सरोज की आत्मा और माधुरी की देह : नृत्य का सम्पूर्ण रसायन शास्त्र

madhuri saroj khan ma jivan shaifaly

सिनेमा के रजत पट पर नायक नायिका के प्रेम से निकलती रजत कणिकाएं जब दर्शकों की आँखों में चमकती हैं तो उसका प्रभाव सीधे उनके ह्रदय की धड़कनों को प्रभावित करती हैं. तब हम कहते हैं इस नायक और नायिका का प्रेम रसायन (Love Chemistry) बहुत अच्छा है.

लेकिन मुझे लगता है यह केमिस्ट्री सिर्फ नायक नायिका के बीच ही नहीं होती, बल्कि उन दो व्यक्ति के बीच भी होती है जिनकी आत्मा में एक ही तरह का रसायन दौड़ रहा हो. ऐसी ही एक जोड़ी है सरोज खान और माधुरी दीक्षित की. मैं जब भी माधुरी का नृत्य देखती हूँ तो लगता है माधुरी के नृत्य को सरोज का साथ ना मिलता तो माधुरी का माधुर्य दर्शकों के ह्रदय में वो जादू उत्पन्न नहीं कर सकता था, जिस जादू ने हज़ारों दर्शकों के ह्रदय की शिराओं तक को नृत्य करवा दिया.

फिर चाहे वो तेजाब का “एक दो तीन चार” जैसा मस्ती भरा गीत हो, अंजाम का “चने के खेत में” जैसा सतही गीत हो, सैलाब का “हमको आज कल है इंतज़ार” जैसा कामुक या आजा नाच ले का “ओ रे पिया” जैसा शास्त्रीय नृत्य हो.

माधुरी की देह को नृत्य करते हुए देखना मेरे लिए सरोज की आत्मा को नृत्य करते हुए देखने जैसा है. उसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण है, अपनी थुलथुली देह के साथ सरोज अपने नृत्य में वो बात नहीं ला पाती जो उसकी आत्मा से निकलता है, लेकिन जब माधुरी उन भावभंगिमा को अपनी देह में उतारती है तो लगता है जैसे सरोज की अंतरआत्मा माधुरी की देह में प्रवेश कर गयी हो. और उसके बाद पूरे संगीत और साज सज्जा के साथ जो कुछ भी परदे पर प्रकट होता था उसे मैं शुद्ध नृत्य कहूंगी. फिर चाहे उसमें शास्त्रीय नृत्य की मुद्राएं ना हो लेकिन अपने कामदेव को आह्वान देती देवी रति की काम मुद्राएं सीधे स्वर्ग के दर्शन करवाती हैं.

माधुरी के एक एक अंग की लहरियों के साथ चेहरे की मादक मुस्कान और सरोज के नृत्य का रसायन शास्त्र देखना हो तो यह गीत अवश्य देखिये.

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