ट्रांसपोर्ट क्रांति भाग-3

बुलेट ट्रेन के नाम पर कुछ लोग को बहुत तकलीफ हो रही है. उधर प्रधानमंत्री मोदी, नितिन गडकरी के साथ मिल के दिल्ली मेरठ Express Way बना रहे हैं. पहले से एक ठीक ठाक सड़क मौजूद है, फिर भी 7800 करोड़ रूपए और हज़ारों एकड़ ज़मीन बेवजह बेफालतू खर्च की जा रही है. उतने पैसे में कितने मुफ्तखोरों को 2 रुपया किलो गेहूं और 1 रूपए किलो चावल खिलाया जा सकता है. दिल्ली गेट से डासना तक की सड़क 16 लेन बनाई जा रही है.

क्या ज़रूरत है इस अय्याशी की? कौन लोग चलेंगे इस सड़क पर. भारत का गरीब आदमी तो चलेगा नही. ये मोदी और गडकरी सिर्फ अम्बानी-अडानी के लिए बना रहे हैं सड़क. आखिर जब पहले से मौजूद है एक सड़क तो नई बनाने की क्या ज़रूरत है?

[ट्रांसपोर्ट क्रांति भाग-1]

पहले दिल्ली से मेरठ जाने में अढाई-तीन घंटे लग जाते थे. नई सड़क बन जाने से ये सफर सिर्फ 45 मिनट में पूरा हो जाएगा. मने सिर्फ 2 घंटे बचाने के लिए 7800 करोड़ रूपए और हज़ारों एकड़ जमीन फूंक दी मोदी ने? दो घंटे बचा के क्या उखाड़ लोगे मोदी जी?

मुम्बई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन का शिलान्यास कर रहे हैं मोदी और शिंजो आबे. एक लाख करोड़ रूपए खर्च होगा इस पर. केजरीवाल कहते थे कि बुलेट ट्रेन का भाड़ा 80,000 रूपए होगा (इतना गज़ब का दिमाग कहाँ से ले आते हैं कुछ लोग?)

[ट्रांसपोर्ट क्रांति भाग-2]

बुलेट ट्रेन परियोजना के शिलान्यास से तकलीफ महसूस कर रहे भाई साहब कह रहे हैं कि भाड़ा हवाई जहाज के बराबर 3500 रूपए होगा. बुलेट ट्रेन की क्या ज़रूरत है, हवाई जहाज़ चला लो.

कुछ महामूर्ख हवाई जहाज़ में सिर्फ हवाई सफर का टाइम जोड़ते हैं. बस दो घंटे की फ्लाइट है जी… मुझे याद है वो बंगलोर मुम्बई की फ्लाइट… सुबह 7 बजे की थी. रात 3 बजे घर से निकले. टैक्सी वाले 1400 रूपए मांग रहे थे एयरपोर्ट तक का. कर्नाटक ट्रांसपोर्ट की बस 150 में लायी. 2 घंटे पहले चेक इन अनिवार्य है. 9.30 बजे मुम्बई में लैंड लिया. कितना समय लगा आप खुद जोड़ लो.

मेरे एक मित्र आजकल नवी मुम्बई से दिल्ली फ्लाइट से न आ के पनवेल से राजधानी पकड़ते हैं. रात सोओ सुबह दिल्ली. टैलगो चलने दो, यही सफर 7 घंटे का हो जाएगा. और बुलेट ट्रेन से 3 घंटे का.

वैसे जितनी आलोचना आज बुलेट ट्रेन की हो रही है इस से ज़्यादा 80 के दशक में कंप्यूटर की हुई थी. मज़दूर यूनियन कहती थी कि इस गरीब देश मे क्या ज़रूरत है कंप्यूटर की… कंप्यूटर लाखों मज़दूरों की रोज़ी रोटी छीन लेगा.

50 और 60 के दशक में जब बसें चली तो यूँ ही विरोध किया था, इक्का तांगा चलाने वालों ने. फिर जब टेम्पो, ऑटो रिक्शा चले तब भी हड़ताल हुई थी इक्का तांगा स्टैंड पर.

अगर देश में ये ट्रक-बस बंद कर दें तो करोड़ों लोगों को बैलगाड़ी हांकने के अवसर पैदा होंगे, रोज़गार बढ़ेगा, गो रक्षा होगी, बैल समाप्त होने से बच जाएंगे. गरीब हिन्दोस्तान is in no hurry…

बेचारे गरीब आदमी को आखिर जाना भी कहाँ है… ये तीव्र, आरामदेह यात्रा तो अमीरों के चोचले हैं जी… ये सरकार बिक गयी है अम्बानी-अडाणी के हाथों… ये लोग बुलेट ट्रेन बना के हमको बेवक़ूफ़ बना रहे हैं जी.

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