कर्मण्ये वाधिकारस्ते

तीन प्रकार के कर्म है – प्रारब्ध, संचित कर्म और क्रियमाण कर्म. प्रारब्ध सबसे पुराने इसलिए जागृत हो चुके कर्म हैं अर्थात् उन्होंने फल देना प्रारम्भ कर दिया है.

संचित कर्म सुप्त हैं जिन्होंने फल देना आरम्भ नहीं किया है.

क्रियमाण कर्म तात्कालिक कर्म हैं जो हम सोचते-बूझते करते हैं. प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म में परम वैर है, यह बृहद श्रृंगोंवाले दो मेषों की मानो विकराल लड़ाई है. जो हम करते हैं और जो हमें प्राप्त होता है इसी लड़ाई का परिणाम है.

जब तक प्रारब्ध नि:शेष नहीं होता तब तक जीव को दु:खभाव ही प्राप्त होता है. संसार भ्रम मात्र है यह बूझते भी उसे कष्ट उठाने पड़ते हैं. अनेक जीवन मुक्त भी प्रारब्धवश विपरीत स्थितियों को प्राप्त हुए- भरत ने मृग की काया धरी, वामदेव का गर्भ मात्र में रहने का प्रारब्ध शेष था इसलिए कहा जाता है उन्हें माँ के जठर में ही ज्ञानप्राप्ति हुई. परम्परा विशेष से बुद्ध को प्रारब्धशेष होने के कारण किसी आसन में ज्ञान प्राप्त नहीं होता था किंतु गौदुहासन में कारणवश विश्राम करने पर उन्हें ज्ञान हुआ.

रामकृष्ण परमहंस को गले का कैन्सर हो गया था और वह दूधभात तक न खा पाते थे इसलिए दुःख होने पर आनंद मानना चाहिए कि प्रारब्ध नि:शेष होते है.

चित्र: गले के कैन्सर का कष्ट उठाने के बाद परमहंस रामकृष्ण के पार्थिव काया का दृश्य. पीछे स्वामी विवेकानंद जी.

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