कौन हैं वो गरीब जो बच्चों को भूखे मरने के ही लिए पैदा कर रहे हैं?

माँ-बाप जब बेटी के लिए वर ढूंढते हैं तो केवल एक नर नहीं ढूंढते. उसकी अर्थोपार्जन की क्षमताएँ भी देखी जाती हैं ताकि वो पत्नी और आगे उत्पन्न होने वाली संतानों का भी ठीक तरह से पालन पोषण कर सके. बाकी भी कई सारी चीजें देखी जाती ही हैं लेकिन वर की कमाई हमेशा महत्व रखती है.

गरीब व्यक्ति भी यही चाहते है अपनी बेटी के लिए. माँ-बाप वे भी होते हैं. कुछ भावनाएँ सब की एक ही होती हैं. पति-पत्नी भी बच्चों की संख्या पर सोचते हैं कि कितनों का वे सही ढंग से पालन पोषण कर पाएंगे. या इस इस वाक्य में सुधार करते हुए यूं कहना चाहिए कि केवल हिन्दू, जैन, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, पारसी आदि आम तौर पर ऐसा सोचते हैं?

अब एक सवाल आता है. जब भी सरकार कोई महत्वाकांक्षी योजना प्रस्तुत करती है तो विलाप शुरू हो जाता है – यहाँ गरीबों के बच्चे भूखे मर रहे हैं… ज़रा ऐसे गरीबों की तरफ पैनी नजर से देखा जाये. ये कौन से गरीब हैं जो बच्चों को भूखे मरने के ही लिए पैदा कर रहे हैं? क्या वे बच्चों का भला सोच नहीं सकते या बच्चों को भूखे ही मरने के लिए पैदा करने के पीछे और कोई प्रेरणाएँ हैं?

अगर प्रेरणाएँ हैं तो उनकी जानकारी और उन प्रेरणाओं के बाकी समाज पर पड़ने वाले परिणाम की जानकारी होना भी जरूरी हो जाता है. क्योंकि विपन्नता विवेक हर लेती है और विवेकहीन व्यक्ति को क़ानून का डर नहीं रहता. वो गुनाह की राह पर भी चल देता है.

अगर आर्थिक क्षमता का विचार न करके जो बच्चे पैदा किए जाता है, वो पहले उन बच्चों की माँ के साथ जुल्म करता है क्योंकि स्वस्थ आहार न मिलने से स्त्री का स्वास्थ्य खराब हो जाता है. गर्भ उसके शरीर से ही पोषण पाता है इसके कारण भी उसका स्वास्थ्य और बिगड़ते जाता है.

ऎसी स्थिति में वह प्रसूति के पहले ही मर भी सकती है. यह हुआ तो पहले जो बच्चे पैदा किए हैं उन निरपराध बच्चों को सौतेली माँ को झेलना पड़ेगा. पुरुष के नाम एक और महत्पाप, अपने बच्चों के ही शाप. कौन सा ईश्वर इसे पाप नहीं मानता?

कुपोषण और अशिक्षा के कारण बच्चे गुनाह में संलिप्त हुए तो उन्हें सज़ा भी मिलेगी, जल्दी मारे भी जा सकते हैं. क्या बाप इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं जो पालन क्षमता से अधिक बच्चे पैदा किए जा रहा है?

वैसे यह केवल ऐसे बापों का या उसके समाज का अंदरूनी मामला नहीं रह जाता, पूरे देश की चिंता भी बन जाती है. क्योंकि विपन्नता से विवेकहीन हुए ऐसे बच्चों की बढ़ती संख्या बाकी समाजों के लिए संकट बनती है. अतएव सरकार का भी यह दायित्व हो जाता है कि ऐसे गरीब इतने बच्चे तो पैदा न करें कि वे भूखे मरें.

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