आइये हम चुप रहना सीखें ताकि सुन सकें फ़रिश्तों की कानाफूसी

बोलना और सुनना मात्र क्रिया नहीं कला है .
•• इतना अच्छा बोलिए कि लोग हमें दिल लगाकर सुनें, हमें सुनना उन्हें पसंद हो.
•• और इतना दिल से सुनिये कि लोग हमसे मन लगाकर बोलें, उन्हें हमसे बोलना पसंद हो.
यदि हम ये नहीं कर सकते तो आइये हम चुप रहना सीखें ताकि हम फ़रिश्तों की कानाफूसी सुन सकें. क्योंकि अप्रिय बोलने और सुनने से कहीं अधिक कल्याणकारी चुप रहना है .

समझौता करना मजबूरी नहीं एक कला है, बस हमें इसका इस्तेमाल करना आना चाहिए.
हमें छोटी-छोटी बातों पर समझौता कर लेना चाहिए और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए. किंतु अक्सर हम उलटा करते हैं, हम छोटी-छोटी बातों पर अड़ जाते हैं और अपने सिद्धांतों के साथ समझौता कर लेते हैं.
इसलिए हमें परिणाम भी उलटे ही मिलते हैं.
ध्यान रहे – इस गड़बड़ का शिकार व्यक्ति भी होते हैं और राष्ट्र भी.

ध्यान रखिए यदि आप जल्दी में हैं और काली बिल्ली आपका रास्ता काट दे, तो समझ लीजिए कि काली बिल्ली आपसे ज़्यादा जल्दी में है.

किसी की गति यदि हमें गतिहीन होने के लिए विवश करे तो ये उसकी नहीं हमारी समस्या है. किसी का पहले गंतव्य पर पहुँचना हमारे ना पहुँचने का संकेत नहीं है.
क्योंकि महत्व पहले या बाद का नहीं गंतव्य (मंज़िल) तक पहुँचने का होता है.

नोट – आपका प्रतिस्पर्धी या प्रतिद्वंद्वी “काली बिल्ली” के जैसा होता है, उसकी गति को देखकर अक्सर हम रुक जाते हैं, या जड़ हो जाते हैं. इसलिए यह सूत्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है.

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय.
आलोचना शब्द का अर्थ होता है चारों ओर भलीभाँति देखना. तो ऐसा व्यक्ति जो किसी विषय के प्रत्येक पक्ष को भलीभाँति देखने परखने की क्षमता रखता हो उसे आलोचक कहा जाता है.
निंदा – यह नींदने से आया है, कृषि की भाषा में इसे निंदाई भी कहा जाता है.

बपन- यानि बीज को बोना.
सिंचन- अर्थात पानी से सींचना .
निंदन – मतलब फ़सल के बीच उत्पन्न कचरे को निकालना या साफ़ करना.
अर्थात अर्थ में से व्यर्थ को निकाल देना.
इसलिये जो सार ( अर्थपूर्ण ) में मौजूद असार ( व्यर्थ ) को निकालने की क्षमता रखता हो उसे निंदक कहा जाता है.
ये दोनों ही सकारात्मक भाव हैं.

इसलिये पूज्य कबीरदास जी ने निंदक को पास ही नहीं उसे अपने घर में कमरा बना के देने की अनुशंसा की है. ताकि निंदक हमारे जीवन के अर्थ में से व्यर्थ की खरपतवार निकाल दे जिससे हमारा अर्थ, व्यर्थ के सम्पर्क में आकर अर्थपूर्ण होते हुए भी व्यर्थ सिद्ध ना हो.

किंतु आज के समय में लोग व्यर्थ के नाम पर हमारे जीवन के अर्थ को उखाड़ फेंकते हैं. स्मरण रखने योग्य ये है कि निंदारस काव्यशास्त्र में नहीं है, यह रस की प्रकृति का नहीं उसकी विकृति का सूचक है.

इसलिए इन्हें निंदक या आलोचक नहीं पीड़क पीड़ा देने वाला कहा जाना चाहिए . पीड़कों के लिये मेरा मानना है –

“पीड़क को परे राखिये,
पीड़क मान डुबाय.
बिन सबूत, दुर्गुण बिना,
ये प्राण हमारे खाय॥

– आशुतोष राणा

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