प्रेम को पोर्न नहीं, प्राकृतिक बनाओ

कुछ रिश्ते दुनिया के डर से नहीं उसकी नज़र से बचाकर रखना होते हैं, लेकिन हमें ये बात समझ आए इसके पहले ही उसको अक्सर दुनिया की नज़र लग चुकी होती है.

फिर याद आते हैं सलाहों के वो सारे टोटके जब कहा जाता था कि प्रेम चाहे कितना भी गहरा हो बेपर्दा होते ही चौराहे पर टंग जाता है किसी पोर्न फिल्म के पोस्टर की तरह, जिसे लोग अपनी अतृप्त लालसाओं के द्वीअर्थी संवाद में ढालकर दोस्तों के लिए बनाने लगते हैं कोई नया whatsapp मैसेज.

और फिर एक हाथ से दूसरे हाथ तक ये मैसेज इतनी लम्बी दूरी तय करता है कि पृथ्वी अपनी धुरी में खुद को संकुचित अनुभव करने लगती है.

संकुचित होने लगता है भावनाओं का वो पूरा संसार जिसे किसी ने आज तक देखा नहीं लेकिन उसकी विशालता की डींगे मारती हुई किसी कवि की कविता, तो कभी किसी चित्रकार की कूची खुद को उसका रचयिता होने का भ्रम पाल लेती है और भूल जाती है रचते हुए उसकी रचना की देह पर चिपकाए जा रहे स्क्रीन शॉट्स.

लेकिन कोई नहीं जानता प्रकृति के उस टोटके को जो हमेशा प्रेम के साथ चलता है कि जब जब दुनिया की नज़रें उस पर पड़ती है उसकी आँखें चौंधिया जाती है, कुछ अचम्भे के साथ, कुछ प्रेम के ‘दुस्साहस’ से.

और जब रिश्ता प्रकृति अपने हाथों से गढ़ती है, तो वो कोई पर्दा नहीं रखती, वह स्वच्छंद रखती है प्रेम को… फिर चाहे टांग लो उसे चौराहे पर ही नहीं, हर गली हर कूचे पर और हँसते रहो उसे देखकर…. घूरते रहो…. लेकिन जिस प्रेम पर कायनाती रोशनी नुमाया होती है वो प्रेम हर बार महफूज़ हो जाता है.

एक बार फिर भावनाओं का संसार अपने पूरे वजूद के साथ खड़ा होता है तब दौड़ पड़ती है कवि की अतृप्त कविता, किसी चित्रकार की बेचैन कूची, किसी संगीतकार की अनबुनी धुन, किसी नर्तक के पैरों की थाप और लिपट जाती है प्रेम की देह से….

आओ प्रेम को इनबॉक्स की घुटन भरी दीवारों से आज़ाद करें, और कर दें timeline पर बेधड़क चस्पा….

और निमंत्रण दो उन निगाहों को जो इनबॉक्स में “कुछ’ खोजती रहती हैं, कहो उनको आ जाओ और कर दो पोस्ट का पोस्ट मार्टम या ले लो बेधड़क स्क्रीन शॉट…

लो एक बार फिर चल पड़ा है प्रेम अपनी स्वच्छंद चाल… जो दैहिक भी हो सकता है, बौद्धिक भी और आध्यात्मिक भी. जीवन जानता है देह पर उग आए फूल की खुशबू को ताउम्र संभालना.

इससे पहले की स्पर्श के फूल सड़ने लगे और उसकी दुर्गन्ध आत्मा तक पड़ने लगे आओ इस टोटके को एक बार फिर आजमा लें कि “प्रतिकूल परिस्थिति में प्रेम पतित नहीं परिष्कृत ही होता है बिलकुल जीवन की तरह.”

फिर रोशन कर जा ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दिवानी दे मौला………….

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