ऐसे में भोर कैसे हो?

मन में गहन संवेदना के राग हैं. वह सारे दुःख-रोग-शोक जो मेरे नहीं है वे मुझे पीड़ा दे रहे हैं; अपितु जिस पौधे को लोटे भर जल से सींचा था उसमें अवश्य तीन फूल खिल के मुस्कुरा रहे हैं. भय लगता है कहीं उनका ऐसे बेखटके मुस्कुराना संझा तक ही न हो.

घोर धुंआ है, घनघोर शोर के साथ प्रत्येक मतवाला अपने-अपने रास्ते को सच मान के चला जा रहा हो मानो. दूसरे के पथ को कुपथ और चाल को कुचाल समझता हुआ, उपहासजन्य दृष्टि से देखता हुआ… कहीं आत्मघात की श्रृंखलाएं हैं तो कहीं घात की. हत्या को आत्महत्या में परिणित किया जा रहा है और आत्महत्या को जैविक स्वच्छता के कसौटी पर कस कर उसे सच प्रमाणित किया जा रहा है.

जिन शरीरों को अकाल ही प्राणों ने त्याग दिया, वे यदि अपनी शेष श्वासों तक जीवित रहते तो समाज के लिये और भी लाभप्रद होते, सुफलदायी होते आमजन के प्रति. फिर भी; यदि कुछ अच्छा न भी दे सकते थे तो भी, उनके ह्रदय को धड़कने का, अपना जीवन अपने तरह से जीने का अधिकार तो था. मन कचोट रहा है. प्राणघात पर प्रश्न हैं, शोर हैं, अभियान हैं, क्रांतियाँ है, लाँछन हैं, प्रतिलाँछन हैं, अधर्म हैं, विधर्म हैं, कुर्तक हैं, कितना कुछ है किन्तु संवेदना कहीं नहीं…

प्रत्येक हत्या दूसरी हत्या के समकक्ष कहीं नहीं है. मानवता के धरातल से उठता हुआ मानव, मानव नहीं रहा, तुकांत संवादों का समुच्चय हो गया है, जो व्याकरणीय दृष्टि से भी शुद्ध है, गेय है, लय में है, प्रवाह भी है, किन्तु परपीड़ा और परहित कहाँ हैं?

तर्क पर कुतर्क चाल पर कुचाल; ग्रामीणों द्वारा कम मूल्य पर बेचे गये अनाज के भंडार हो गए हैं. वैचारिकताओं से भरे राजपथ को पगडंडिया देख रही हैं और जान रहीं हैं यह मात्र वैचारिक शून्यता है, सिवाय उसके कुछ भी नहीं. भोर हो या सांझ हो कोई अंतर प्रतीत नहीं होता. सूरज की केसरी लाली रक्तिम लाली बन रही है. सब अपने ही शस्त्र लिये अपनी ही बात कह रहे हैं. कोई एक दूसरे को सुनना ही नहीं चाहता.

भोर कैसे हो?

– मैं वेदिका पर धरी ब्रह्म मुहूर्त की दीपिका, मद्धम लौ में दिपदिपा रही हूँ

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