मोटर गाड़ियों के विरोधी तब भी गाड़ियों में ही चलते थे, बाद में भी कभी तांगे पर नहीं बैठे

बुलेट ट्रेन और हाइपर लूप का विरोध… आखिर विरोधी होता ही है विरोध करने के लिये. उसे कोई मतलब नहीं होता कि वह किस चीज का विरोध कर रहा है. वह हर बात को अच्छी तरह से जानता और समझता है. उसके फायदों के बारे में भी उसे अच्छा इल्म होता है. लेकिन चूंकि सदन में वह विरोधी खेमे में बैठता है लिहाजा विरोध वह अपनी जिम्मेदारी मानकर करता है.

बहरहाल विरोध करने वालों का सबसे पहला प्रश्न है कि आखिर देश में बुलेट ट्रेन और हाइपर लूप जैसी चीजों की आवश्यकता ही क्या है? तो साहब, आवश्यकता तो टीवी, कम्प्यूटर और मोटर वाहन की भी नहीं बताई गयी थी जब ये चीज़ें इस देश में आयीं.

याद करिये 1957 में बनी बीआर चोपड़ा द्वारा निर्देशित और दिलीप कुमार, अजित तथा बैजयंती माला द्वारा अभिनित फिल्म ‘नया दौर’ की कहानी को. मोटर वाहन और तांगे की रेस दिखाकर यह सिद्ध करने की कोशिश हुई थी कि तांगा, मोटर से तेज दौड़ सकता है. इस फिल्म की पूरी पटकथा ही इस बात पर आधारित थी कि जब देश में तांगा चल ही रहा है तो मोटर वाहन की क्या जरुरत?

लेकिन सच्चाई फिल्मी कहानी से हमेशा अलग होती है. आज शहर तो दूर गांवों में भी तांगे ढूढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे. बाकी टाइपराइटर, सिलाई मशीन, बंदूकें, टीवी, कम्प्यूटर से लेकर हवाई जहाज तक के आने पर इस सवाल को जरुर दोहराया गया है कि इनकी क्या जरुरत है. लेकिन आज ये सभी चीजें ना सिर्फ हमारी रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गयी हैं बल्कि इनके बिना जनजीवन की कल्पना से भी हालत खराब होने लगती है.

गांव के बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब लोग गांव के बगल से मुख्य मार्ग बनने का विरोध किया करते थे. उन्हें अंदेशा रहता था कि डाकू इन रास्तों का प्रयोग करके गांव में आसानी से घुस जायेंगे. स्थिति यह थी कि परिवारों के बंटवारे के समय सबसे कमजोर भाई को रास्ते के किनारे वाले खेत हिस्से में मिलते थे. जबकि आज सड़क किनारे वाले खेत अपने हिस्से में रखने के लिये भाइयों में खून खराबे तक के समाचार पढ़ने को मिल जाते हैं.

कहने का मतलब यह है कि आवश्यकताएं समय के साथ बदलती रहती हैं. आवश्यकताओं में बदलाव ही विकास की नींव डालता है. तभी तो कहा गया है कि आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है. भोजन की आवश्यकता ही आदमी को बेहतरीन भोज्य पदार्थों के निर्माण को प्रेरित करती है. नहीं तो पेट तो कंद-मूल खाकर भी भरा जा सकता है.

विरोधियों का दूसरा प्रश्न है जब अभी सामान्य ट्रेनें ही ठीक से नहीं चल रही हों तो बुलेट ट्रेन चलाने की क्या आवश्यकता? मतलब उस दिन का इंतजार किया जाय जब पूरा देश रेल नेटवर्क से जुड़ जाए और समय से ट्रेनों का परिचालन होने लगे. इस लिहाज से तो बसों और अन्य वाहनों की भी अभी कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिये क्योंकि देश के अनेकों हिस्सों तक अभी सड़के नहीं पहुंच सकी हैं.

इसके आधार पर तो देश में जिंस बनाने की फैक्ट्रियां तभी खुलनी चाहिये जब सभी के तन पर कपड़ा आ जाये अथवा उच्च शिक्षा के संस्थानों की जरुरत तभी पड़नी चाहिये जब सभी को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध हो जाये. इस लिहाज से तो देश में हो रहे हर प्रकार के इनवेस्टमेंट को तत्काल बंद कर देना चाहिये क्योंकि अभी देश की एक अच्छी खासी आबादी अपनी मूलभूत आवश्यकता वाली चीजों की उपलब्धता से जूझ रही है.

विरोध करने का तीसरा कारण बताया जा रहा है कि जब देश में इतनी भयंकर बाढ़ आयी हो उस समय राहत और आपदा प्रबंधन पर जोर देने की बजाय एक बहुत बड़ी पूंजी बुलेट ट्रेन और हाइपर लूप जैसी चीजों में फंसाई जा रही है.

अव्वल तो इस प्रकार के सोचने वालों के समसामयिक ज्ञान पर तरस आता है. मतलब जब बुलेट ट्रेन और हाइपर लूप के प्रोजेक्ट में जापान तकनीकी के साथ आठ हजार करोड़ रूपये 0.1% ब्याज पर दे रहा हो और उधार भी पंद्रह साल बाद से चुकाना हो तो ऐसे इनवेस्टमेंट को रोकने का क्या कारण बन सकता है.

बाकी रही बाढ़ और अन्य चीजों की बात तो सरकार ने यह कब कह दिया कि वह बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्ट के लिये राहत और आपदा प्रबंधन का काम रोकने जा रही है. सरकार के बाकी काम जस के तस वैसे ही चलते रहेंगे जैसे चल रहे हैं.

वास्तव में ये सभी बातें वह सभी लोग जानते हैं जो आज बुलेट ट्रेन के विरोध में खड़े हैं. उनके विरोध का एक जबरदस्त कारण यह भी हो सकता है कि जो काम वह नहीं कर सके उसे दूसरा भी कोई न करे. लेकिन किसी के विरोध से न तो टाइपराइटर का आना रुका और न ही कोई कम्प्यूटर को आने से रोक सका.

फिल्मों के माध्यम से गाड़ियों का विरोध करने वाले उस समय भी गाड़ियों में ही चला करते थे और बाद में भी कभी तांगे पर नहीं बैठे. लेकिन विरोधी थे तो पूरी जिम्मेदारी के साथ विरोध करने से कभी पीछे नहीं हटे. आज भी जब बुलेट ट्रेन के आने के रास्ते खुल गये हैं तो विरोध करने वाले अपना धर्म निभा रहे हैं. उन्हें पूरी मुस्तैदी से यह विरोध करना भी चाहिये. लेकिन सच्चाई यही है कि विरोध करने से भी मोटर गाड़ियां आने से नहीं रूकी थीं और बुलेट ट्रेन भी आकर ही रहेगी.

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