक्षण की जरूरत महसूस की गई और आज भी हजारों-लाखों लोग इस खज़ाने के रक्षण हेतु परिव्राजक रूप में निरंतर सक्रिय हैं. इस खज़ाने में ऐसा क्या है कि इसके रक्षार्थ बलिदान होने वालों की कड़ी अंतहीन है.

इस खजाने को सुरक्षित रखने के लिए राम ने राजसी सुख त्याग कर वनवास का व्रत लिया था, कौशल्या ने पुत्र विरह का दर्द झेला था, देवकी और वसुदेव ने अपनी आँखों के सामने अपने सात-सात संतानों का संहार होते देखा था, यशोदा ने अपने लाड़ले कृष्ण को अपनी नज़रों से दूर पापियों के संहार हेतु जाने दिया था, कुंती ने आदर्श क्षत्राणी का धर्म निभाते हुए अपने पुत्रों को ये कहते हुए रणभूमि में भेजा कि धर्म की रक्षा हेतु ही क्षत्रिय महिलायें पुत्र जनती हैं.

आद्यगुरु शंकराचार्य की भारत परिक्रमा, कुमारिल भट्ट का आत्मोत्सर्ग, सिख गुरुओं का बलिदान इसी खज़ाने को बचाने की कोशिश में था. इसी खज़ाने के रक्षार्थ माता जीजाबाई ने बाल्यकाल से ही अपने पुत्र शिवाजी को मातृभूमि की रक्षा के लिए तैयार किया था.

पन्ना धाय का बलिदान, भामाशाह का त्याग और गुरूजी गोलवलकर की सरसंघचालक रूप में 33 साल तक की अनवरत अनथक यात्रा इसी खज़ाने के रक्षण हेतु ही तो था. सावरकर, अरविन्द, तिलक, हेडगेवार, सुभाष, भगत सिंह, लाला हरदयाल, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर सब हिन्दू माता के गर्भ से जन्मीं महान संतानें थीं जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य इस खज़ाने का रक्षण था.

इस खज़ाने को बचाए रखना इसलिए आवश्यक था और है, ताकि सम्पूर्ण विश्व और सम्पूर्ण मानव जाति आदर्शों और जीवन-मूल्यों के साथ बंधी रहे, ताकि tolerance नहीं acceptance यानि सहनशीलता नहीं स्वीकार्यता की भावना पुष्पित और पल्लवित हो, ताकि सारी दुनिया को आर्य यानि ‘भद्र और श्रेष्ठ’ बनाने का भाव जाग्रत रहे…

…ताकि केवल मानव ही नहीं अपितु हर जड़ और चेतन में ब्रह्म देखने का संस्कार बना रहे, ताकि सारे विश्व को एक परिवार और ‘सबको जीने का अधिकार’ की बात करने वाला भाव जीवित रहे, ताकि प्रकृति को भोग्या नहीं बल्कि मातृरूप में देखने की दृष्टि हो, ताकि सारी दुनिया की पीड़ित और आतंकित “उदार जातियां” इस खज़ाने के वाहकों के अन्तस्थ: में आश्रय पा सकें.

श्यामा भले काल्पनिक चरित्र हो पर सतयुग से लेकर आज तक वही श्यामा, कभी शकुन्तला, कभी कौशल्या, कभी उर्मिला, कभी देवकी, कभी सूर्य और परिमल, कभी जीजाबाई और माँ रुद्र्माम्बा देवी, तो कभी दुर्गा भाभी के रूप में इस खज़ाने के रक्षण हेतु अवतरित होकर इस खज़ाने का स्वयं भी रक्षण करतीं हैं और ऐसी सन्ततियां जनतीं हैं जिनके कारण भारत आज भी अजेय है और हिन्दू जाति चिरंजीवी है.

आज से बंगाल में शक्ति-स्वरूपिणी माँ जगदंबा का पावन पर्व महालया के साथ आरंभ हो रहा है. हिन्दू पंचांग के अनुसार ‘महालया’ की शुरूआत अश्विन महीने की अमावस्या पर होती है और इसके साथ ही दुर्गा पूजा और फिर नवरात्रि की शुरूआत होती है. महालया के दिन बंगाली हिन्दू पूर्वजों को श्रद्धाजंलि देते हैं. श्यामा जैसे अनगिनत शक्ति-स्वरूपिणी देवियों का स्मरण करते हुये नवरात्रि के इस पावन दिवस से कुछ बेहतर करने की शुरुआत कीजिये.

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