प्याज़ अटल को ले डूबा, तेल मोदी को ले जाये, ऐसी कामना करती जनता को सलाम

भारत में बहुत महान नेता हुए हैं. आज़ादी से पहले गाँधी थे, आज़ादी के बाद नेहरू महान प्रधानमंत्री बने. जिनकी महानता के गुण गाये जाते हैं. नेहरू आज़ादी के बाद गरीब, निर्धन देश को विकास के पथ पर लेकर चले. वो नहीं होते तो आज रोहिंग्या की जगह हम शरणार्थी होते.

मोदी जी तो दुष्ट आदमी हैं, बल्कि राक्षस हैं. तेल से कमा रहे हैं. आम आदमी का जीवन दूभर है. पूरे देश में चीख पुकार है. हो भी क्यों न, आखिर सूटबूट की सरकार जो है, अम्बानी अडानी की सरकार जो है.

अम्बानी अडानी बोले तो बड़े लोग, जैसे नेहरू-इंदिरा के ज़माने में टाटा-बिरला होते थे. बड़े उद्योगपति, बिजनेसमैन. सुना है अम्बानी अडानी के लाखो करोड़ के लोन माफ़ कर दिए मोदी जी की दुष्ट सरकार ने… सही है… आखिर बैंक से ये लोन मिलता कैसे है?

मैं बैंक से लोन मांगता हूँ तो वो सिक्योरिटी मांगता है. पूछता है कोई कोलेट्रल है गिरवी रखने को? कोई जमीन, फिक्स्ड डिपॉजिट, गहने, सोना, है कुछ?

नेहरू – इंदिरा – राजीव के ज़माने में लोन कैसे मिलता था? क्या टाटा बिरला इतने अमीर होते थे? नरसिम्हा राव जी, मनमोहन जी के ज़माने में बैंको ने जो लोन दिए, माल्या बैंको का पैसा लेकर फरार हो गया.

क्या इन बड़े बिजनेसमैन के पास लाखों करोड़ की संपत्ति थी? कोलेट्रल थे? सिक्योरिटी थी?… नहीं थी… फिर लोन कैसे मिलता था?

विजय माल्या को एविएशन का लाइसेंस मिला, बैंक ने उसे कोलेट्रल मानकर हजारों करोड़ का लोन पास कर दिया. यूनिटेक को 2G स्पेक्ट्रम का लाइसेंस मिला. उसे स्टेट बैंक ने कोलेट्रल माना 7000 करोड़ का लोन दिया. माइंस की लीज मिली, इसी बिहाफ पर लोन मिल गया. ऐसे ही चलता था लोन का सिलसिला.

लेकिन छोटे बिजनेसमैन, उनका क्या? सिक्योरिटी लाओ, गहने, ज़मीन के कागज़ लाओ. नहीं हैं तो भाग जाओ.

नेहरू – इंदिरा – राजीव – नरसिम्हा राव – देवेगौड़ा – गुजराल के दौर में यही स्थिति रही. वीपी सिंह ने 1990 में सिडबी की स्थापना की. लेकिन वो स्मॉल सेक्टर में कर्जे रिफाइनेंस कर रहा था.

फिर अटल जी आये. वही अटल जी, जो दुबारा नहीं आये. सोनिया जी को देश लेकर आया. अटल जी ने गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर पहली बार स्मॉल एवं मीडियम स्केल इंडस्ट्री के लिए कोलेट्रल फ्री क्रेडिट की व्यवस्था की.

एक क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर स्मॉल इंडस्ट्री बनाया. जो छोटे उद्योगों द्वारा बैंको से लोन लेने पर गारंटी देता था. अगर उद्योग डूबा तो लोन की वापसी जिम्मेदारी इस ट्रस्ट की होती थी. तमाम अन्य देशो में ये व्यवस्था दशकों से थी. भारत में अटल लाये, लेकिन वो दुबारा नहीं आ पाए.

इस फंड ने देश में स्माल स्केल इंडस्ट्री के उत्थान में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. आज इस स्कीम की वजह से सिडबी दुनिया के टॉप 30 स्मॉल सेक्टर बैंको में से एक है.

अगले दस साल में कांग्रेस ने लोन की गारंटी राशि को पच्चीस लाख से बढाकर 1 करोड़ किया. लेकिन अगला सुधार फिर मोदी सरकार ही लेकर आयी. लोन की गारंटी राशि एक करोड़ से बढाकर 2 करोड़ की.

अब तक सिर्फ बैंक की ऐसा लोन दे सकते थे लेकिन मोदी सरकार ने बैंको के अलावा NBFC एवं अन्य फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को इसमें शामिल किया. लेकिन मोदी सरकार ने सबसे बड़ा सुधार ये किया कि उसने एक नेशनल क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन की स्थापना की. जिसके तहत पांच विभिन्न योजनाएं शुरू की गयी. जिनमें से एक स्टैंड अप इंडिया योजना है.

लेकिन क्या सिर्फ उद्यमियों को ही लोन की जरूरत पड़ती है? तमाम पेशेवर लोग हैं, मामूली बढ़ई, प्लम्बर, ऑटो वाला, छोटे दुकानदार. जिन्हे पचास हजार, एक-दो लाख रूपए का लोन मिल जाये तो वो अपने काम में बेहद तरक्की कर सकते हैं. लेकिन उनके पास भी सिक्योरिटी या कोलेट्रल, जमीन जायदाद, गहने कहाँ.

आज तक इन्हे फंडिंग करने वाला इनफॉर्मल लोन सेक्टर था. प्राइवेट लेंडिंग. जो 24% से 36% तक ब्याज वसूलता था. मोदी सरकार ऐसे वर्ग के लिए MUDRA योजना लाई. आज ये मोदी सरकार की शान है. करोड़ों लोगों ने इस योजना से लाभ उठाया है.

गरीबी हटाओ वाली इंदिरा सरकार गरीब हटाती रही. राजीव कंप्यूटर लाकर अमर हो गए, गोया वो नहीं होते देश में कंप्यूटर क्रांति न आती. नेहरू सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) स्थापित करते रहे. और अमर हो गए.

मोदी जी अम्बानी अडानी के नाम पर बदनाम रहे. सूटबूट की सरकार. आज जनता में आग लगी है. डीजल पेट्रोल के दाम बढ़ गए. मोदी सरकार का आकलन तेल के दामों से होता है.

राहुल सत्ता में आये तो फिर आश्चर्य कैसा. हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, तेल, प्याज़, चीनी, टमाटर के बढ़े दाम नहीं. प्याज़ अटल को ले डूबा, तेल मोदी सरकार को ले जाये, ऐसी कामना करती जनता को सलाम.

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