गुज़ारिश : तेरा ज़िक्र है या इत्र, जब जब करता हूँ, महकता हूँ, बहकता हूँ, चहकता हूँ

गीत की ज़मीन जिंदगी के चर्मोत्कर्ष की ज़मीन है. इस ज़मीन पर न तो जन्म लिया गया है न ही मृत्यु. फिर कैसा जादू?

जादू दो तरह का होता है. वैसे होने को तो हज़ार तरह का होता है. लेकिन जब इसे गुणधर्मो के आधार पर विभक्त करने बैठेंगे तो प्रत्येक जादू दो ही श्रेणी में विभक्त हो के रह जाता है.

एक जो आप दुनिया के सामने दिखा कर दुनिया को अचंभित कर रहे होते हैं और दुनिया आपको स्वयं से अलग कुछ ख़ास समझने लग जाती है जबकि आप को पता होता है आप खास नहीं उनमें से ही हैं.

दूसरा जादू है कि आप दुनिया को नहीं दिखाते; बल्कि दुनिया से दूर खुद में डूबकर आत्मतिरोहित होते रहते हैं. और दुनिया आपको सबके जैसे आम समझती है. जबकि आपको पता रहता है आप उनमें से नहीं हैं. इनके अलावा शेष जो है वह हाथ की सफाई है.

जादू का खेल शुरू होता है पर्दा खुलता है. आप खेल दिखाने को तत्पर, आपकी जादूगरनी पर्दे पर दिखती है मुस्कुराती हुयी, और आप पलकें उठा के देख रहे होते हैं हैं जादूगरनी आपके कमरे की खिड़की का एकमात्र पर्दा खोल के, धूप का आपके कमरे में स्वागत कर बासी अँधेरे को बाहर का रास्ता दिखा रही है.

ज्ञातव्य हो; यह वह जादूगरनी नहीं जिसे आपने अपने जीवन के खेल में सहभागी चुना था. यह कोई और है, और इसे आप चुनें; आपकी क्षमता नहीं, इसने आपको चुना है, आपकी शेष ज़िंदगी को ज़िंदगी से जोड़ने के लिये. आपकी वाली जादूगरनी तो तमाम पर्दों के पीछे छिप कर बैठी है. तमाम पर्दे जिनमें कई तहें सामाजिकतायें, नियम व परिस्थितिजन्य विवशताएँ, (लेकिन ये पर्दे उतने पारदर्शी नहीं जितने कि बना दिए जाते हैं.)

जब दुनिया आपके दिखाये जादू से अभिभूत हो रही होती है आपको सर आँखों पर बिठाती है तब आप पर हज़ार आँखें जमी होती हैं. लेकिन जब आप दुनिया से दूर आसराहीन हो जाते हैं तब वे दो आँखें आप पर जमीं रहती हैं, दिन और रात बिना किसी चमत्कार की संभावना के, बिना लोभ-लालच; इससे बढ़ के कौन सा जादू होगा? अथाह प्यार जो इस दुनिया भर का नहीं लगता, जो लाया हुआ लगता है अनन्त ब्रह्माण्ड से.

वह आपको आइना दिखाती है आपके वास्तविक रूप का, पर आपकी लाचारगी अथवा बेसहारेपन का नहीं बल्कि आपको अपनी आँखों में सुंदर बना के अपनी सुंदरता को देखभाल रूप दे कर मुस्कुराती है. यही वह इत्र था जिसकी खुशबु यत्र-तत्र अब तक महक रही है जो आपने बरसों पहले अपनी ज़िन्दगी में बिखेरा होगा. वह तो सफलता की अल्पकालीन बू थी जो आपके बिखरते ही बिखर गई. जबकि ये आपकी ख़ुशी के लिये नाचना चाहती है. आपके रोने पर आपके आंसू सम्भालती है. आप के अपने पैरों चलने की इच्छा सँजोती है पर आपके नहीं चल पाने की विवशता जानकर खीझती नहीं, उसी आग में आप भी दहक रहे हैं जिसमें बिना आपको बताये वह दहक रही है आपके साथ ही…

प्रेम जीवन की अनगिन सच्चाइयाँ ले के आता है. जो हाथों में हाथ लेकर साथ रोना चाहता है, टूट-टूट कर बिलखना चाहता है. लेकिन कोई उसे समझना नहीं चाहता. जब वही प्यार बौखलाहट बन जाता है तब उसे ‘सिद्धांत’ का नाम दे दिया जाता है.

गीत ने मन की सभी परतों को करीने से खोला है. जबकि आपको अनन्य प्रेम प्राप्त हो रहा होता है तब आप इसमें प्रसन्न नहीं हो पाते, आप अतीत के अधूरे प्रेम की पीड़ा में बीमार रहते हैं. आप अपनी सम्पूर्णता की झीनी पानी की सी चादर को छोड़ के अपूर्णता के कई तहों में सजे हुए पर्दों में अपने आँसू समो देना चाहते हैं. तब भी प्रेम आपको स्वीकार करता है और आपकी तमाम विडंबनाएं, जबकि उसे भी आपकी सम्भाल की उतनी ही जरूरत रहती है पर वह टूट-टूट के बिखरने पर भी आपसे सम्भाल की अपेक्षा नहीं रखती पर टूट बिखरना चाहती है तो आपके ही दामन में…

गीत में कशिश है, ख़लिश है. गीत के हर पंक्ति की शुरुआत अनन्त सम्भावनाओं से पटी पड़ी प्रतीत होती है कि पर्दा खुलता है और अनचाही सच्चाई मुँह चिढाये झाँक कर उपहासमय स्वर में बेतहाशा हँसती है. तब प्रेम का आना होता है और बिना बोल पँक्तियों के बाद के आलापों, अवरोहों, आरोहों में ही अपने होने को व्यक्त कर उस उपहास के ऊपर अपनी सुरक्षापर्त चढ़ा के उसे असरविहीन कर देता है.

फ़िल्म का नाम गुज़ारिश है जो गीत में कहीं नहीं है लेकिन स्थायी से लेकर हर बन्द तक ‘गुज़ारिश’ की ही अनुगूँज है. ये कमाल एएम् तुराज़ का है. स्वर मिल के संजोये हैं शैल हांडा और राकेश पंडित ने, पुरकशिश इस गीत का फिल्मांकन इसकी तासीर को बिना भटके पूरी तरह से उभारता है. जब ये रंग एक कैनवस पर एक साथ बिखर उठते हैं तब वह ‘एक-नाम’ किसी की ज़ुबान से सुन के मौसम फूल सा खिल उठता है और सब ओर अपनी खुशबुएँ बिखेरने लगता है. तब मन चोरी पकड़े जाने के भय से भयमुक्त हो कर जीवन-मृत्यु से दूर सदा को प्रेम में ही विचरने लगता है.

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