जानें सरदार सरोवर पर कांग्रेस की टुच्ची राजनीति, पूर्व सीएम स्व छबील दास मेहता की ज़ुबानी

प्रस्तुत लेख के लेखक गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री स्व छबील दास मेहता जी हैं. ये लेख उन्होंने कच्छमित्र दैनिक में लिखा था जिसे मै साभार हिंदी में रूपांतरित कर रहा हूँ ताकि हर भारतीय इस गंदी सच्चाई को जान सके – जितेन्द्र प्रताप सिंह, अनुवादक

नर्मदा मुद्दे पर कांग्रेस ने गुजरात की जनता को सिर्फ ठगा है. नर्मदा परियोजना पर उठे विवाद को खुद इंदिरा गाँधी देख रही थी उन्होंने एक कई सदस्यों वाली कमेटी बनाई थी जो इस परियोजना से जुड़े हर पहलुओं पर विचार करके अपना फैसला देने वाले थी.

उस समय मैं गुजरात का बांध काम एवं सिंचाई मंत्री था और स्व. चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री थे. तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इंदिरा गाँधी खुद नर्मदा मामले में रूचि ले रही थीं और वो जल्द से जल्द इस विवाद का निपटारा चाहती थीं. उन्होंने इसके लिए एक हाईपावर कमेटी बनाई थी और वो कमेटी इंदिरा जी को रिपोर्ट करती थी. कमेटी के सदस्यों के साथ खुद इंदिरा जी ने मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दावों को सुना था और उन दावों पर जल्द से जल्द विचार करने का आदेश दिया था.

फिर 30 जनवरी 1974 को मुझे नर्मदा विवाद pर अंतिम फैसले की कॉपी लेने के लिए दिल्ली बुलाया गया. मैं, चिमनभाई और गुजरात की जनता बहुत खुश हुई कि चलो अब सरदार साहेब का सपना जल्द से जल्द पूरा होगा. साथ ही मेरे ऑफिस में ये एक पत्र भी आया था जिसमें इस फैसले की भूमिका थी. उसके अनुसार नर्मदा के कुल अनुमानित 21 मिलियन एकर पानी में से गुजरात को 9 मिलियन पानी मिलेगा और बिजली केवल महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश को मिलेगी. हलांकि ये गुजरात के साथ सरासर अन्याय था फिर भी हम सहमत थे कि चलो कम से कम गुजरात की प्यासी धरती की कुछ तो प्यास बुझेगी.

मै दिल्ली जाने की तैयारी में ही था कि एकाएक इंदिरा जी का चिमनभाई के पास संदेश आया कि अभी निर्णय की कॉपी लेने मत आइयेगा क्योकि निर्णय टल गया है और अब हमने नर्मदा मामले को एक ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया है और अब ट्रिब्यूनल ही इस मामले की सुनवाई करेगी.

हम सब ये सुनकर अवाक रह गये.

फिर चिमनभाई ने तहकीकात की, कि आखिर इस फैसले के पीछे कौन सी ताकतें हैं. चिमनभाई ने इंदिरा जी के निजी सचिव आरके धवन को विश्वास के लेकर पूछा और जो धवन साहब ने बताया उसे सुनकर हम दंग रह गये कि क्या भारत के नेता अब इतने नीचे गिर चुके है कि अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए पूरे राज्य को बर्बाद कर दें?

आज जो कुछ मै कच्छमित्र में लिख रहा हूँ, उसे मेरे और तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के अलावा दूसरा कोई भी नहीं जानता.

हमें पता चला कि स्व. रतुभाई अदानी (तत्कालीन गुजरात प्रदेश कांग्रेस प्रमुख) ने तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री और इंदिरा गाँधी के काफी करीबी स्व उमाशंकर दीक्षित (शीला दीक्षित के ससुर) को फोन करके कहा कि “यदि आप चिमनभाई के शासन में नर्मदा का निर्णय देंगे तो चिमनभाई इस परियोजना को तेजी से पूरा करेंगे और फिर आने वाले 30 सालों तक हम चिमनभाई को गुजरात से हटा नहीं सकते. इससे चिमनभाई बहुत ही मजबूत नेता बन जायेंगे. इसलिए आप अभी नर्मदा परियोजना को और कुछ सालों तक लटका कर रखो”.

असल में मित्रों, चिमनभाई कांग्रेस से बगावत करके मुख्यमंत्री बने थे और जिस तरह से उनका कद बढ़ रहा था उससे इंदिरा जी काफी चिंतित थी.

फिर उमाशंकर दीक्षित और रतुभाई अदानी ने इंदिरा जी को कई तरह से इस बारे में समझाया और उनसे ये भी कहा गया कि अभी एमपी और यूपी के विधानसभा चुनाव आने वाले है और इस फैसले से एमपी में भारी असंतोष होगा और एमपी के कई जिले यूपी से सटे हुए हैं, इसलिए इसका असर यूपी के चुनावों पर भी पड़ेगा और कांग्रेस को काफी हार का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन सबसे बड़ा नुकसान गुजरात में होगा क्योकि चिमनभाई का कद बहुत ही ज्यादा बढ़ जायेगा.

चूँकि इंदिरा जी चिमनभाई को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानती थीं इसलिए उन्होंने नर्मदा परियोजना को लटकाने के लिए उसे ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया. और कुछ सालों बाद गुजरात के अहमदाबाद के गुजरात कालेज में छात्रों ने होस्टल के मेस में खराब खाने को लेकर हड़ताल की और इसको एक बड़ी समस्या बताते हुए इंदिरा गाँधी ने चिमनभाई सरकार को ही बर्खास्त कर दिया.

नोट : बाद में सब कुछ भूलकर चिमनभाई की विधवा पत्नी उर्मिला बेन पटेल कांग्रेस की सरकार में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री बनी और उनके पुत्र सिद्धार्थ पटेल कई पार्टियों में घूमते हुए आज गुजरात कांग्रेस में है और अभी विधानसभा चुनाव में हार गये है.

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