क्या हमारी हिंदी इतनी काबिल है?

कुछ दिन पहले एक मित्र ने द हिन्दू में छपी एक खबर का लिंक भेजा और निवेदन किया कि कृपया इसे हिंदी में अनुवाद करें. द हिन्दू में प्रकाशित लेख का शीर्षक इस प्रकार है “Trio of high energy telescopes spots slowest known magnetar.” दरअसल नासा के तीन टेलिस्कोप ने एक ऐसे ‘मैग्नेटार’ का पता लगाया है जो अपने तरह के ज्ञात मैग्नेटारों में सबसे धीमी गति से अपनी धुरी पर नाच रहा है यानि इसकी स्पिन करने की गति बहुत धीमी है. मैग्नेटार का अर्थ है मैग्नेटिक (चुम्बकीय) व्यवहार दर्शाने वाला न्यूट्रॉन स्टार. जब कोई तारा अपनी मृत्यु के बाद ब्लैक होल नहीं बनता तो सुपरनोवा विस्फोट के साथ ही बेहद कम व्यास वाले किंतु घने न्यूट्रॉनों के एक पिंड में बदल जाता है जिसे न्यूट्रॉन स्टार कहते हैं. यह तो हुई विज्ञान की बात. परन्तु इसे समझाने में जितने अंग्रेजी शब्दों का सहारा लिया गया है उसे देख कर यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने हिंदी में अनुवाद किया है.

मैं जब भी विज्ञान पर कुछ लिखता हूँ तो आदर्श पत्रकारिता का एक साधारण नियम मान कर चलता हूँ कि पहले पाठक को शिक्षित करें, फिर सूचना दें, उसके बाद यदि जरूरत हो तो मनोरंजन करें. विज्ञान के नाम पर फंतासी लिखना मेरा स्वभाव नहीं. एक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हम हर चीज का सरलीकृत स्वरूप ग्रहण करना चाहते हैं जबकि वस्तुस्थिति यह है कि विज्ञान के हर विषय को सरल भाषा में नहीं समझाया जा सकता. विज्ञान के बारे में आइंस्टीन ने कहा कि किसी चीज को आसान बनाया जा सकता है लेकिन और ज्यादा आसान नहीं बनाया जा सकता, “You can make things simple but not simpler.”

अब प्रश्न उठता है कि सरल भाषा का अर्थ क्या है. क्या सरल भाषा वह है जिसमें हम सोचते हैं या वह जिसे हम लिख और बोल सकते हैं? TV18 शुरू करने वाले राघव बहल मीडिया की एक बड़ी हस्ती हैं. एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि बिज़नेस की खबरों का हिंदी चैनल ‘CNBC आवाज़’ उन्होंने इसलिए शुरू किया था क्योंकि उसके लक्षित दर्शकों में केवल हिंदी भाषी ही नहीं थे अपितु अंग्रेजी पढ़ने वाले लोग भी थे. कारण यह है कि ज्यादातर लोग जो अंग्रेजी में पढ़ते हैं वो घरेलू बातचीत हिंदी में या अपनी क्षेत्रीय भाषा में करते हैं. अतः अपनी भाषा में ऑडियो विज़ुअल का प्रभाव दर्शक पर कहीं ज्यादा पड़ता है. इसके बावजूद हिंदी का प्रभाव क्षेत्र, विज्ञान और तकनीक में नगण्य है. जब कभी विज्ञान को ‘सरल’ बनाने की बात उठती है तो यह विषय गौण हो जाता है कि विज्ञान का अमुक सिद्धांत समझने में कठिन है अथवा सरल. राष्ट्रीय अस्मिता को लेकर हिंदी बनाम अंग्रेजी का द्वन्द्व आरम्भ हो जाता है.

इसे वृहद् परिप्रेक्ष्य में देखें तो पता चलेगा कि इस देश में विज्ञान का नैरेटिव बड़ा ही विचित्र है. विदेशों में जिसे पॉपुलर साइंस कहा जाता है उसका अर्थ हमने गलत समझ लिया है. कोई चीज लोकप्रिय तब होगी जब उसे आमजन की दिनचर्या से जोड़ा जायेगा. हमें ‘लोकप्रिय विज्ञान’ की अवधारणा से आगे जा कर ‘लोक संस्कृति में विज्ञान’ को बढ़ावा देना होगा. एक बार मैंने विज्ञान की एक लोकप्रिय वेबसाइट पर देखा तो वहाँ wavelength का अनुवाद ‘तरंग लम्बाई’ लिखा था जबकि स्कूल की भौतिकी की किताबों में तरंगदैर्घ्य होता है. यहाँ एक और समस्या खड़ी हो जाती है. अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों का अक्षरशः हिंदी अनुवाद ज्यादातर हिंदी भाषी विद्यार्थियों को ही समझ में नहीं आता. ताजा उदाहरण सिविल सेवा परीक्षा का है जहाँ प्रश्नों के ऐसे विचित्र अनुवाद कर दिए गए कि प्रतियोगियों के पल्ले कुछ नहीं पड़ा. उनके मन में यही था कि इससे तो अच्छा होता कि स्पोकन इंग्लिश की क्लास कर ली होती.

लॉर्ड मेल्विन ब्रैग अपनी किताब Adventure of English में लिखते हैं कि माना जाता है कि भारत में अंग्रेजी बोलने वाला पहला व्यक्ति अल्फ्रेड द ग्रेट के दरबार से 882 ईस्वी में आया था. सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में जब यूरोपीय व्यापारी भारत आने लगे तो उन्होंने यहाँ की फ़ारसी और उस जमाने की क्षेत्रीय भाषाएँ सीखीं ताकि व्यवसाय करने में सुविधा हो. हमारे अंग्रेजी सीखने से पहले अंग्रेजों ने हिंदी सीखी थी तब भी आज हिंदी की दुर्दशा का क्या कारण है यह शोचनीय है. कहा जा सकता है कि भारत ने हिंदी और अंग्रेजी को लगभग एक ही समय अपनाया. सिनेमा, अखबार और टीवी ने गाहे बगाहे हिंदी के प्रसार में जितना योगदान दिया है उतना भाषा विज्ञानियों ने या अकादमिक जगत के विद्वानों ने नहीं किया. भारत सरकार का एक विभाग तकनीकी शब्दावली का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर वेबसाइट पर डालता है. कोरम पूरा करने के लिए राजभाषा अधिकारियों की नियुक्ति भी की जाती है. परन्तु हिंदी का जितना प्रसार हुआ उतना विकास नहीं हुआ. इसका प्रमुख कारण है तकनीकी शिक्षा में हिंदी के प्रति हमारा सतत दुराव.

इसे लेख के आरंभ में दिए गए उदाहरण से समझें. जिन तीन टेलिस्कोप ने सबसे धीमी गति से स्पिन करने वाले मैग्नेटार खोजे उसमें से एक है चन्द्रा टेलिस्कोप. इसका नाम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रो० सुब्रमण्यम चन्द्रशेखर के नाम पर रखा गया है. जब किसी तारे का द्रव्यमान एक निश्चित मान से ज्यादा होता है तब वह ब्लैक होल या न्यूट्रॉन स्टार बन सकता है अन्यथा नहीं. इसे चन्द्रशेखर लिमिट कहा जाता है. चन्द्रशेखर ने लगभग 600 से अधिक पृष्ठ की एक पुस्तक लिखी थी: The Mathematical Theory of Black Holes. इस पुस्तक में क्लिष्ट गणितीय समीकरण हैं जो किसी भी सूरत में हिंदी में अनुवादित नहीं किये जा सकते. उच्च गणित की इस पुस्तक को पढ़ने समझने के लिए अंग्रेजी अनिवार्य है जिसकी शुरुआत कक्षा ग्यारह में पढ़ाये जाने वाले ‘scalar vector addition’ से होती है.

इसी तरह भाषा विज्ञान में एक चीज होती है ‘inflection’. जब कोई शब्द अपना स्वरूप इस तरह बदलता है कि उसका काल वचन इत्यादि बदल जाये तब उसे इन्फ्लेक्शन कहते हैं. यथा: -ed लगने से ‘talk’ शब्द भूतकाल में परिवर्तित हो जाता है; ‘mango’ में -es लग जाने पर बहुवचन हो जाता है. आशय यह है कि यदि अंग्रेजी के बहुतेरे शब्द तकनीकी हिंदी शब्दावली में समाहित कर लिए जाएँ तो उनके मूल स्वरूप का इन्फ्लेक्शन क्या होगा यह सोचना भी बेवकूफी है. मुझे दैनिक जागरण में ‘साइंटिस्टों’ शब्द पढ़ कर हँसी आती है. भगवान सिंह जी अपने एक लेख में कहते हैं कि हिंदी को ‘संस्कृतनिष्ठ’ नहीं होना चाहिये. उनके अनुसार भाषा एक उपयोगी औजार है जिसे पवित्र नहीं प्रभावकारी होना चाहिये. एक पक्ष यह भी है कि आज के समय में भाषा विज्ञान या linguistics में जो तरक्की हुई है वो हिंदी में नहीं बल्कि अंग्रेजी में हुई है. यह अलग बात है कि विश्व के सर्वप्रथम भाषा विज्ञानी पाणिनि थे जिन्होंने संस्कृत में अष्टाध्यायी की रचना की. अमेरिका की आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी ने पाणिनि के नाम से कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज बनाई है.

यहाँ एक दूसरा प्रश्न खड़ा हो जाता है. संस्कृत का व्याकरण कहीं अधिक उन्नत और वैज्ञानिक है. तब हिंदी के व्याकरण को ‘संस्कृतनिष्ठ’ न बना कर तकनीकी भाषा कैसे बनाया जाये? बीस वर्ष पहले सन् 1996 में एम आई टी के प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी नोम चोम्स्की ने दिल्ली में व्याख्यान दिया था. उन्होंने ‘Minimalist Program’, Generative Grammar और Universal Grammar जैसे विषयों को cognitive science से जोड़ा. उनका व्याख्यान Architecture of Language नाम की पुस्तक में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हुआ. कॉग्निशन का सामान्य अर्थ है ‘संज्ञान’. हम जो कुछ भी देखते सुनते अथवा पढ़ते हैं उसे भाषा के माध्यम से संज्ञान में लेते हैं. हमारे दिमाग का एक हिस्सा भाषा को समझने के लिए बना होता है. चोम्स्की और स्टीवन पिंकर जैसे विशेषज्ञ भाषा विज्ञान और कॉग्निटिव साइन्स में अंग्रेजी में शोध करते हैं. यूनिवर्सल ग्रामर थ्योरी विश्व की सभी भाषाओं में कुछ न कुछ समानता देखती है. हैदराबाद की इंग्लिश एन्ड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी (EFLU) में computational linguistics पर शोध होता है. इस तरह भाषा मात्र एक उपयोगी औजार नहीं बल्कि आधुनिक विज्ञान की एक बहुत बड़ी शाखा बन जाती है.

कॉग्निटिव साइन्स का उपयोग और दायरा दोनों बढ़ रहा है. इसका इस्तेमाल आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) और एम्बिएंट इंटेलिजेंस (AmbI) में हो रहा है. यह दोनों ही अन्तर्विषयक क्षेत्र हैं जिनका इस्तेमाल न केवल भविष्य के रोबॉटिक्स में बल्कि रक्षा तकनीक में होने जा रहा है. विंग कमांडर अजेय लेले अपनी किताब Strategic Technologies for the Military में लिखते हैं कि एम्बिएंट इंटेलिजेंस तकनीक से ऐसे हथियार बनाये जा सकेंगे जो न सिर्फ सोच सकेंगे बल्कि स्वयं निर्णय लेने के काबिल भी होंगे. भविष्य के ऐसे हथियार नैनो तकनीक की सहायता से अपने वातावरण यानि ambience के अनुसार खुद को ढाल सकेंगे और लक्ष्य निश्चित कर सकेंगे. इन सबका आधार भाषा विज्ञान के विकास से ही सम्भव है.

क्या हमारी हिंदी इतनी काबिल है?

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