अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च

रोहिंग्याओं को लेकर भारत के सेकुलर और मानवाधिकार के समर्थक जोर शोर से इस मामले को मानवीय नजरिये से देखने और उसको हल करने की बात कर रहे हैं. रोहिग्याओं को भारत में शरण देने के साथ नागरिकता देने की भी वकालात की जा रहीं है.

बौद्ध धर्म और उसके अनुयायी पूरी_दुनिया में अपनी “शांतिप्रियता” और “अहिंसा” के लिये सुविख्यात है. दलाई लामा और उनके अनुयायियों ने तिब्बत मे जबर्दस्त दमन और अत्याचारों के बाद भी चीन के विरूद्ध आज तक हथियार नहीं उठाये न किसी प्रकार का हिसंक संघर्ष हुआ. म्यांमार भी एक बौद्ध बहुल देश है. और यहाँ के बौद्ध भी उतने ही शांतिप्रिय हैं जितने कि तिब्बत के हैं, पर यहाँ ऐसा क्या हुआ कि बुद्ध के अनुयायियों को हथियार उठाने पड़े.

रोहिंग्या वर्तमान बांग्लादेश के मूल निवासी हैं जो 1400 ईस्वी के लगभग बर्मा में बस गए थे. रोहिंग्या उनकी जाति है और ये बांग्ला भाषा बोलते हैं. म्यांमार के बौद्ध जितने उदार, शिक्षित और सहिष्णु हैं रोहिंग्या समुदाय उतना ही अनपढ़, पिछड़ा, धर्मिक रूप से कट्टरपंथी और आदतन अपराधी हैं.

यद्यपि म्यांमार में इन दोनों समुदायों का संघर्ष बहुत पुराना है पर 3 साल पहले म्यांमार के राखिन प्रांत में अनेक बौद्ध महिलाओं, लड़कियों, नाबालिग छात्राओं के साथ लगातार बलात्कार और हिंसा से पूरा प्रान्त दहल गया. रोहिंग्याओं ने यहां भी “लव जिहाद” चलाकर अनेक बौद्ध लड़कियों और कई बार तो विवाहित महिलाओं तक से शादी कर डाली. जब शांतिप्रिय बौद्धों ने इसका विरोध किया तो उनकी हत्या कर दी गयी. कई बौद्ध किसान, नागरिक और नवयुवक अज्ञात कारणों के चलते प्रांत के विभिन्न हिस्सो में मृत पाये गये. जब मामले की जांच की गयी तो इस सारी हिंसा आगजनी के पीछे इन्ही रोहिंग्याओं का हाथ पाया गया.

तब बौद्ध भिक्षु विराथु ने इसके विरूद्ध शक्तिशाली आंदोलन खड़ा किया, रोहिंग्याओं का सबसे पहले आर्थिक बहिष्कार किया गया जिसे 969 का नाम दिया गया. जब रोहिंग्या आतंकियो ने सशस्त्र आतंकी हमले किये तो बौद्धों ने भी हथियार उठा लिये, खूनी संघर्ष में अनेक बौद्ध मठ मन्दिर नष्ट हो गए और हजारों नागरिक मारे गये पर रोहिंग्या आतंकियो का दमन कर दिया गया. साथ ही यह पता लगाया कि जिन क्षेत्रों में रोहिंग्याओं की जनसंख्या 20% से अधिक है वहीं इस तरह की आंतकी वारदातें घट रही हैं. इसलिये रोहिंग्याओं के लिए परिवार नियोजन अनिवार्य कर 2 से अधिक सन्तान पैदा करने पर रोक लगा दी गयी जबकि बौद्धों और अन्य सम्प्रदायों को इससे मुक्त रखा.

बावजूद रोहिंग्याओं की हरकतों में कोई कमी नहीं आई तब बौद्धों ने सरकार पर दबाव डालकर इनके विरूद्ध सैनिक कार्यवाई करने का आदेश पारित करवाया. म्यांमार की इस कार्यवाई के बाद रोहिंग्या आतंकियो में भगदड़ मच गयी और इन्होंने बांग्लादेश, भारत में शरण ली जबकि थाईलेंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और दुनिया के अनेक मुस्लिम बहुल देशों ने इनको शरण देने से साफ इंकार कर दिया. कारण वही इनका आपराधिक इतिहास जिसे देखकर हर कोई इनको अपने यहां नहीं आने देना चाहता.

बांग्लादेश भी इनको अपने देश के बजाय किसी निर्जन द्वीप पर बसाने का विचार कर रहा है जबकि हमारे देश के सेकुलर और मानवाधिकार कार्यकर्ता और संगठन इनको आम नागरिकों के साथ पूरे देश में बसाने की योजना बना रहें हैं मानवाधिकारों की दुहाई देकर. यदि रोहिंग्या शरणार्थियों में मानवीय गुण या सहिष्णुता होती तो क्या बुद्ध की करुणा से भरा हुआ राष्ट्र म्यांमार (बर्मा) इनको अपने देश से निकालता?

जो समुदाय अपने देश और जन्मभूमि का नहीं हुआ वो भारत के प्रति कितना वफादार होगा. इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं. यदि इनको भारत में बसाया गया तो लंदन में अभी हाल ही में हुए धमाके जैसी आतंकी वारदातों को झेलने के हमें खुद को अभी से तैयार कर लेना चाहिए.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY