ले चल, ले चल मेरे जीवन साथी, ले चल मुझे उस दुनिया में, दाल ही दाल हो जहां

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पिछले साल अरहर की दाल की कुछ समय के लिये बढ़ी कीमतों पर लोगों का रोना-कलपना तो आपको याद ही होगा. अब इस साल की अरहर और अन्य दाल से जुड़ी खास खबरों पर भी नज़र डालिये.

1. कालाबाज़ारियों के पैदा किये गये उस कृत्रिम संकट के बाद केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने दलहन खेती को प्रोत्साहित करने के लिये कई योजनाएँ शुरू की. इसमें किसानों को उन्नत किस्म का बीज मुहैय्या कराना प्रमुख था. 15 लाख से अधिक किसानों को मिनी किट उपलब्ध कराई गई.

2. कृषि मंत्रालय के चौथे अग्रिम अनुमान के मुताबिक वर्ष 20016-17 में कुल ‘2.3 करोड़ टन’ दलहन की पैदावार हुई है. इसमें सबसे ज्यादा सरदर्द देने वाली अरहर की रिकॉर्ड पैदावार 48 लाख टन हुई है.

3. दालों की कमी को पूरा करने के लिये हर साल 40 लाख टन के लगभग दालों का आयात किया जाता है मतलब दूसरे देशों से खरीदा जाता है. इस पर कई करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है. लेकिन इस साल सरकार के पास पहली बार ’20 लाख टन’ का बफर स्टॉक तैयार हो गया है, मतलब घरेलू माँग पूरी करने के बाद भी 20 लाख टन दालें अतिरिक्त रहेंगी. आज भारत चाहे तो दूसरे देशों को ये दाल बेच भी सकता है.

4. इस बम्पर पैदावार का फायदा सरकार ने सीधे किसानों को भी दिया. केन्द्र सरकार ने दलहन के ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ यानि खरीदी के रेट में अप्रत्याशित बढ़ोतरी भी की. किसानों को भरोसा दिलाने के लिये सरकार ने दालों को खरीदने का ठोस बंदोबस्त भी किया. खुले बाज़ार समेत किसानों से कुल 36 लाख टन दालें तो सिर्फ सरकार ने ही खरीदी.

5. भारत में कई सालों से दालों की कमी को देखते हुए कई देशों में दलहन की फसलों की खेती जोरशोर से शुरू की गई ताकि जरूरत पड़ने पर भारत को दालें बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सके. लेकिन इस साल की बम्पर पैदावार से इन देशों को तगड़ा झटका लगा है. म्यांमार और कई अफ्रीकी देशों ने अरहर की खेती का रकबा बढ़ा दिया था.

6. अरहर की दाल की कीमत 60-70 से नीचे आकर कहीं 30-40 तक ना पहुँच जाये और जिन किसानों ने अपनी उपज बेचने से रोक रखी है वो बर्बाद ना हो जाएं या जिन व्यापारियों ने माल खरीद रखा है वो बरबाद ना हो जाएं, इसलिये सरकार ने तत्काल अरहर के आयात पर रोक लगा दी है. सरकार दूसरी दालों के आयात पर भी रोक लगाने वाली है.

7) सर्वाधिक उत्पादन का इससे पहले का रिकॉर्ड साल 2013-14 का था… 1.92 लाख टन. अब ये रिकॉर्ड बहुत पीछे छूट चुका है.

दाल की कीमत पर रोने वाले इसमें भी सारा श्रेय किसानों को देने की कोशिश करेंगे जैसे सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय सिर्फ सेना को दिया जा रहा था. ये मोदी सरकार है जो संकट से भी सीखती है और उससे उबरने का पूरा प्रयास करती है.

ले चल, ले चल मेरे जीवन साथी, ले चल मुझे उस दुनिया में, दाल ही दाल हो जहां.

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