ध्यान : जीवन को भयमुक्त करने का एकमात्र उपाय

जिन लोगों ने मेरे “जीवन पुनर्जन्म” लेख को पढ़ा है वे दो बातें जानते हैं. पहली इस लेख में मैंने एक आध्यात्मिक गुरु की बात लिखी है, जिनकी ध्यान विधि के कारण मैंने अपनी आमिष से निरामिष होने की यात्रा तय की. दूसरी, पिछले जन्म के किसी भय के कारण गुज़ारे अवसाद के दिनों में उनकी बताई हनुमान साधना के कारण मेरा भय कई हद तक कम हुआ.

आध्यात्मिक गुरु दिनेश कुमार जी के भय मुक्ति के लिए Fear नाम से दस दस मिनट के दस वीडियो हैं. उनके पहले वीडियो में कही गयी बात के कुछ अंश और यूट्यूब लिंक मैं यहाँ दे रही हूँ. ताकि उन लोगों को लाभ हो जो मेरे “जीवन पुनर्जन्म” लेख को पढ़ने के बाद भयमुक्ति के उपाय को विस्तार से जानना चाहते हैं.

पहला भाग सुनेंगे तो बाकी के वीडियो के लिंक्स भी क्रमवार आपको वहीं मिल जाएंगे. यूं तो पिछले जन्म की स्मृतियों के कारण हुए अवसाद के पहले भी मैंने यह वीडियो देखे और सुने थे. लेकिन वो केवल सुनना ही होकर रह गया था… वास्तविक रूप से जब इस भय से गुज़रना हुआ तो लगा जैसे ईश्वर ने एक मित्र को माध्यम बनाकर मुझे पहले ही दिनेश कुमारजी से परिचय करवा दिया था ताकि इस भय से गुजरने से पहले और उस दौरान इस भय के वास्तविक स्वरूप को समझ सकूं. उन दिनों मैंने उनसे व्यक्तिगत रूप से भी संपर्क किया और मार्गदर्शन लेती रही.

इस वीडियो में उन्होंने हनुमान साधना के अलावा सूर्य साधना और गायत्री मंत्र के जादुई प्रभावों के बारे में भी विस्तार से बताया है. एक बार अवश्य सुनिए FEAR.

[जीवन पुनर्जन्म-1 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए]

प्राचीन भारतीय मनीषा के अनुसार आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन चार प्रवृत्तियों को ईश्वर जीव के साथ उसके नैसर्गिक गुणों के साथ सजोकर ही भेजता है. प्राणी मात्र के लिए इनके बिना टिक पाना मुश्किल है, चाहे वो वनस्पति ही क्यों न हो क्योंकि प्राण तो इसमें भी होते हैं.

यूं तो ये साधारण वृत्तियाँ हैं लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जब मनुष्य की योनी में जीव पहुंचता है. उतोत्तर प्रगति करते हुए उसे सबसे पहले नर पशु के रूप में जन्म प्राप्त होता है…. दिखने में तो वो मनुष्य है … लेकिन वृत्तियों में पाशविक अर्थात पशु है…

इससे उन्नति करते हुए वो नर बनता है और नर से नारायण बन जाता है..

इन चार वृत्तियों के साथ जब वो पशु था तब उसके पास बहुत सीमित उपलब्धता और विकल्प थे.. कोई विकल्प नहीं था कि वो खुद पर कोई अंकुश लगा सके लेकिन जब वह नर बनता है तो विकल्प और इच्छाएं अनगिनत हो जाती हैं..

पशु के पास इंटेंशन और चॉइस नहीं होती वो बहुत इनोसेंट होते हैं, वे ये नहीं सोचता कि मुझे अमुक के साथ ऐसा व्यवहार करना है और तमुक के साथ वैसा व्यवहार करना है. लेकिन नर पशु बनता है उसकी इच्छाओं का विस्तार होता है क्योंकि उसका मैं और मेरा का विस्तार होता है… न केवल में भय में भी और बाकी की तो क्या बात करें… पशु के साथ संतान होने के बाद मैं मेरा ख़त्म हो जाता है… पक्षियों को एक सीमा तक बच्चे को पालना है लेकिन जैसे ही उसके पंख स्वायत्ता को प्राप्त होते हैं तो पक्षी से वो विच्छेद कर लेते हैं… बच्चे से आसक्ति छूट जाता है

लेकिन मनुष्य में ये मैं और मेरा का विस्तार इतना अधिक हो जाता है कि वो आसपास के सामान, परिजन, पहचान, और मेरी बात जैसी वस्तुओं के लिए हो जाता है… आत्मविस्तार के निम्न स्वरूप बहुत बड़ी परिधि पर आने लगते हैं… वो मेरा पेन, मेरा मोबाइल, मेरा बेटा, मेरा हेन्की, मेरा दोस्त, मेरा अकाउंट, मेरा बैंक अकाउंट, मेरा फेसबुक अकाउंट, मेरा ईमेल अकाउंट, मेरी सोच, मेरी योजना… मेरी सफलता और मेरी असफलता….. हो जाता है…
और साथ ही ये मेरी वस्तुएं खो जाने का भय भी आत्मा में गूंथने लगता है…
आहार गूंथे न गूंथे, निद्रा गूंथे न गूंथे लेकिन भय मनुष्य की समूची श्रेणी में व्याप्त हो जाता है…

[जीवन पुनर्जन्म-2 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए]

गीता में कहा गया है… भय का दूसरा नाम कुछ खोना है.. और जब कुछ खोने को बचता नहीं तो भय पलायन कर जाता है… भगत सिंह के पास खोने को कुछ बचा नहीं था लेकिन पाने को आकाश था इसलिए वो भयभीत नहीं था… यह अवस्था महायोगियों को प्राप्त होती है हम जैसे सामान्य मनुष्य को प्राप्त नहीं होती… वैराग्य की ये भावना तब आती है जब खोने के लिए कुछ नहीं बचता लेकिन कहना बहुत आसान है…

लेकिन भय के स्वरूप में कुछ सामान्य भय भी होते हैं जैसे चलते चलते गिर जाने का भय, एक्सीडेंट का भय, चोट लगने का भय…. लेकिन हम जिस भय की चर्चा कर रहे हैं जो सामान्य की सीमा को पार कर गया, जो मनुष्य के संस्कारों में आ गया है…

मनुष्य अपने अनेकों जन्मों की कुछ स्मृतियाँ साथ लेकर आया है… ऐसे में भय की स्मृतियाँ जब संस्कारों में घुल जाती है, तो पहचाना नहीं जाता लेकिन वो इतने गहरे में छुपा होता है कि इन भय की स्मृतियाँ अदृश्य रूप से आने वाले जीवन को दुष्प्रभावित करने लगती है… संस्कारों में छुपा भय पहचान में नहीं आता… मनुष्य के सतही मन को कुछ समझ नहीं आता मैं ऐसा क्यूँ कर जाता हूँ, ऐसा क्यों हो जाता है… लेकिन उसके अवचेतन में बैठा भय जो उसके संस्कारों से आया है उसके निर्णय लेने की क्षमता को दुष्प्रभावित करता है…

जब जब मनुष्य साधनात्मक जीवन में आता है ध्यान की गहराइयों में उतरता है… ध्यान की कक्षाओं में किसी भी विधि से ऊपर उठता है तो वह अपने भीतर की कुछ गहराइयां शुरू हो जाती है…. लेकिन ये खुद को करना होता है… कोई और आपको मार्ग दिखा सकता है लेकिन करना आपको खुद ही पड़ता है.

[जीवन पुनर्जन्म-3 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए]

– आध्यात्मिक गुरू दिनेश कुमार के लेक्चर FEAR – 1 से

VIDEO : आमिष से निरामिष होने की यात्रा

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