डॉक्टर साहब को फुरसत मिलेगी तो इधर भी देखेंगे, आज नहीं तो शायद 2019 के बाद देखेंगे

मैंने भारत में कुल चौदह वर्ष डॉक्टरी की है… अभी सात वर्षों से इंग्लैंड में काम कर रहा हूँ. भारत में पूरी मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेज़ी में ही होती है, मूलतः इंग्लैंड की किताबें हमारे मेडिकल सिलेबस की रीढ़ हैं. फिर भी इंग्लैंड की स्वास्थ्य सेवाओं में और भारत की सुविधाओं में दिन रात का अंतर है.

नहीं, यह अंतर सिर्फ संसाधनों का अंतर नहीं है. यह सरकारी और प्राइवेट व्यवस्थाओं का अंतर भी नहीं है. दोनों जगह स्वास्थ्य सेवाओं की फिलोसॉफी में मूलभूत अंतर है, जो दोनों सभ्यताओं के बीच का मूल मनोवैज्ञानिक अंतर है.

यहाँ एक मरीज जब डॉक्टर को दिखाने आता है, तो हमें उससे लगभग एक कस्टमर जैसा व्यवहार करना होता है. उसे खुद से इज्जत से बुला कर लाते हैं, उसके लिए दरवाजा खोलते हैं, उसे कुर्सी खींच कर देते हैं… चाहे मरीज की सामाजिक आर्थिक अवस्था कुछ भी हो… चाहे वह अफगानिस्तान का मीट काटने वाला रिफ्यूजी हो या ट्यूब स्टेशन के बाहर रात गुजारने वाला नशेड़ी होमलेस बंदा हो… सब को सर-सर ही बोलना है..

लेकिन यहाँ मरीज को डॉक्टरी सलाह के प्रति काफी श्रद्धा भी है. वे सलाह मानते हैं, हालांकि अक्सर गूगल पर चेक भी करते हैं, पर डॉक्टर की सलाह को ज्यादा वजन देते हैं. पर सवाल भी खूब करते हैं. एक-एक विषय पर पूछते हैं… क्या डायग्नोसिस है, दवा किस चीज की है, क्या साइड इफ़ेक्ट हैं… और इन सवालों का मरीज के शैक्षिक स्तर से संबंध नहीं है… हर कोई अपनी बीमारी के बारे में, इलाज के बारे में जानकारी रखता है. डॉक्टर भी धैर्य से हर सवाल का जवाब देते हैं.

भारत में मरीज तीन डॉक्टरों से दिखाता है, फिर दवाई दुकान वाले से, पड़ोस के वर्मा जी से जो हिस्ट्री में डॉक्टरेट हैं, बरेली वाले फूफाजी के भाई से जो ग्लैक्सो में एमआर हैं… सबसे सलाह लेता है… फिर भी अपनी बीमारी, सही डायग्नोसिस और प्रोग्नोसिस के बारे में कुछ नहीं जानता…

दवाई से एलर्जी भी हो जाये तो वह डॉक्टर की गलती है… कितना कड़ा दवाई दे दिया… रिएक्शन हो गया… आज डॉक्टर साहब दूसरा भगवान थे… सुबह होते-होते कसाई घोषित हो जाते हैं… कार का शीशा तोड़ना से लेकर नर्सिंग होम में आग लगाना, सब हो जाता है…

डॉक्टर साहब भी इसी समाज की उपज हैं ना… उन्होंने सीधे मुँह बात करना नहीं सीखा है… ये दवाई लीजिये और जाइये… क्या बीमारी है?… जैसे हम बता देंगे तो आप समझ ही जाइयेगा…

नहीं, सिर्फ समय की कमी नहीं है… समय की कमी मात्र कारण होता तो जवाब में सिर्फ एक मुस्कुराहट ही काफी थी. समस्या है डॉक्टर साहब की यह अकड़ कि हमने छह साल अंग्रेज़ी किताबें घोंट-घोंट कर डॉक्टरी सीखी है… आपसे आपकी भाषा में कैसे बात कर लें.

यह संस्कार हमारे पूरे सामाजिक जीवन में दिखाई देते हैं. हर व्यक्ति का कद उसका पद इतना बड़ा है. सरकार से अपेक्षाएँ हों, या सरकार का उन अपेक्षाओं को मैनेज करने का तरीका… सबमें भारतीय मानस की घोर तर्कहीनता हावी है.

हमने सरकार से अपनी अपेक्षाएँ व्यक्त करने के चैनल नहीं बनाए हैं… हममें से या तो मूढ़ आपिये निकलेंगे, या भगत सूरदास… या तो सरकार को गालियाँ ही बकते रहेंगे, या बस नमो मन्त्र जपते रहेंगे.

हर कमजोरी, नाकामी, रीढ़विहीनता को किसी गूढ़ कूटनीति के नाम पर महिमामंडित करते रहेंगे… पर खुल कर यह कहने में कि हमारी अपेक्षाएँ क्या हैं… कहाँ पूरी नहीं हो रही, कैसे पूरी हों… डर लगता है डॉक्टर साहब नाराज हो जाएंगे… तुनक कर अपना आला पटक कर हिमालय निकल जाएँगे… तो दिखा लो किसी और डॉक्टर से… मेरे पास पेशेंट की कमी नहीं है…वो देखो कितने लाइन में लगे हैं…

ज़फर साहब पकड़ पकड़ के पेशेंट ला रहे हैं… मौलाना जी वेटिंग रूम में बैठे हैं… तीन तलाक़ का आपरेशन करना है… पिंटो जी का अपॉइंटमेंट है, अफगानिस्तान से पादरी को बचा कर लाना है… आपको नहीं पसंद है इलाज तो किसी और के पास जाइये… और याद रखिये, डॉक्टर का कोई धर्म नहीं होता… मरीज की सेवा ही डॉक्टर का धर्म है…

और हम गरीब गुरबा हाथ जोड़ देते हैं… नहीं डॉक्टर साहब, आप ही भगवान हैं… आपके जितना बड़का डिग्रीधारी कौन है… आपका दवाई बहुत फायदा किया है… रोज घुटना में लगा रहे हैं… पर आपको बस यही बोलना चाह रहे थे कि आये थे साँस की तकलीफ ले के… वो बढ़ती जा रहा है… पर कोई बात नहीं…

डॉक्टर साहब बड़का डॉक्टर हो गए हैं… 18 घंटा काम कर रहे हैं… खूब भारी प्रैक्टिस है… उनका गेट पे तो टैम्पू स्टैन्ड ही बन गया है… गोलगप्पा और पूरी छोला वाला भी ठेला लगा लिया है… एक हाथ भर का तो डिग्री है डॉक्टर साहब का… पिछला डॉक्टरवा गलत दवाई दे दिया… बचवा बीमार है… डॉक्टर साहब को फुरसत मिलेगा तो इधर भी देखेंगे.. आज शायद नहीं तो बिहान बेला देखेंगे… 2019 के बाद देखेंगे…

बस, एक ही डर है… मरीज मर गया ना तो कल डॉक्टर को कसाई बोलने से, क्लिनिक में आग लगाने से और कार का शीशा तोड़ने से भी कोई फायदा नहीं होगा… डॉक्टर साहब से जो बोलना है, आज ही बोलिये… और हाँ, हमको पता है इस गाँव में दूसरा कोई डॉक्टर नहीं है…

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