अगर गृहयुद्ध अटल है तो कष्ट उठा पाएंगे न आप!

एक ज़माने में अमेरिका में लंबी-लंबी गाड़ियां बनती थी. शेवरले “इम्पाला” तो भारत में सब से जानी मानी स्टेटस सिंबल थी उस जमाने में. चित्र दिया है, पहचान तो गए ही होंगे. वैसे गाड़ियों के शौकीन जानते होंगे कि अन्य कंपनियों की गाड़ियां भी लंबी ही होती थी, लेकिन भारत में नाम इम्पाला का था. जनरल मोटर्स के अन्य ब्रांड भी लोग जानते हैं लेकिन शायद सब नहीं जानते कि ये सभी ब्रांड एक ही कंपनी के हैं. लेकिन इस लेख का विषय जरा सा अलग है, गाड़ियाँ नहीं, आगे स्पष्ट हो जाएगा.

जापानियों ने छोटी गाड़ियां पहली बार अमेरिका में लॉंच की थी तो उनकी हंसी उड़ाई गयी थी. ये ठिगने जापानी अपनी साइज की माचिसों में हम लंबे तगड़े अमेरिकनों को ठूँसने की सोचते हैं क्या? हालांकि ऐसा नहीं था, जापानियों ने गाड़ियां अमेरिकनों के नाप से ही बनाई थी, लेकिन अमेरिकनों को अपनी लंबी गाड़ियों का अभिमान था तो मज़ाक उड़ाने के लिए कुछ भी चल जाता था. जापानियों ने बुरी तरह मात खाई.

[जो पाकिस्तान से आरपार की लड़ाई के प्यासे थे, वही आज पेट्रोल के लिए मोदी को कोस रहे]

उसके बाद, OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) ने दुनिया की हालत खराब कर दी. पहली बार अमेरिकनों को fuel efficient cars में समझदारी नजर आई. लेकिन गाड़ियां बनाने में समय लगता है. बहुत समय लेने वाला कार्य है ये. किसी भी अमेरिकन कंपनी के पास छोटी गाड़ी नहीं थी.

जापानी फिर आए और अब की बार छा गए. वैसे तो विनम्र ही रहे, व्यापार करना उन्हें भी अच्छा आता है. समय से, अमेरिकन कंपनियाँ अपनी अपनी छोटी गाड़ियां लेकर आई. लेकिन मार्केट जापानी जीत चुके थे. और तो और, अमेरिका में प्लांट लगवाने की भी बात कर रहे थे जिसमें स्थानीय लोगों को नौकरियाँ देने की बात थी. राजनेताओं का विरोध इसमें ही लपेटा जाता है. हर नेता फिर अपने समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा नौकरियाँ मिले इस चक्कर में एक दूसरे का गला काटता है. कौवा हर जगह काला ही होता है और काँव काँव ही करता है.

अमेरिकन गाड़ियों से वैसे भी जापानी सस्ते थे. गाड़ियां भी अच्छी थी. अमेरिकन जनता ने पैसे बचाने को वरीयता दी. अमेरिकन कंपनियों के तोते उड गए. Lee Iacocca – ऑटोमोबाइल क्षेत्र में दादा आदमी माने जाते थे. बहुत फैन फॉलोविंग थी उनकी. तब क्रायस्लर का सीईओ थे. उन्होंने एक टीवी एड बनवाई. खुद ही उसमें आए और अमेरिकन जनता की देशभक्ति को अपील कर के अमेरिकन उत्पादन खरीदने का भावुक आह्वान किया. लेकिन कोई खास लाभ नहीं हुआ.

हम चाहे तो इसमें खुशी मना सकते हैं कि अमेरिकन भी हमारे जैसे हो गए हैं. या हम उनके जैसे.

युद्ध को लेकर लिखे पिछले लेख को कई लोगों ने मोदी जी की अंध भक्ति कह डाला. वे किस हिसाब से मुझे उनका अंध भक्त कहते हैं यह वे ही जाने, मुझसे जिनका संवाद होता है, वे तो ऐसा नहीं कह सकते. शायद इसलिए अंध भक्त कहा होगा क्योंकि उन्हें उस लेख में कहीं उनकी बातों पर टिप्पणी सुनाई दी होगी. मेरा मंतव्य इतना ही है कि अगर हम क्लेश सहने के लिए जरा भी तैयार नहीं है तो युद्ध बर्दाश्त करने का धैर्य आज हम में नहीं है.

यहाँ भी हम आज के अमेरिकनों जैसे ही हैं शायद. अमेरिका ने भी अपने भूमि पर युद्ध नहीं लड़ा है. अपनी सेना जरूर भेजी है, अपने युवा बलिदान किए हैं लेकिन अन्य देशों में लड़ते हुए. वहाँ भी सैनिक दूसरे देशों में मरने लगे तो तुरंत सरकार की प्रखर आलोचना होती है सेना को हटा लेने के लिए. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इसमें सब से अधिक वृद्धि हुई है. वामी भी वहाँ पनपे हैं और उनकी इसमें बड़ी भूमिका है.

मोदी जी को बाजू में रखिए, अपनी ही बात करते हैं. हर कोई बात करता है कि गृहयुद्ध अटल है. होगा तो आप कष्ट उठा पाएंगे? जरा एक छोटी सी शुरुआत कीजिये. आर्थिक असहयोग भी प्रभावी शस्त्र है यह आप जानते हैं. चलिये, फिर हिन्दू अर्थव्यवस्था को लेकर अपने परिवार को समझाये. अगर इसमें होम डिलिवरीज़ बंद करवानी पड़े तो कीजिये.

देखिये कहाँ तक आप के ही गृह में गृह युद्ध छिड़ता है. यह तो बिना खड्ग बिना ढाल की ही लड़ाई होगी ना? विजयी होइए. बाहरी शत्रु के साथ युद्ध तो सरकार की चिंता है, गृहयुद्ध आप की चिंता है क्योंकि सरकार उसकी कोई चिंता नहीं कर रही है यही आप का दु:ख है. आप उसके लिए तैयारी करें. दिक्कतें यहाँ भी आएगी ही अगर गृह युद्ध होगा. जो आप के कहने के अनुसार होगा ही.

बाकी बढ़ते भावों का मैं कोई समर्थन नहीं कर रहा यह पहले ही बता चुका हूँ.

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