मानवीय भावनाओं के कुशल चितेरे शरतचंद्र

15 सितंबर, ये तारीख़ विशेष है मेरे लिये क्योंकि इस तारीख को उनका जन्मदिन होता है जिन्हें मैं दिल से पसंद करता हूँ… भारत के कुछ महान लेखकों में से एक ‘श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय.’

बचपन में दूरदर्शन पर एक फिल्म देखी थी ‘मँझली दीदी’. तब फिल्म के टाइटल में पहली बार एक नाम देखा था… शरतचंद्र चटर्जी. लिखा था फिल्म इनके उपन्यास पर आधारित है. ऋषिकेश मुखर्जी का निर्देशन व मीना कुमारी, धर्मेन्द्र और मास्टर सचिन के लाजवाब अभिनय की वजह से ये फिल्म दिल में बस गई. मानवीय रिश्तों की ऐसी उथल-पुथल पहली बार देखी थी.

फिल्म देखने के कुछ महीनों बाद जब किसी काम से शहर के बस स्टैण्ड जाना हुआ तब वहाँ एक किताबों की दुकान थी. मायापुरी जैसी किताबें देखते हुए अचानक एक किताब पर नज़र गई… ‘बिराज बहु’… लेखक की जगह शरतचंद्र चटर्जी लिखा हुआ था. और भी किताबें थी. मैंने तब 60 रुपये में तीन किताबें खरीदी थी. बिराज बहु, शेष प्रश्न और देवदास. तीनों पढ़ डाली. अद्भुत. सिनेमा में उपन्यास की मूल संवेदना का 20% भी निर्देशक नहीं ला सकते… ये भी स्पष्ट हुआ.

उसके बाद तो चरित्रहीन, मँझली दीदी, दत्ता, बिप्रदास, पंडित मोशाय, श्रीकांत, गृहदाह, परिणीता से लेकर हिंदी में अनुवादित लगभग सारे उपन्यास ‘खरीदकर’ पढ़ डाले. आज भी सारे रखे है.

पढ़ा तो हिंदी के कई लेखकों को है लेकिन शरतचंद्र के पात्रों के मन में चलता अंतर्द्वंद, हर पात्र के अकाट्य तर्क.. खासकर महिला पात्रों के… उस समय से आगे जाकर तर्क करना.. आपको बाँधे रखता है. शेष प्रश्न की कमल और चरित्रहीन की सावित्री आपका कभी पीछा नही छोड़ेंगी अगर आपने इनको पढ़ा हो.

अपने हर उपन्यास में नारी पात्र को उभारने वाले शरतचंद्र ने देवदास में देवा और चन्द्रमुखी के पात्र को तो भरपूर जगह दी लेकिन शादी के बाद पार्वती के मन में क्या चल रहा था? गुस्से में देवदास को छोड़कर शादी कर लेने के बाद भी क्या वो देवदास को भूल पायी थी? इसे पुरी तरह इग्नोर कर दिया गया… उनका सारा जोर देवदास की आत्मग्लानि और आत्मविनाश पर ही था.

जब पहली बार देवदास पढ़ा था तो इसका अंत पढ़कर तब मैं हैरान था कि देवदास जिससे इतना प्यार करता था, जिस पर अपना हक समझता था… उस पर गुस्से में सिर्फ हाथ उठाने की इतनी बड़ी सज़ा कि पारो के दरवाजे पर पड़ी उसकी लाश भी भंगियो से उठवाकर चील-कौवों को खाने के लिये फिंकवा दी! लेकिन अब वो सब सही लगता है. लेखक शायद यही बताना चाहता था कि गुस्से की अति में आदमी अंधा हो जाता है और फिर उसके परिणाम घातक ही होते है.

बिमल रॉय की देवदास में तो बिमल रॉय उपन्यास की रूह में और दिलीप कुमार देवदास में घुसने में कामयाब हुए हैं लेकिन जैसे मँझली दीदी देखकर मुझे शरतचंद्र को पढ़ने का मन हुआ, वैसे ही भंसाली की देवदास देखकर कोई पहली बार शरतचंद्र का नाम सुने तो वो बन्दा कभी शरतचंद्र को नही पढ़ेगा. बड़े बड़े सेट लगवाना और किरदार की आत्मा पकड़ने में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है!

मानवीय भावनाओं के कुशल चितेरे शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को नमन.

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