आज की नायिका: आत्महत्या की हार से जीवन को जीतनेवाली पद्मश्री कल्पना सरोज

कल्पना सरोज का जन्म महाराष्ट्र के एक कस्बे मुर्तजापुर में हुआ था. कल्पना एक दलित परिवार में जन्मी थीं. उनके पिता पुलिस में कांस्टेबल थे. पांच भाई बहनो में कल्पना सबसे बड़ी थीं. कांस्टेबल पिता शिक्षा के महत्व को समझते थे, उन्होंने कल्पना को एक सरकारी स्कूल में भर्ती कराया. लेकिन कल्पना दलित थीं. स्कूल में उन्हें बाकी बच्चो के साथ नहीं बैठने दिया जाता था. भेदभाव और लगातार अपमान का शिकार होकर मात्र 10 साल की उम्र में सातवीं कक्षा में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा.

दो साल बाद समाज के प्रेशर में उनके पिता को उनकी शादी करनी पड़ी. 12 साल की उम्र में कल्पना विवाह करके जिस घर में पहुंची, वहां दस लोग थे. उन्हें घर के सारे काम करने होते थे. खाना बनाना, साफ़ सफाई. लेकिन जरा सी गलती पर बेहद मार पड़ती. वो वहां पारिवारिक सदस्य नहीं गुलाम थीं. जब छह महीने बाद उनके पिता उनसे मिलने घर आये तो उन्होंने पाया कि उनकी लड़की एक चलती फिरती लाश में बदल चुकी है.

कुछेक साल बाद अंत में उनके पिता को उन्हें मायके वापस लाना पड़ा. वो चाहते थे कल्पना दुबारा शिक्षा ग्रहण करें. लेकिन पास पड़ोस की छींटाकशी, तानेबाजी प्रताड़ना में कल्पना को स्कूल जाने नहीं दिया. लेकिन कल्पना ने सिलाई का काम जरूर सीखना शुरू कर दिया. एक वैवाहिक महिला अपने मायके में रहते हुए बोझ और शर्म का कारण मानी जाती है. लगातार तानाकशी जिसमे मुख्य सलाह मर जाने की होती, ने कल्पना को विवश किया कि वो एक दिन जहर से भरी शीशी पी लें.

सौभाग्य से उनकी ऑन्टी ने उन्हें जहर पीते देखा और फिर उन्हें अस्पताल ले जाया गया. जहाँ डाक्टरों ने कहा उनका बचना चमत्कार ही होगा. अगर 24 घंटे में होश आ गया तो बचने की सम्भावना है. जब कल्पना ने अपनी आँखें खोली तो वो एक बदल चुकी इंसान थी. एक दृण निश्चयी महिला जो अब मरने को नहीं लड़ने को तैयार थीं.

कल्पना मुंबई चली गयीं. अपने के चाचा के पास मुंबई के स्लम में उन्हें शरण मिली. कल्पना ने सिलाई सीखी हुई थी. उन्होंने दरजी का काम शुरू किया. दुर्भाग्यवश उनके पिता की नौकरी जाती रही. और कल्पना अपने परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य थीं. उन्होंने स्लम में ही एक कमरा किराये पर लिया, अपने पूरे परिवार को मुंबई बुलाया. अब पूरा परिवार सिलाई करके पेट पाल रहा था.

इसी बीच कल्पना की सबसे छोटी बहन बीमार पड़ी, और पैसे के अभाव में उचित इलाज मिलने से चल बसी. कल्पना को समझ में आया कि इस संसार में पैसा ही सब कुछ है. कल्पना ने कसम खायी की वो इसे हासिल करके रहेंगी.

कल्पना ने सरकारी मदद, लोन के बारे में मालूम करना शुरू किया. तमाम प्रयासों के पश्चात महात्मा ज्योतिबा फुले योजना के तहत उन्हें लोन मिल गया. इस छोटी सी पूँजी से कल्पना ने फर्नीचर बनाने का काम शुरू किया. महंगे फर्नीचर का सस्ता रूप. इस काम ने कल्पना को एंटर प्रेन्योर होना सिखाया. बिजनेस की समझ विकसित हुई. कच्चे माल की खरीदारी, सेल्स, एकाउंटिंग, ग्राहकों से निगोशिएशन.

कुछेक साल में उनका काम चलने लगा. कुछ पैसा भी हाथ आया. किस्मत करवट लेने लगी थी, तमाम मुसीबतों के बाद जैसे मेहरबान हो रही हो. उनके पास बम्बई में एक जमीन खरीदने का प्रस्ताव आया. जमीन कई मुकदमों में उलझी थी, डिस्ट्रेस सेल थी, मालिक को पैसा चाहिए था, अर्जेन्ट.

कल्पना ने उधार माँगा, चोरी की, अपना सारा पैसा लगाया, जमीन खरीद ली. अगले दो साल कोर्ट के चक्कर काटने में गए. लेकिन फिर उन्हें कब्ज़ा मिल गया. अब वो मुंबई शहर में एक जमीन की मालकिन थीं. एक स्लम में रहने वाली आज मुंबई शहर में शान से जमीन की ओनर थी. लेकिन लैंड डेवलप करने का पैसा उनके पास नहीं था.

फिर एक इन्वेस्टर से एग्रीमेंट हुआ. 65% प्रॉफिट पर इन्वेस्टर ने कल्पना को पैसे दिए. कल्पना फर्नीचर की दुकान के साथ अब रियल एस्टेट में भी थीं. समय बदल रहा था. काम लगातार बढ़ रहा था. कल्पना ने सोशल वेलफेयर भी शुरू किया. वो अपने समाज के लोगों को खास तौर पर महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करने लगी. वो लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में बताती. ऋण सुलभ करवाती. उन्होंने NGO खोला, दलित बच्चों की शिक्षा में सहयोग देना शुरू किया.

उनकी ख्याति फ़ैल रही थी. और किस्मत अभी भी बदल रही थी परवान चढ़ रही थी. एक दिन कमानी ट्यूब्स के कुछ मजदूर उनके पास पहुंचे और कमानी ट्यूब्स कंपनी को अपने हाथों में लेने की कल्पना से प्रार्थना की. कमानी ट्यूब्स की अपनी ही एक अजीब कहानी थी. मालिक की मृत्यु के बाद बच्चो में मालिकाना हक़ को लेकर झगड़ा हुआ. कोर्ट में केस गया. सुप्रीम कोर्ट में वर्कर यूनियन ने केस डाला और कहा कि तत्कालीन मालिक कंपनी का अहित कर रहे हैं और कंपनी का मालिकाना हक़ मजदूरों को दिया जाये. सन 87 में अपने एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों की बात मान ली. कंपनी मजदूरो को सौंप दी.

कमानी के एक नहीं 3000 मालिक थे. कंपनी कैसे चलानी है, मालूम नहीं था. लेकिन दुनिया में हल्ला था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि मजदूरों को अदालत एक कंपनी चलाने को दे दे. सरकारी मदद थी. बैंको से ढेरो लोन भी मिला. अगले सात साल कठिन बीते. मजदूर कंपनी संभाल नहीं पाए. कई मजदूर यूनियन बन गयी जिन्होंने कोर्ट में आपसी मुकदमे किये कि कंपनी कौन चलाएगा. इसी बीच लोन की राशि ब्याज समेत बढ़ती जा रही थी. सरकारी टैक्स पेनल्टी के साथ बढ़ रहे थे. सन 95 में कम्पनी पर 140 अदालती केस चल रहे थे, 116 करोड़ का लोन टैक्स लाइबिलिटी चढ़ चुकी थी. कम्पनी बंद पड़ी थी.

566 परिवार भूखों मर रहे थे. ऐसे में एक दिन कुछ मजदूर कल्पना के पास पहुंचे. और उनसे आग्रह किया कि वो कंपनी को संभाले. कल्पना बड़े पशोपेश में थीं. लेकिन इतने लोगों की पीड़ा को बर्दाश्त न कर सकी और उन्होंने हाँ कर दी. उन्होंने बैंको को रिवाइवल स्कीम दी कि कैसे कैसे वो कंपनी को वापस अपने पैरो पर खड़ा करेंगी. बैंको ने कहा आप कंपनी को टेकओवर कीजिये, प्रमोटर बनिए तब हम आपकी बात मानेंगे.

कल्पना अब एक कम्पनी की मालिक थीं जो कर्जे और मुकदमे में डूबी थी. जिसके सर्वाइवल का कोई चांस नहीं था. प्रोडक्शन बंद था. हाथ में पैसा नहीं था. अगले छह साल अदालतों, बैंको के चक्कर काटते बीते. फिर कल्पना ने जब कर्जो का एनालिसिस किया तो पाया कि ओरिजिनल कर्ज कम है. ब्याज की राशि ज्यादा है. टैक्स कम हैं, पेनल्टी ज्यादा है.

कल्पना महाराष्ट्र के वित्त मंत्री से मिलीं. अनुरोध किया. मंत्री जी ने बैंको, इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स डिपॉर्टमेंट से बात की. इंटरेस्ट वेव ऑफ हो गया. टैक्स पर पेनलिटी खत्म हो गयी. इस शर्त पर कि बैंको को पैसा वापिस मिलेगा, लोन के प्रिंसिपल अमाउंट में से 25% अमाउंट कम हो गया.

कल्पना ने बैंको की शर्ते स्वीकार की. सात साल में लोन की राशि लौटानी थी. अदालत ने मुकदमे खत्म किये और आदेश दिया कि मजदूरों को सालों की सैलरी तीन साल में देनी थी.

कल्पना ने तीन महीनो में मजदूरों की सैलरी उन्हें दी. मात्र एक साल में बैंको का लोन चुकाया. वर्कर्स को 90 लाख रूपये बकाया राशि में अतिरिक्त दिए ताकि उनका विश्वास जीत सकें. प्रोडक्शन स्टार्ट हो सके. एक सिक कंपनी, नीलाम होकर खत्म होने को तैयार कंपनी आज पैरों पर खड़ी थी.

कल्पना आज 100 मिलियन डालर बिजनेस एम्पायर की मालकिन हैं. कमानी के अलावा, आज उनकी शुगर मिल है. रियल एस्टेट है, विदेशों में ब्रांचेज हैं. तमाम पुरस्कारों से नवाजी गयी हैं. आज वो एक मिसाल हैं आइकन हैं.

स्कूल ड्राप आउट, आत्महत्या की कोशिश कर चुकी, फेल्ड मैरिज, स्लम में जीवन गुजर करने वाली आज सातों आसमान पर है. कल्पना सरोज पद्म श्री की यही कहानी है. सलाम इस जिजीविषा को कभी खत्म न होने वाली अदम्य इच्छा शक्ति को.

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