सनातनी इकनॉमिक मॉडल : PMO India के नाम एक खत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर बधाई. बहुत से लोग जिनको देश की सेवा के लिए कोई न कोई पद या किसी न किसी चुनाव के प्रत्याशी का टिकट चाहिए, उन्होंने शहर को मोदी जी के पोस्टर से पाट दिया होगा. लेकिन भारत निर्माण के लिए सेवा की भावना के साथ दृष्टि भी चाहिए. वरना सेवा तो कोल्हू का बैल भी करता है.

एक सुझाव है जिसको इसी रूप में या मॉडिफाइड रूप में लागू करने हेतु प्रधानमंत्री कार्यालय के पास भेज रहा हूँ. मित्रों से इस पर उनका विचार चाहूंगा.

प्रधानमंत्री जी आपको पता है कि चाहे कैपिटलिज़्म हो या फिर सोशलिज्म – दोनों का मूलमंत्र एक ही है – मास प्रॉडक्शन, और हमको यही एक मात्र मॉडल समझ में भी आता है. आपके एक कार्यकर्ता संजय पासवान जी ने सनातन मॉडल ऑफ इकॉनमी के बारे में रुचि प्रकट की थी.

वही आप अपने देश के आर्थिक इतिहास उठाकर देखिये, सनातन मॉडल ऑफ इकॉनमी का अर्थ है – Production By Masses. और यही भारत की गरीबी और बेरोजगारी उन्मूलन का एकमात्र विकल्प भी है.

1901 में छपी पुस्तक इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया – रोमेश दत्त की पुस्तक में मोटे तौर पर उस इकॉनमी का वर्णन है. क्या हम ये व्रत नहीं ले सकते कि हम विश्व को पुनः हस्त निर्मित वस्त्रों से ढँक देंगे?

हैमिलटन बुचनान ने 1800 से 1806 के बीच पूरे भारत के समाज और सनातन इकनॉमिक मॉडल के तत्कालीन स्वरूप का डेटा एकत्रित कर 1807 में 3 वॉल्यूम की एक पुस्तक में संकलित किया है.

1807 का यह डाटा बताता है कि 1807 तक सूत कातने का काम हर घर की, हर कास्ट की स्त्री करती थी. और कब? दोपहर बाद आराम के क्षणों में. और उससे प्रति स्त्री को सालाना 3 -7 रुपये की कमाई उस समय होती थी, जो उसकी पारिवारिक आय को बढाती थी, और साथ में उसको घर और समाज में सम्मान भी दिलवाती थी.

प्रत्येक जिले में उसके क्षेत्रफल के अनुसार 4500 – 6000 तक छोटे छोटे लूम होते थे, जिनको मात्र एक स्त्री और एक पुरुष मिलकर चलाते थे और 30 – 60 रुपये प्रति वर्ष की कमाई करते थे. जहां तक मुझे पता है आज एक जिले में इतने ही ग्राम समाज है, जितने लूमों की संख्या मैंने लिखी है.

चूंकि महामहिम राष्ट्रपति जी कोली/ कोरी बुनकर क्षत्रिय परिवार से आते हैं तो निश्चित तौर पर उनके भी पूर्वजों के अनुभव की जानकारी से इस पहल को एक दिशा देने में मदद मिलेगी.

क्या यह असंभव कार्य है कि सनातन के इस मॉडल को पुनर्जीवित किया जा सके. मेरा मानना है कि इस मॉडल का आधुनिकीकरण कर हर घर में पुनः स्पिनिंग शुरू कीजा सकती है. थोड़ा कष्टसाध्य और मुश्किल अवश्य लगता है, परंतु संभव है. क्या मनरेगा, जिसके तहत कच्चा काम किया जा रहा है, से इस योजना को जोड़कर घर-घर, गांव-गाँव स्पिनिंग नहीं शुरू की जा सकती?

शायद कपास की कमी की बात आए, तो हमें भूलना नहीं चाहिए कि अगर अंग्रेज़ इस देश से कच्चा कॉटन और सिल्क इम्पोर्ट कर, मैंचेस्टर से फ़ैक्टरी निर्मित कपड़ों से भारत को भर सकता था, तो हम भी ये काम कर सकते हैं. क्या हर गांव समाज में एक सोलर लूम से इन सूतो को वस्त्र निर्माण में नहीं लगाया जा सकता. MNREGA का शायद इससे अच्छा इस्तेमाल नहीं हो सकता.

एक बात और – आप जानते हैं कि भारत की कुल जीडीपी का 18% कृषि से, 18% सरकार से, मात्र 14% कॉर्पोरेट से आता है, बाकी 50% अभी भी स्वरोजगार से आता है. तो इस स्वरोजगार में वृद्धि कीजिये. निर्माण भी होगा, रोजगार भी बढ़ेगा, नारी का सशक्तिकरण भी होगा, और गाँवों से पलायन भी बंद होगा. गांव के लोग भी शहरों की मलिन बस्तियों में रहना बंद कर वापस गांव की ओर लौटने की बात सोचेंगे.

स्वच्छ भारत की ओर एक कदम बढ़ाएं… स्वरोजगार का सरकार का उद्देश्य बनाएं…

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