जा रहे हैं क़र्ज़ लेकर विदेशियों की शर्तों पर सरकार चलाने वाले दिन

यदि कोई व्यक्ति क़र्ज़ में हो और उसकी कमाई भी दिनों दिन इस क़दर गिरती जाए कि क़र्ज़ चुकाने की अवस्था में न हो और एक क़र्ज़ चुकाने के लिए भी दूसरा क़र्ज़ लेना पड़े तो ऐसा व्यक्ति को दिवालिया कहते हैं. ऐसा व्यक्ति कभी स्वाभिमान के साथ जीवन नहीं जी पाता. पग पग पे अपमान पाता है, दूसरे के शर्तों पे जीवन जीता है, उसका जीना या मरना एक बराबर है.

जो हाल व्यक्ति का होता है वही किसी देश का भी होता है. एक क़र्ज़दार देश जिसकी सरकार भी विदेशों से क़र्ज़ लेकर चलने लगे, ऐसे देश की भी वही दशा होती है जो उपरोक्त कथन अनुसार एक दिवालिया व्यक्ति की होती है.

UPA-1 और UPA-2 के काल में शनैः शनैः देश की अर्थव्यवस्था की वो हालत हुई थी कि फ़िस्कल डेफ़िसिट 7.8% तक जा पहुँचा था. आज वो वापस 3.5% पे आ चुका है और इसी रेट से जल्द ही ये डेफिसिट शून्य होगा.

फ़िस्कल डेफिसिट माने किसी वर्ष में सरकारी कोष में जमा कुल राजस्व एवं सरकार द्वारा किया गए कुल ख़र्च का अंतर GDP के कितना प्रतिशत है, वही फ़िस्कल डेफिसिट है. यहाँ 3.5% फ़िस्कल डेफिसिट माने 3.5% of GDP जो लगभग 5 लाख करोड़ रुपया के बराबर होगा.

यदि मान लें किसी वर्ष में 20 लाख करोड़ का बजट बना तो अब वसूल राजस्व में से इसमें केवल 5 लाख करोड़ कम पड़ रहे हैं, पहले यही 10-11 लाख करोड़ तक कम पड़ता था. माने अब भारत स्वावलम्बन की दिशा में आगे बढ़ रहा है. क़र्ज़ लेकर विदेशियों के शर्तों पे सरकार चलाने वाले दिन जा रहे हैं.

GST आने के बाद दुनिया ने जान लिया है कि भारत का टैक्सेशन जिसे अभी तक दीमक लगा हुआ था, अब ओवरहॉल हो चुका है, उसे ज़्यादा दिन घुटने के बल नहीं रखा जा सकता. उसकी मिलिटरी पावर, ज़रूरी इंफ़्रास्ट्रक्चर आदि सब सुदृढ़ हो रहे हैं. देश का क़द दुनिया में बढ़ा है.

अब ये सुदृढ़ीकरण मोदी अकेले तो कर नहीं रहे होंगे, मोदी कोई भगवान नहीं हैं. उन्होंने जनता द्वारा बलपूर्वक, चाहे अनचाहे ये सब करवाया है. नोटबंदी करके, GST लगा के, बेनामी क़ानून ला के, स्विस बैंकों से सूचना साँझे की संधि करके, कच्चे तेलों के दाम कम आने के बावजूद टैक्स बढ़ाकर उसे उसी जगह रखकर आदि आदि. इसीलिए मोदी का नहीं तो भगवान का शुक्रिया कीजिए कि कच्चे तेल के दाम कम आए और आपको बिना एक्स्ट्रा कष्ट दिए ये निपट गया. इसका स्वागत होना चाहिए.

फिर भी मान लीजिए टैक्स घटाकर तेल के दाम कम कर दिए जाएँ तो क्या होगा. पहले तो उसकी खपत बढ़ेगी. उसे लेने को विदेशी मुद्रा माने डॉलर लगेगी, forex रिज़र्व (विदेशी मुद्रा भण्डार) घटने लगेगा जो अभी बढ़ रहा है, सरकार को विदेशों से क़र्ज़ लेना होगा. दूसरे राजस्व भी कम होगा, फ़िस्कल डेफिसिट बना रहेगा. यानी देश की अर्थव्यवस्था जिस तेज़ी के आत्मनिर्भर हो रही है, वो नहीं रहेगी.

यदि तेल के दाम कम लाएँ जाएँ तब अभी हमें तो अच्छा लगेगा, प्रदूषण ज़्यादा करेंगे या शायद कुछ पैसे भी बचेंगे लेकिन देश का भट्टा बैठेगा और उसकी भरपाई भी हमें ही एक न एक दिन अप्रत्यक्ष रूप से करनी ही होगी. इधर से नहीं तो उधर से सही. बचाव का कोई रास्ता नहीं है. बड़े लोग कह गए हैं ये दुनिया ईश्वर के नियम से चलती है, किसी की मनमानी से नहीं. जो आप को अच्छा लगे ज़रूरी नहीं वो आपके लिए अच्छा ही हो. अपने करनी की पूरी भरपाई करनी होती है.

अब जो लोग इससे होने वाली पीड़ा की तुलना कांग्रेस काल से कर रहे हैं वो जान लें कि पीड़ा नहीं बल्कि हमारे पुराने पापों का प्रायश्चित है. तब की पीड़ा कांग्रेसी नेताओं के स्विस बैंक अकाउंट भरती थी, अभी की पीड़ा राजकोष भर कर देश को अपने पैरों पे खड़ा कर रही है. दोनों एक नहीं है, दोनों में अंतर है लेकिन ये सिर्फ़ उन्हें ही दिखेगा जिनके लिए स्वाभिमान की भी कोई क़ीमत होती है. जिनके लिए राष्ट्र गौरव के मायने हैं. जो लोग घास की रोटी खाके शान से जीने में यक़ीन रखते हैं, ये सिर्फ़ उन्हें दिखेगा.

अश्विनी कुमार वर्मा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY