किसी आर्मी वाले से पूछिये उनकी लोकेशन्स का महत्व

“Our minarets are our bayonets,___ हमारे मीनार हमारी संगीनें हैं
Our domes are our helmets,_______ हमारे गुंबज हमारे हेलमेट हैं
Our mosques are our barracks,___ हमारी मस्जिदें हमारी बैरक हैं
And the faithful our army.”____________और मोमिन हमारी सेना.
My reference is Islam.
If I am not able to speak of this, what is the use of living?

तुर्की के वर्तमान राष्ट्रपति एर्दोगन ने यह कविता 1999 में सुनाई थी तो तत्कालीन तुर्की सरकार ने उन्हें जेल में डाला था. इसके रचयिता थे तुर्की विचारक मेहमेत जिया ‘गोकाल्प’. मजे की बात यह है कि गोकाल्प इस्लामिज़्म के विरोधी थे, आधुनिकता के समर्थक थे और कमाल पाशा की विचारधारा पर गोकाल्प के विचारों का प्रभाव था.

ऐसे में मुझे पता नहीं कि उन्होने यह कविता किस संदर्भ में लिखी है. लेकिन एर्दोगन ने इन वाक्यों के साथ बाद के दो वाक्यों का उपयोग कर के तुर्क में इस्लाम की पुनर्स्थापना कर दी. आज यूरोप में जगह-जगह मस्जिदें बनवाने के लिए तुर्की पैसे दे रहा है. यह समझ लीजिये कि इस्लाम की सेना के लिए बैरकें बांध रहा है और यूरोपीय समुदाय के नेतागण खुश हो रहे है कि यही सही मल्टीकल्चरलिज़्म है.

आज भारत में जगह-जगह नयी मस्जिदें बंध रही हैं. उनकी मीनारों की ऊंचाई देखी जाए. कहाँ-कहाँ मस्जिदें उगकर आ रही हैं, यह देखिये. मीनार से मीनार की दृश्यता (visibility) और सिग्नलिंग की संभावना (शक्यता) देखिये. उनकी लोकेशन देखिये, बतौर कंट्रोल सेंटर, पुलिस स्टेशन से अच्छी होती है दंगे के हालात में.

बात समझ में न आए तो कभी गूगल मैप में इनके लोकेशन्स देखिये. किसी आर्मी वाले से पूछिये उनकी लोकेशन्स का महत्व.

किसी बिल्डर से पूछिये ऐसी मस्जिद बनवाने का एस्टिमेट. क्या उतना खर्चा उस क्षेत्र के मुसलमान उठा सकते हैं? क्या उतनी आय है उस एरिया की? क्या उस हिसाब से इन्कम टैक्स या अन्य टैक्स, बिजली के बिल आदि दिखाते हैं कि उस एरिया में उतना खर्चा उठाने की क्षमता है?

कितने लोग हैं वहाँ के, जो खैराती सरकारी हॉस्पिटल में ही ट्रीटमेंट लेने को मजबूर हैं? क्या यह खर्चा उनके इलाज के लिए दवाखाना बांधने के लिए नहीं काम आता? आधुनिक शिक्षा? सरकार के हर कदम को अनावश्यक बताकर वह रकम गरीबों पर खर्चा करने का रोना हमेशा रोने वाले मुसलमानों को यह प्रश्न क्यों नहीं सताते?

और हाँ, शुरुआत तो ज़मीनी होनी चाहिए – क्या यह ज़मीन, जहां ये मस्जिदें बांधी जाती हैं, खरीदी भी जाती है या भारत में इस्लाम की स्टैंडर्ड प्रैक्टिस का अनुसरण किया जाता है?

यह संगीन बने मीनार, और हेलमेट बने गुंबज वाली मस्जिद नाम के बैरकों में से निकलेगी मोमिनो की सेना. उपाय सोच लो, अब से ही, खुद ही. बाद में, ये क्या कर रहे थे, वो क्या कर रहे थे… पूछने कोसने को भी नहीं बचोगे आप. वीरता और वाचालता अब तक समझ ही लिए होंगे?

और अगर ये सोच रहे हैं कि आप मुसलमान बन जाएँगे और जान बचा लेंगे तो ज़रा सूरह 8 आयत 67 को भी पढ़ लीजिये – “किसी नबी के लिए उचित न था कि उसके पास बंदी हों जब तक कि धरती (रणक्षेत्र) में अच्छे प्रकार से रक्तपात न कर दे. तुम सांसारिक लाभ चाहते हो और अल्लाह तुम्हारे लिए आखिरत (परलोक) चाहता है. और अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वज्ञ है.”

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति मेकिंग इंडिया उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार मेकिंग इंडिया के नहीं हैं, तथा मेकिंग इंडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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