भारत के लोगों की कमज़ोरियों को अच्छी तरह जानते हैं मोदी

पेट्रोल के दामों को लेकर जो त्राहिमाम हो रहा था उस पर कल मैंने लिखा -‘पेट्रोल पर रुदाली सुन यह यकीन हो गया कि ज्यादातर लोगों ने तलवार के ज़ोर पर नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिये धर्म/राष्ट्र को छोड़ा है.’ इस पर आशानुसार बड़ी तीखी प्रतिक्रियाएं आयी हैं. वैसे तो उस पर कुछ और लिखने या उसका कोई वृहत स्पष्टीकरण देने का इरादा मेरा बिलकुल नहीं था, लेकिन फेसबुक की मेमोरी ने मुझे अपना एक लेख दिखा दिया जो मैंने 3 साल पहले लिखा था. यह लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत की जनता को सिर्फ तुरंत लाभ से मतलब है, भले ही भविष्य में अँधेरा हो.

यह लेख मैंने तब लिखा था जब चीन के राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आए थे और उसी समय चीन की सेना ने लद्दाख की सीमा पर घुसपैठ करने की कोशिश की थी. उस वक्त, भारत की मौन दिखती हुयी प्रतिक्रिया पर, मोदी जी पर विपक्ष के साथ राष्ट्रवादियों ने आक्रमण कर दिया था. तब मैंने समझाने की कोशिश की थी कि हम भारतीय क्या हैं और मोदी जी क्या करेंगे.

आज जब तीन वर्ष बाद पूरे भारत ने मोदी सरकार और चीन के बीच के टकराव और चीन का अपने स्वभाव के विपरीत पाँव खींचना देख लिया है, इसलिये यह लेख प्रासंगिक हो गया है. इस लेख में टमाटर और प्याज का जिक्र है, उसमें पेट्रोल अपने आप जोड़ लीजियेगा.

कल से सब तरफ गजब का उत्सव चल रहा है. सब पोथा पोथी खोल के, अपनी अपनी चुटिया चढ़ा के या फिर काट के, मोदी, ‘चीन से कैसे निपटें’ पर ज्ञान का रायता फैला रहे हैं. किसी को विदेश नीति, कूटनीति का धेले भर का पता नहीं है लेकिन सभी उकसा रहे हैं, ‘बेटा भिड़ जाओ चीन से, बहुत पाजी है चीनी, लड़ मारो, करारा जवाब दो’.

यहाँ तो बड़ा निराशा का वातावरण फैला हुआ है. सब मोदी को पाठ पढ़ा रहे हैं, लेकिन कोई भी यह नहीं बता रहा है कि क्या और कैसे करना है? क्या मोदी को, जिंगपिंग (Xi जिनपिंग) को डांटना चाहिए? या फिर सीमा पर दो-दो हाथ तुरंत ही कर लेना चाहिए?

मोदी डाटेंगे तो दो बात होगी, या तो डर के जिंगपिंग थर-थर कांपने लगेगा या फिर उलट के इतना भारत में घुसेड़ेगा कि 1962 में वापस पहुंच जाओगे. सीमा पर दो-दो हाथ हुए तो भी दो बातें होंगी या तो भारत लड़ते-लड़ते यूएनओ में जाकर अपना कुर्ता फाड़ते हुए मर्सिया गायेगा और अमेरिका, रूस के दरवाज़े पर नाक रगड़ते हुए बीच बचाव करवायेगा या फिर 15 दिन मोर्चा संभालते हुए कई हज़ार किलोमीटर का क्षेत्र हारते हुए युद्ध विराम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगा.

तुम हिन्दुस्तानियो के भरोसे मोदिया यह करेगा? हम हिंदुस्तानी हैं क्या? बड़े सूरमा है?

जिस देश की जनता हरामखोरी और मुफ्त की चीजों को अपना एकाधिकार समझे, वो देश कहीं, अपने से कहीं मज़बूत दुश्मन से लड़ता या उसको लताडता है? इतना भी गुले गुलफाम न बनो मेरे अजीज, कि पहनने को लुंगी भी न रहे.

देश युद्ध जीतता है उसकी जन शक्ति से, उस जन शक्ति के तप से. आज की तारीख में ‘हे भारतवासी’ तुम किसी लायक नहीं हो. ‘तुमसे न हो पाएगा बेटा’. चीन हमारे जैसे अहमकों पर बहुत भारी है.

चीन क्यों वियतनाम से परेशान है? मालूम है? चीन अदना से देश वियतनाम से पार नहीं पाया था, जिसने न केवल अमरीका को भगाया बल्कि चीनियों से भी 80 के दशक में लोहा लिया था. वियतनामी जनता ने त्याग किया था, घर उजड़वाए थे. खाली चावल के दो कौर खा कर वह दो दशक ज़िंदा रहकर लड़े थे.

अभी दीवाली आ रही है, लटकाओगे चीनी लाइट्स, पूजोगे चीनी ‘लक्ष्मी-गणेश’ और सारे कूल डूड्स और बुद्धिजीवी वर्ग भेजेंगे इश्क और रश्क के संदेश चीनी मोबाइल से, फिर भी चले हैं चीन से निपटना का फार्मूला बताने!

हम भारतीय खुद ही गलीज है फिर दूसरे के गलीजपंती का फलसफा क्या पढ़ें. है औकात हमारी हे मेरे प्यारे शूरवीर भारतीयों? यहाँ तुम इसी में मरे जा रहे हो कि ‘साला टमाटर महंगा मिल रहा है. प्याज बिना प्राण ही निकले जा रहे है’.

और ये भी कि ‘बुलेट ट्रैनवा हमरे दरवाजे से नहीं गुजर रही है. हमरे प्रदेश में कौनो थूकने को ही नहीं आता है. बिजलिया न मिलै कौनो बात नाहीं लेकिन कटिया लगाये की छूट चाही. पाटीदार की मेहरारू, बिटिया और बहु उठ जाये कौनो बात नाहीं लेकिन हमरा गल्ला चौखा रहे’.

लानत है हम सब पर कि हम इस लायक भी नहीं हैं कि चीन से एक हफ्ते भी बिना पिटे हुये लड़ सकें. फिर क्या करना चाहिए?

इसके दो ही विकल्प है, एक तो युद्ध को जितना लम्बा हो सके टाला जा सके, घर में इतना दाना पानी का इंतज़ाम हो जाये कि साल भर हम युद्ध झेल सकें. टमाटर, प्याज भी साथ में जुगाड़ लें, नहीं तो एक वर्ग बीच में रुदाली करने लगेगा कि लानत है शासकों पर जो युद्ध की आड़ में हमको हमारे टमाटर और प्याज से मरहूम कर रहे है. दूसरा यह कि फिर सालों की कूटनीतिक मेहनत कर चीन को ही चारों तरफ से घेरें जैसे जंगल में जंगली कुत्ते बब्बर शेर को घेर कर गिरा देते है.

इसके अलावा कोई भी बकवास चीन के साथ नहीं चलेगी. मोदी जी यही करेंगे, वे इन दोनों विकल्पों को साधेंगे क्योंकि वह भारत के लोगों की हरामखोरी और कमज़ोरियों को अच्छी तरह जानते हैं.

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