अलौकिक प्रेम कथा-3 : मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की

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नायिका

अलौकिक प्रेम कथा-1 : मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की

अलौकिक प्रेम कथा-2 : मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की

अब आगे ….

कर्ष की आंखे खुली तो लावण्या वंहा नही थी, प्रसन्नचित कर्ष उठा और स्नानागार की ओर गया, लावण्या वहां भी नही थी.

ब्रश आदि से निवृत होकर कर्ष कुर्सी पर बैठा तो चाय तैयार पड़ी थी वहां, बाहर की ओर धूप में थोड़ी तेजी देख कर उसे लगा कि शायद काफी समय हो गया है.
घड़ी साढ़े दस बजा रही थी. बाहर की तरफ देखता कर्ष प्रकृति के मनोहर स्वरूप के बीच कल रात के मधुर प्रसंग को स्मरण कर प्रफ्फुलित हो रहा था.

शीघ्र ही वह लावण्या को लेकर व्याकुल होने लगा. तभी दरवाजे पर हरकत हुई और लावण्या अंदर प्रविष्ट हुई. उसके चेहरे पर संतुष्टि के साथ ही आत्मविश्वास का असाधारण तेज था जो विशेषतः विजेताओं के मुखमंडल पर उपस्थित होता है.

“अरे! कहाँ थी लव?? विचलित था तुम्हे ना पाकर. – कर्ष
“एक आवश्यक काम था, कृत्या ने बुलाया था. वहीँ से आ रही हूँ.

सुनिए …..
“एक बहुत आवश्यक बात करनी है आपसे.” – लावण्या
“कहो प्रिये ! “- कर्ष ने मुस्कुराते हुए कहा.
“कुछ चाहियें आपसे.” – लावण्या
“प्राण ले लो प्रिये.” – कर्ष ने विनोदपूर्वक कहा
“वचन दीजिये! याचिका स्वीकार्य होगी शपथपूर्वक.”- लव
“अरे ! विश्वास नहीं क्या मुझ पर?” – कर्ष
“स्वयं से ज्यादा, ईश्वर के समान, लेकिन जो मांग रही हूँ वह आपको बहुत प्रिय है. कहिये! वचन देते हैं?” – लावण्या

“ओहो ! वैसे तो वचन का इतिहास ही दुर्भाग्यपूर्ण है फिर भी तुम पहली बार कुछ मांग रही हो, ठीक है कहो! मैं वचन देता हूँ यथासंभव पूर्ण करूँगा.” – कर्ष

“ओह्ह. मेरे प्रिय ! मैं बहुत प्यार करती हूं आपसे कर्ष.
अब मेरी बात ध्यान से सुनिए, वैसे तो जीवन का अनुभव आपको मुझसे कहीं ज्यादा है लेकिन कुछ दिनों से आपके सानिध्य में जो कुछ मैंने जाना समझा है उसी का आश्रय लेकर कहती हूँ. जब कभी मैं अपने किसी अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पाती थी, तब आप मुझे समझाते थे कि,
” किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता.” (धरोहर)
इंसान को जीवन में दोनों पक्ष देखने पड़ते हैं शुभ्र भी और कृष्ण भी. अब यही सब हम पर भी तो प्रभावी होता है.
हमें हर बार अपना अभीष्ट तो नहीं प्राप्त होता.” – लावण्या

“हां ! लेकिन तुम कहना क्या चाहती हो लव स्पष्ट कहो, हृदय रसातल में धंसा जा रहा है मेरा. कहो अनिष्ट की पुस्तक का कौनसा पृष्ठ लिखा जाना है मेरे जीवन में? स्पष्ट कहिये.” – कर्ष

“अनिष्ट तो मेरा है देव! मेरे जीवन में आपके साथ का यह सौभाग्य अभी तक का ही है. मुझे आपको छोड़कर जाना होगा. – कहते हुए लावण्या का वह तेज कुछ मद्धम पड़ गया.

“क्या ! यह क्या कह रही हों यार. ऐसी अशुभ बातें मुझे परिहास में भी नहीं सुहातीं. ऐसा ना कहो प्लीज़.” – कर्ष

“मैं सत्य कह रही हूँ, आप वचनबद्ध हैं, कर्ष! आपको यह करना होगा.
मुझे अनुमति दीजीये प्रिय.” – लावण्या

“नहीं मानता ऐसे वचनों को मैं, जो आपके अस्तित्व पर ही दुर्भाग्य बन कर छा जाएं, वैसे ये वचन पूर्व के वचनों के प्रति विरोधाभासी है अतः वैसे भी मान्य नहीं है. मैं नही मानता इसे.” – कर्ष

“आप ऐसा नहीं कर सकते, आपके ही वचन है ये और यह आपका संकल्प
सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, केल फलै एक बार ….

कहिये कि यह मात्र शब्दों का एक समूह है, सत्य नहीं है?”
– लावण्या ने आंखों में आंखे डाल के पूछा

निरुत्तर कर्ष निश्वास होते हुए बोल पड़ा
“अपराध जान सकता हूँ मैं अपना?
जान सकता हूँ कि ऐसा कौन सा गुनाहे अजीम कर दिया है मैंने जो विधि ने यह दंड स्वीकृत किया है मेरे निमित्त?

“क्षमा कीजिये देव ! मैं असमर्थ हूँ.” – लावण्या ने सिर झुका कर कहा

” ओह्ह ! समझ गया, कल रात को मेरे द्वारा किया गया वह कृत्य, मुझे सयंम रखना चाहिए था, मैं प्रेम की परीक्षा में देह पर आकर उलझ गया. ओह्ह ! सही कह रही हो तुम मैंने अपराध किया है, लेकिन मैंने आगाह भी किया था तुम्हें .. कि मैं स्वर्ण नहीं हूं, मैं पीतल हूँ, कहा था मैंने तुम्हें, स्मरण करो. तुम पीतल को सोना समझ कर घिस रही हो. किन्तु, मैं पीतल हूँ, नहीं रह सकता स्वर्ण के समान निर्मल, निष्क्रिय, स्वतंत्र, निर्लिप्त…
सुनो देवी!
मत पहनो इस पीतल को अपने कंठ में,
इस योग्य नहीं..
जरा हवा लगी
और ये अपना काला रंग दिखा देगा,
यही प्रकृति है इसकी और स्वभाव भी,
यही कमजोरी है उसकी
और नियति भी,
जाओ किसी स्वर्ण की
खोज करो
धरा अभी भी जनति है
तेजस्वी कनक को,
उस दिव्य, निर्लिप्त
सुमधुर खनक को,

वही है, जो तुम्हे अलंकृत कर सकता है,
हृदय के तारों को बिना छुए झंकृत कर सकता है,
वही है जो हृदय में रहकर भी
मलिन नहीं होता,
पीतल के वश में होता तो वह भी इस प्रकार कुलहीन नहीं होता.

जाओ देवी शुद्ध स्वर्ण का
वरण करो,
प्रसन्न चित हो हिरण्य वर्ण की
शरण धरो,
उसकी चमक ही अब तुम्हारे
हृदय का अंधकार मिटाएगी,
उसके संग से ही तुम्हारे व्यक्तित्व की सुरभि चहुओर फैल पाएगी,

मुझ पीतल को छोड़ दो
अपने भाग्य के साथ
जिसके प्रारब्ध में होगी पीड़ा
उसे मिलेगा मेरा हाथ
हां मैं पीतल ही हूँ.
निराश कर्ष मस्तक झुकाएं कुर्सी पर बैठ गया.

“ओह्ह ! क्या कह रहे हैं आप?
ऐसा कह कर मेरे प्रेम को अपमानित ना करे देव! पूजा करती हूं मैं आपकी.
आप आराध्य है मेरे, अनन्य आराध्य और सदा रहेंगे जीवनपर्यंत.
आपने कल मुझे पूर्ण किया है, पतित नहीं.
कल जो हुआ वह मेरे प्रेम की पूर्णाहुति थी कर्ष, मेरा उच्चतम अभीष्ट मनोरथ !”
अंतिम वाक्य कहते कहते तेजोमयी लावण्या की वाणी कम्पायमान हो गई, उस कम्पन्न से उत्पन्न वाकतरंग ने कर्ष के ह्रदय को भी व्यथित कर दिया.

“कम से कम बताओ तो सही कि तुम क्यों कुछ कह भी नहीं सकती?” – कर्ष
“मैं भी शपथबद्ध हूँ कर्ष.” – लावण्या
“अपने आराध्य से ऊपर किसकी शपथ है जो तुम कह नहीं सकती, तोड़ नहीं सकती, कहो!
तुम्हे मेरे प्रेम की सौगंध, यदि क्षण मात्र के लिए भी मैंने तुम्हें सच्चा प्रेम किया हो तो कह दो क्या कारण है जो तुम्हें मुझसे दूर ले जाने का दुस्साहस करता है.” उत्तेजित कर्ष की आंखे अब अंगार उगल रही थी.

ऐसा ना करें, मेरे प्रेम पर विश्वास करें, अग्निपरीक्षा ना ले देव!
कैसे बताऊँ आपको वो सत्य जो मेरी इस पूर्णता के भाव को अधर में अवलंबित कर देगा. मुक्त कीजिये मुझे इस अमोघ सौगंध से, प्लीज.” – लव

“मुझे उत्तर चाहिए, उसके सिवाय कुछ स्वीकार्य नहीं. कारण तो बताना ही होगा.” – कर्ष गरजा

कुछ देर की शांति के बाद लावण्या कहने लगी – “ठीक है देव! जैसी आपकी आज्ञा. हमारे इस अद्वितीय प्रेम की सौगंध का सम्मान मैं अपने वचनभंग से करूंगी.

तो सुनिए! आपकी इस पृथ्वी से लगभग 1 प्रकाश वर्ष (प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गई दूरी, प्रकाश की गति 3 लाख किमी प्रति सेकंड ) की दूरी पर एक प्रछन्न ग्रह है हमारा, जहां जीवन है, किन्तु केवल नाम मात्र का. जो कभी आपकी इस पृथ्वी की ही तरह पूर्ण जीवंत ग्रह था. तकनीक के विकास और अंधप्रतिस्पर्धा ने तकनीक को इतना उन्नत बना दिया कि आज हम तकनीकी रूप से एक आदर्श ग्रह तो है, लेकिन जीवंत नहीं. तकनीक के बल पर लगभग डेढ़ वर्ष में हम अपने इस अंतरिक्ष यान से जिसमें आप अभी खड़े हैं, अपने गृह से यहाँ पृथ्वी पर पहुंच गए लेकिन मात्र एक याचक की तरह.

“ठहरो! यह क्या कहानी है? तुम्हें लगता है मैं यह सब स्वीकार कर लूंगा? – कर्ष ने क्रुद्ध होकर पूछा.

“देखिये खिड़की से बाहर ” – लव
“क्या है! हिमालय ही तो है. ” कर्ष ने एक दृष्टि डाल कर पुनः लावण्या की ओर देखा.
“और अब फिर से देखिये एक बार. ” – लावण्या ने मुस्कुराते हुए कहा.
इस बार जब कर्ष ने बाहर देखा तो दृष्टि वहीं कीलित हो गई.

गर्म, तपते मरुस्थल में उड़ती हुई रेत कमरे के उसी अचल कांच से टकरा रही थी जहां कुछ क्षणों पहले ओंस की बूंदे जमी हुई थी भीतर की सतह पर. वह मरुस्थल की तीव्र उष्णता कमरे के अंदर तक आकर कर्ष को पीड़ित करने लगी. नीली आभा से युक्त एक विशालकाय, वृत्ताकार, ऊर्जा पिंड (अंतरिक्ष यान ) का शेष भाग भी दिखने लगा. अवाक कर्ष फिर से लावण्या की ओर देखकर मौन हो गया.

लावण्या ने कहना जारी रखा ….
तकनीकी उन्नयन के 600 वर्षो में हम इतने अधिक विकसित हो गए कि लगभग प्रकाश की गति से चलने लगे, लेकिन समय को ना जीत पाये. हम जितना तेज चले काल उतना सिमटता चला गया, हमारे ग्रह के सामान्य प्राणी की औसत आयु केवल 5-7 सौर वर्ष रह गई.

सभी कार्यों के निष्पादन की गति बढ़ गई और अंतराल कम होता चला गया. शरीर उन्नत होते गए और आत्मा मरती गई, आज हमारा ग्रह बिल्कुल भावशून्य है, जीवनशक्ति से हीन, मृतप्राय.

ना हमे ऊर्जा की कमी है ना किसी तकनीक की, कॉस्मिक ऊर्जा के सीधे दोहन की तकनीक के चलते हमे किसी ऊर्जा की आवश्यकता ही नहीं है लेकिन तकनीकी उच्चता के शीर्ष पर बैठे हम अपना मौलिक जीवन लुप्त होने से ना बचा पाये. अब हमारे यहाँ प्राणी नहीं सिर्फ मशीनें ही जन्म लेती है जिंदा शव जो भावहीन यांत्रिक जीवन व्यतीत कर 5 से 7 वर्ष में ही जीने की चाह समाप्त करके स्वेच्छा मृत्यु का वरण कर लेते है. वीरान सा हो गया है हमारा ग्रह.
ना दिन ना रात
ना कोई गलती ना भुगतान
ना विवाद ना सुलह
ना क्रोध ना क्षमा
ना गीत ना गान
ना प्रेम न विरह
बस यंत्र ही बन गए हैं, यंत्र उत्पन्न करने वाले यंत्रवत जीने वाले. सब कुछ आदर्श, सब कुछ परफेक्ट किन्तु नीरस बिल्कुल मरघट की मनहूस चुप्पी सा.

बीस वर्ष पहले मेरा जन्म हुआ तो मैं रोई थी जो वहां असाधारण बात थी, वैज्ञानिकों ने जांचा तो पाया कि मैं, हमारे ग्रह के मूल गुणधर्मो के पुरातन जीन्स धारण किये हुए एक “उत्तपरिवर्ती” (mutant ) हूँ. जैसे सफेद और पीली मकई में होते है ना लाल दाने वाली वैसे ही.

80 प्रतिशत जीवंत पृथ्वी के प्राणियों जैसी भावभीनी, हंसने, रोने, गाने, नाचने और प्रेम के वरदान से युक्त, हमारे ग्रह पर खुशियों की एक अंतिम किरण हूँ मैं.

तीस वर्ष पहले हमारे एक जीव वैज्ञानिक ने यह खोज की थी कि जब हमारे ग्रह की कोई म्यूटेंट स्त्री किसी उत्कृष्ट भावयुक्त, समान गुणधर्मो वाले जीव से जो उसे सच्चे भाव से प्रेम करेगा, प्रणय करेगा, सबकुछ बिल्कुल प्राकृतिक, तकनीकरहित तो उससे उत्पन्न संतति हमारे ग्रह के नवप्राणियों में भावों को जीन्स के स्तर पर, गुणधर्मो में अन्तर्नियोजित कर प्रतिस्थापित कर देगी. उसके बाद उनसे उत्पन्न होने वाली सारी पीढियां धीरे धीरे भावप्रण होने लगेंगी और लगभग 150 सौर वर्षो के बाद जो पीढ़ी अस्तित्व में होगी वह आपकी इस पृथ्वी की तरह ही पूर्ण जीवंत एवं भावपूर्ण होगी.

“निसंदेह मैं निष्काम ना थी प्रिये किन्तु निश्छल अवश्य थी सर्वदा, आपको अपने अंतस से वरण किया है मैंने और अनंत प्रेम से विभूषित.
ना आप पीतल है और ना ही स्वर्ण
आप पारस है साक्षात ! जिसके बीज को सगर्व धारण कर मैं स्वर्ण उगाऊंगी मेरे ग्रह पर, शुद्ध स्वर्ण,जीवंत.

“विश्वासघात है यह ! पूर्वनियोजित षड्यंत्र !
धिक्कार है !
तुम्हें जो चाहिये था क्या वह तुम्हारी तकनीकी कौशल से परे था, क्या कमी थी पृथ्वी पर उत्तम मानव बीजों की जो द्रव्य रूप में संग्रहित पड़ा है अथाह.
कौन रोक सकता था आप समर्थ जीवोत्तर प्राणियों को?
फिर मेरे साथ ही यह भावनात्मक छल क्यों?
इतना विराट छल?
जैसे स्त्रीधर्मा प्रकृति सहस्त्रों वर्षो के पौरुषिक कुकृत्यों का एकत्रित प्रतिशोध ले रही हो ऐसे षड्यंत्र के रूप में.
मैं आहत हूँ, मुझे सूचित किया जाना चाहिए था.
छल है यह! पूर्ण छल.- कर्ष विकल हो गया नैराश्य से, ऐसा कुछ कह बैठा जिसकी स्वयं उसे भी अपेक्षा नहीं थी.

” ना बेवफाई बुरी है, ना नाकामी बुरी है,
बुरा है तो इश्क में मंजिल का मुसाफिर हो जाना.
ना बुतपरस्ती बुरी है, ना इलाही बुरी है,
बुरा है तो किसी को खुदा बनाके काफ़िर हो जाना.”

” धीरज धरे देव! ये आपकी विकलता के उद्गार है, आप इससे परे हैं, मेरी भौतिक अनुपस्थिति आपको इतना दुर्बल नहीं बना सकती जो आपके विराट व्यक्तित्व से उलट हो. मैंने बहुत निकटता से जाना है, वरा है आपको, यह क्षणिक विषाद है आपका, आशुतोष!

यदि भावो का यह वरदान हमें तकनीक से प्राप्य होता तो हम आते ही क्यों यहाँ?
आपको सूचित करके हमें “नियोग” नहीं अपेक्षित था देव !
देखा है उसका परिणाम महाभारत के रूप में, महाविनाश के रूप में.
“हमें नियोग की भिक्षा नहीं, प्रेम का अलौकिक संजीवन मंत्र अभीष्ट था आपसे, जिसे मैंने आपकी प्रेम आराधना से सिद्ध किया है, अपने आराध्य से.”
कहिये मेरी आँखों मे देखकर की मैंने छल किया है आप के साथ?
कहिये एकबार फिर से मुझे बेवफा?
एक अलौकिक तेज से मुखरित लावण्या फट पड़ी.

“देव ने छल किया है,
प्रकृति ने छल किया है,
देखो कैसे हिमालय से मरुस्थल में ला पटका है मेरे अस्तित्व को,
कल की सुखद पूर्णिमा आज भरी दोपहर में खग्रास बनकर समक्ष है, कहो क्या कहूं इसे?
तुमसे कोई शिकायत नहीं है, तुमने वह किया जो तुम्हे चाहिए था, बेवफा उन अर्थों में नहीं कहा तुम्हें जो तुम समझ रही हो, मुझे अपना ईश्वर बनाकर तुम अपने ग्रह के कल्याण को जीवनलक्ष्य बनाये हो इसलिए कहा. यह बेवफाई ही है, मुझे छोड़कर तुम अपने ग्रह का विचार करती हो, यही अन्यमनस्कता भी बेवफाई ही तो है. – कर्ष अपने तर्कों से संभावित पराजय को टालने के अंतिम प्रयत्न करने लगा.

“आप जैसे श्रेष्ट पूर्णपुरुष का भावबीज मैं ससम्मान अपने ग्रह लेकर जाऊंगी और वहां उस बंजर भूमि पर भावों की कृषि करूंगी, वहाँ भी भावों की, प्रेम की फसल होगी, खुशहाली होगी.
क्या वहाँ प्रसन्न, जीवंत विचरती आपकी संतति के चेहरे में आप नहीं होंगे?
क्या मेरा कर्ष और उसका ईष्ट इतना छोटा है कि जो मात्र पृथ्वी के कल्याण का ही उत्तरदायी है, उससे आगे का नहीं?
भीषण आघातों से व्यथित मानव हृदयो को स्थिर कर देने वाले आपके प्रिय गीता के वचन केवल धरती पर ही प्रभावी है?
मेरी भौतिक उपस्थिति क्या आपका मोह बन चुकी है?
क्या आप एक मरणासन ग्रह के प्राणियों की व्यथा भी नहीं सुनना चाहते?

हमारे ग्रह पर 15 महीने में शिशु सीधे युवा हो जाता है तकनीक के प्रभाव से, कोशिका प्रिंटिंग के प्रभाव से, लेकिन हम भाव नहीं भर सकते उनमें, इसीलिये मुझे पृथ्वी के शिशुओं की ही तरह बिना तकनीक के पाला गया जब मैं अठारह वर्ष की हुई तब तक अपने तीन अभिभावको को इसी भावहीन मृत्यु को निगलते देख चुकी थी, अपने सहचरों को असमय प्राणहीन होते देखती रही और प्रतीक्षा करती रही कि कब अंत होगा इस चिर श्राप का जिसे स्वयं हमारे पुरखो ने बड़े जतन से कमाया हैं विकास के नाम पर.

ना मेरे जन्म में, ना पालन में, और अब ना ही किसी घटना में तकनीक को महत्व दिया गया है ताकि सब कुछ प्राकृतिक हो, भावभीना हो. तकनीक भी अब प्रायश्चित मात्र कर रही है सहयोगी बनकर.

इस नीलवर्णा पृथ्वी और वहाँ उपस्थित जीवंत सभ्यता ने हमारे नैराश्य को हरके आशा की एक किरण दिखाई और हम दौड़े चले आये अपने अभिश्राप को संजीवनी में बदलने.

थोड़ा नरम पड़ते हुए लावण्या के शब्द तेजहीन हो गए अब… “फिर भी यदि आपको लगता है कि आपके साथ छल हुआ है, विश्वासघात हुआ है तो मैं नहीं जाऊंगी अपने ग्रह पर, यहीं सहर्ष आपकी सेवा करके आपके आक्षेपों का कलुष विरेचन करूंगी. लुप्त हो जाने दीजिए उस ग्रह से उस सभ्यता को जो इसी योग्य हैं कि जिसने भावो को, प्रेम को, मानवीय मूल्यों को तकनीक और विकास के समक्ष हल्का आँका. उन्हें भुगतने दीजिये अपने कुकृत्यों का दुष्परिणाम.

मैं वही करूंगी जो आपकी आज्ञा होगी. कहिये देव क्या आज्ञा है मेरे लिए? – लावण्या ने उसी तेज से कर्ष को हिला सा दिया.

मौन, स्तब्धता, नीरवता शब्द असमर्थ थे अब कुछ समय के लिए.

कैसे जियूँगा मैं तुम बिन, कैसे देखूंगा तुम्हे, कैसे स्पर्श करूँगा, कहो ??-कर्ष

कर्ष के दोनो करतलों को अपने कराग्र में धारण कर लावण्या प्रेमपूर्वक समझाने लगी …
“वैसे ही जैसे मैं करूंगी प्रिय, जब भी आप दर्पण के सम्मुख मुस्कुरायेंगे आपको मैं नजर आऊंगी, जब भी आप मुझे स्मरण कर छुएंगे किसी वृक्ष के तने को तो मैं वहां अपने कटि दैर्ध्य पर सिहरन का अनुभव करूंगी. आपकी सांसो की ध्वनि पर जब भी आपका ध्यान जाएगा तो आपको मेरा नाम सुनाई पड़ेगा. मैं रहूंगी सर्वदा आपके साथ और आप मेरे साथ. मेरे ग्रह के जीवट में, वास्तविक विकास में, उत्सवों में, स्मृति में, कण कण में और हमारे प्रेम से पल्लवित इस अलौकिक बीज के नाम मे जिसे में “उत्कर्ष ” कह कर पुकारूँगी.

मेरे अलौकिक प्रेम का उत्कर्ष,
मेरे ग्रह के सौभाग्य का उत्कर्ष,
हमारी सभ्यता का उत्कर्ष,
कहिये भूल पाऊंगी एक क्षण के लिए भी आपको ??

भीगी आंखों से कर्ष ने पूछा –
” पुरुष की आंखों में जल अच्छा लगता है क्या तुम्हें ??”

“नहीं जानती देव कैसा लगता है लेकिन इतना अवश्य जानती हूँ कि “जिन पुरुषों के नेत्रों में यह जल होता है उसके चाहने वालों के जीवन में कभी सूखा नहीं पड़ता, वे बहुत भाग्यशाली होते हैं मेरी तरह.”
एक और याचना है आपसे, प्रिये.

कर्ष – “क्या कुछ है अब भी मेरे पास देने को, देवी ? ”

लावण्या ने उत्साह से कहा – “यह पावन धरा जो आपका लालन पोषण करती है, जो आपका ध्यान रखती है, जिसने हमारे ग्रह को पुनर्जीवन दिया है, उसके आसन्न विनाश से उसे बचाइए.
भाव अब इस सुंदर धरा से भी तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं, ना आप लोग प्राणवायु से जीवित हो, ना जल से और ना ही भोजन से, हमे देखिये और समझिये कि आप लोग केवल भावों से जीवित हो.

“एक परेशान चिकित्सक जो अपने भावों को मार कर जी रहा है जीवन में, वह अपने कक्ष में अपने प्रिय कवि का गीत सुनकर अपने भावों को कुछ समय के लिए स्वयं में जीवित कर एक जटिल शल्य क्रिया करता है और उस व्यक्ति को जीवनदान दे देता है जिसकी मृत्यु ध्रुव थी, उसे पता चलता है कि जिसे उसने बचाया है वह वही कवि है जिसकी रचना सुनकर स्वयं उसके भावजीवन को प्राणदान मिला है कुछ समय पहले.

तो कहिये किसने किसे बचाया है ??

वस्तुतः भाव ने ही सभी को जीवित रखा हुआ हैं और यही परमसत्य है.

आप वचन दीजिये कि इस सुंदर धरती को इसी तरह स्पंदित, जीवंत और भावपूर्ण रखने के लिए अपना श्रेष्ठ प्रयास करेंगे.

कर्ष खड़ा हुआ और दीर्घश्वास के साथ अपनी ऊर्जा और आत्मबल को एकत्रित करके बोला, – मुझे क्षमा कीजिये! पूर्णिमा से अमावस्या को पंद्रह दिन लगते है लेकिन मुझे अचानक हुए इस वज्रपात ने विकल कर दिया था, विषादग्रस्त कर दिया था. आप ठीक कहती हैं देवी. मैं स्वार्थ से पराभूत हो गया था, प्रेम की विराटता का गुण विस्मृत कर गया था. मुझे गर्व है आपपर और आपके साथ मेरे इस अलौकिक प्रेम संबंध पर और सदा रहेगा. मेरे साथ ही इस सम्पूर्ण पृथ्वी को भी गर्व है स्वयं पर कि वो इस शुभ संकल्प का महत्वपूर्ण भाग होगी. जाइये देवी प्रसन्नतापूर्वक जाइये. जाइये और अपने ग्रह को बचाने का श्रेष्ट प्रयास कीजिये, मेरी शुभकामनाएं, मेरा प्रेम और आशीष सदा आपके साथ है चाहे आप सहस्त्रों प्रकाशवर्ष की दूरी पर ही क्यों ना हो.

कहते हुए पुनः कर्ष की आंखों से भावाश्रु छलक आये. उन्हें पोंछते हुए उसने शब्द प्रवाह सतत रखा.. आपकी सफलता और इस उच्च संकल्प की पूर्ति के लिए मैं इस प्रचंड विरहाग्नि को सहज रूप से हृदयस्थ करता हूँ, यह महाभूत अग्नि आपका कल्याण करे.

अग्नि तो बस अग्नि होती है,
फिर चाहे यज्ञ की हो या विरह की,
द्रौपदी भी उत्पन्न कर सकती है और
धृष्टदयुम्न भी,
विनाश का कारक भी हो सकती हैं,
और धर्म की स्थापना का निमित्त भी,

स्वर्ण को शुद्ध भी कर सकती है
और देह को भस्म भी,
भौतिक को फिर भूत कर सकती
और पाणिग्रहण की रस्म भी,

क्रोधाग्नि हो तो साधु को भृगु बना दे,
वैश्वानर होकर पांचों अन्नों को पचा दे,

हाँ, अग्नि ही जीवन है,
पंच महाभूतों में गहन है,
जीवन का आधार है,
अनाहत है, मूलाधार है,

प्रसन्न हूँ अग्नि का यह नवरूप देख मैं,
हृदय से तपकर प्रकटते हुए वाक् वेग में,
विरह की अग्नि इतनी सुंदर भी होती है,
अस्तित्व को स्पष्ट कर दे भाव संवेग में.

है स्वर्ण ! तुम्हारी सिद्धि एवं प्रसिद्धि के लिए,
मेरे हृदय में यह पवित्र अग्नि सदा रहेगी प्रज्वलित,
जन्मों जन्मों, युगों युगों, काल और अंतराल में,
देह से परे, दृष्टि से ओझल, अथाह प्रेम से सज्जित.

कर्ष ने लावण्या के दोनों कंधों पर अपने हाथ रखते हुए उसकी आँखों मे आंखे डाली उसी तेज के साथ जो उसकी वास्तविक प्रकृति थी, कहा –
” क्या फिर कभी नहीं मिल पाओगी सच में?” – कर्ष की आवाज में पीड़ा अब भी जाने का नाम ना ले रही थी.

“काश यह संभव होता मेरे लिए, मुझ से अधिक कौन चाह सकता है यह.”- लावण्या भी भर्रा गई अवरुद्ध कंठ से…

” क्या इतनी शक्ति है इन भावों में कि वे एक बार भी अपने प्रिय को फिर से मिला सके कभी ??? – कर्ष ने हृदय चिर दिया लावण्या का.

” इसका उत्तर तो स्वयं मेरे भी जीवन का लक्ष्य होगा, प्रिय.”
लावण्या के नेत्रकुंड से भी अश्रु बूंदे छलक उठी

” देखिये ये आंसू देव ! लुप्त है हमारी धरती पर ये.
आज यहाँ इसी भाव के कारण गिर रहे हैं झरझर.
इसी के लिए तो आये थे हम यहाँ पर.”
दोनों के नेत्रों से व्यास नदी बहने लगी कुछ देर…

उस अचल कांच में से पुनः मनाली के सुंदर हिमप्लावित पर्वतश्रृंग दिखने लगे थे अब ….
पहले अपने और फिर लावण्या के आंसू पोंछते हुए कर्ष ने एक अजेय मुस्कान के साथ कहा –

“इस अचल कांच को चंचल करवा दीजियेगा, प्रकाश तो आ जाता है, स्पर्श नहीं आ पाता.”
अब शीघ्र जाइये! अन्यथा फिर कभी भी ना जा पाएंगे.

दोनों ने पूर्ण दृष्टि से एक दूसरे को जी भर कर निहारा और फिर कुछ क्षणों के लिए एक दूसरे की आंखों में प्रविष्ट हो गए. अंतिम मिलन के सम्मानार्थ समय ठहर सा गया.

लावण्या पलटी और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी.
उसका शुभ संकल्प, उसका अलौकिक प्रेम, उसकी युवाशक्ति और स्वयं कर्ष के गर्वोक्त शब्द भी उसका लड़खड़ाना ना रोक सके.

कर्ष भी उसी स्थिति में था उसे जाते हुए देखकर, अंतर मात्र यह था कि वह चलते चलते लड़खड़ा रही थी और कर्ष खड़े खड़े ……
कर्ष के मस्तिष्क में पार्श्वपटल पर हसरत मोहनी के शब्द ध्वनित होने लगे …

“वक्त-ऐ-रुखसत अलविदा का लफ्ज कहने के लिए,
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है….

लावण्या दरवाजे तक पहुंची और दरवाजा खोल कर पलटी फिर से कर्ष की ओर देखा जो वहीं जड़वत स्थिर आंसुओ के साथ सप्रयास मुस्कुरा रहा था, लावण्या ने एक अद्भुत कालजयी मुस्कान प्रकट करते हुए वो तीन शब्द कहे जिसे सुनकर स्वयं विधि भी अवाक रह गई
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” फिर मिलेंगे “स्वामी”

( इतिश्री अलौकिकप्रेमयज्ञस्य पूर्णाहूतिम.
।। एकोद्वयचक्षुते राधागोविन्ददेवो विजयते.।
( जो एक ही है और दो दिखते हैं ऐसे राधा गोविन्द भगवान की जय हो.)

 

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