क्या कभी सुनी थीं मुस्लिम समाज के अंदर से उठने वाली ऐसी आवाजें!

मीडियाई शोर-शराबा कई ऐसी ख़बरों को बिलकुल नेपथ्य में धकेल देता है जो अद्भुत और अकल्पनीय होती है. याद कीजिये नब्बे के शुरूआती दशक को जब देश में राम मंदिर आन्दोलन अपने चरम पर था. ‘बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी’ के पक्ष में झुण्ड के झुण्ड हिन्दू खड़े थे, कोर्ट में श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिये जितने इतिहासकार झूठे सबूत लिये खड़े थे उसमें एक इरफ़ान हबीब को छोड़कर लगभग सबके सब हिन्दू थे. इधर संघ परिवार और भाजपा के पास शो-पीस के रूप में भी एकाध मुसलमान भी नहीं था जो मंदिर के पक्ष में बोले.

आज अयोध्या के रामकथा पार्क में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ की ओर से एक मुस्लिम सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें जुटने वाले सारे मौलाना और मुस्लिम आलिम एक स्वर में ये कह रहे थे कि “बाबर आक्रान्ता था जिसने श्रीराम की जन्मभूमि को भिस्मार करके वहां मस्जिद तामीर की थी और हिन्दू और मुस्लिम समाज के बीच स्थायी वैमनस्यता का बीजारोपण किया था”.

एक मौलाना ने तो ये तक कहा कि जैसे मौला अली का जन्मस्थान ‘काबा शरीफ’ बदला नहीं जा सकता उसी तरह का श्रीराम के जन्मस्थान को भी बदलने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता. एक दूसरे मोहतरम मौलाना साहेब ने तो आगे आकर ये तक कह दिया कि “जब ये तय पाया गया है कि इस जगह पर बाबर ने जबरन मस्जिद तामीर की थी फिर तो ये जमीन हिन्दुओं की है और इसलिये मंदिर के बदले में कहीं और मस्जिद मांगने का तो प्रश्न ही खड़ा नहीं होना चहिये”.

ज्ञात हो कि “मुस्लिम राष्ट्रीय मंच” संघ के पांचवे सरसंघचालक पू. सुदर्शन जी की प्रेरणा से स्थापित हुआ था, उद्देश्य था कि भारत का मुस्लिम समाज देश की मुख्यधारा में आये, अपनी जड़ों को पहचाने और राष्ट्रीय अस्मिता के मुद्दों पर आगे आकर खड़ा हो.

इस संगठन के मार्गदर्शक संघ के बड़े नेता इन्द्रेश कुमार हैं जिन्होंने इस पूरी तहरीक को क्रांतिकारी रूप दिया है. आज अगर मुस्लिम समाज के अंदर से गो-रक्षा, मंदिर-निर्माण, वंदे-मातरम्, योग आदि राष्ट्रीय अस्मिता के विषयों पर जो कुछ समर्थन के स्वर सुनाई देते हैं वो इस एक इंसान की मेहनत और स्वीकार्यता का परिणाम है. आने वाले समय में इन्द्रेश कुमार की प्रेरणा से लाखों मुस्लिम रामलला के पावन जन्मस्थली पर भव्य मंदिर की मांग को लेकर कारसेवा करने वाले हैं.

आप अपनी समझ के अनुरूप इन्द्रेश कुमार की आलोचना करने को स्वतन्त्र है पर ऐसा करने से पहले एक बार जरूर सोचियेगा कि इनकी कोशिशों से पूर्व आपने मुस्लिम समाज के अंदर से उठने वाली ऐसी आवाजें क्या कभी सुनी थीं? शायद कभी नहीं…

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